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अमि तेष's Blog (29)

कोई सपना भटक रहा है मेरी आँखों में.............

कोई सपना भटक रहा है मेरी आँखों में

पल पल चन्दन महक रहा है मेरी आँखों में

दरिया, नदिया, ताल नहर सब भीगे भीगे है

कब से बादल लहक रहा है मेरी आँखों में

पल भर बतियाता है फिर ओझल हो जाता हैं

किसका चेहरा झलक रहा है मेरी आँखों में

गालिब, की ग़ज़लों सी नाजुक एक कली को देख

कोई हिरना फुदक रहा है मेरी आँखों में

एक ग़ज़ल बातें करती है टुकड़ों में मुझसे

तन्हा मिसरा फटक रहा है मेरी आँखों…

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Added by अमि तेष on November 11, 2013 at 9:00pm — 9 Comments

मेरी आह के बाद ....

सुनो,

तुम तो जानती ही हो ....

मेरी ग़ज़ल,

मेरी कविताओं ...

के हर अलफ़ाज़ को ...

और ये भी,

कि ये दुनियाँ कितनी रुखी है ...

ये जमाने भर तल्खी,

अक्सर घाव कर देती है,

मुझ पर ...

फिर तितलिया ..

वक्त के साथ साथ,

फीकी पड़ जाती है,

चुभते है नाश्तर बन के रंग...

और एक कसक लिए मैं,

जमाने के दरार वाले इस पहाड़ के पीछे,

करता हूँ तुम्हारा इन्तजार ..

तुम देखना,

एक दिन ये दुनियाँ,

ताजमहल के साथ भरभरा कर,

गिर…

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Added by अमि तेष on June 11, 2013 at 3:11am — 15 Comments

इश्क में हो गये है शेर सब

इश्क में हो गये है शेर सब 
शेरनी की गरज पर ढेर सब 

है बनी शायरी अब फुन्तरू 
आम से हो गये है बेर सब 

हां कलम भी कभी हथियार थी 
चुटकुला अब, समय का फेर सब 

जे छपे, वे छपे, हम रह गये 

चाटने में हुई है देर सब 

खो गये मीर, ग़ालिब, मुसहफ़ी 
लिख रहे है खुदी को जेर सब 
~अमितेष 
मौलिक व अप्रकाशित 

फुन्तुरु - मजाक 
मीर - मीर तक़ी 'मीर'

ग़ालिब - असद उल्लाह खां ग़ालिब 
मुसहफ़ी - शैख़ गुलाम हम्दानी मुसहफ़ी 

Added by अमि तेष on June 4, 2013 at 11:19pm — 10 Comments

यह तेरी अर्जी है.....

यह तेरी अर्जी है
या फिर खुदगर्जी है

सिल ही देंगी गम को
सांसे भी दर्जी है

मैं तुम से रूठा हूँ
तुहमत ये फर्जी है

दिल मेरा है सोना
बहता गम बुर्जी है

गर्दिश, ग़ज़लें, गश्ती
यह मेरी मर्जी है 
~अमितेष
("मौलिक व अप्रकाशित")

Added by अमि तेष on January 26, 2013 at 1:13pm — 9 Comments

दो निरे ....

एक बच्चा था, अबोध, हमारे यहाँ की भाषा के उसे निरा कहते है| निरा अबोध बच्चा, अक्ल से कच्चा, दिल से सच्चा| एक दिन खेलते खेलते जाने कहाँ आ पहुचा, उसे नहीं पता था, उसने देखा कुछ लोग थे , अजीब दाड़ी टोपी लगाए, हँसते हुए, बांस की पंचटो के ढाँचे पर आटे की लेई से पतंगी कागज चिपकाते हुए| उसने देखा, कुछ बच्चे उस जैसे ही, निरे अबोध बच्चे, मदद कर रहे है अजीब दाड़ी टोपी वाले लोगे की, वो देखता रहा, बहुत देर तक देखता रहा, उसका दिल रंगीन कागजों में अटक गया था, वो चिपकाना चाहता था उस पतंगी कागज को, बांस की…

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Added by अमि तेष on January 11, 2013 at 11:11pm — 4 Comments

बोलो जी पाओगी ..........

तुम ने कहा,

तुम जी लोगी मेरे साथ हर हाल में,

मुझे शायद इसके लिये भी,

शुक्रिया अदा करना चाहिये तुम्हारा ......

 

पर क्या तुम जानती हो,

इस कमबख्त दुनियां में

जहां कोई किसी का सगा नहीं,

हालात कैसे हो सकते है....

 

बोलो जी पाओगी,

जब दुनियां भर के थपेड़े,

बिना दरबाजा खटखटाये,

हमारे कमरे में दाखिल होंगे......

 

बोलो जी पाओगी,

जब मेरी शायरी में,

तिलमिलाएगी भूख,

नीम से कडबे…

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Added by अमि तेष on January 3, 2013 at 2:58pm — 13 Comments

हाँ हमें कुछ शर्म करना चाहिये....

हाँ हमें कुछ शर्म करना चाहिये

या हमें अब डूब मरना चाहिये

 

देश क्यों बदला नहीं कुछ आज तक

देश को क्यों और धरना चाहिये  

 

दर्द ही है जख्म की संवेदना 

क्यों भला इससे उभरना चाहिये

 

रों रही है माँ बहन औ बेटियां

जिन्दगी इनकी सवरना…

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Added by अमि तेष on January 1, 2013 at 11:47am — 12 Comments

ठीक है...............

ठीक है, ठीक है, ठीक है
मूर्खता घाघ की लीक है

चाटना, काटना, बाँटना 
लूट की नीच तकनीक है

झूट है न्याय की भावना 
आ रही देश को हीक है

लाल है हुक्म के होंठ क्यों 
खून है या रची पीक है

राज है तो हमें डर नहीं 
सोच ये तंत्र की ज़ीक़ है

ज़ीक़ – तंग
~अमितेष 

Added by अमि तेष on December 26, 2012 at 8:47pm — 10 Comments

आप तब गोली चलाना सीखिये..........

खुद को जब खुद से बचाना सीखिये

आप तब गोली चलाना सीखिये

पीर को खंजर, बनाना सीखिये

गर्दनें गम की उड़ाना सीखिये

पी रहे है खून दुनिया का बड़ा

खून के इनको बहाना सीखिये

दाग ये काले, घिनौने है बड़े

दाग को जड़ से मिटाना सीखिये

चोट से, मरते नहीं है नाग जो

आग से इनको जलाना सीखिये

.…

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Added by अमि तेष on December 23, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

चांदनी आज फिर विदा होगी.........

एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ ...... गुरुजनों से अनुरोध है कृपया मार्गदर्शन किजिए 



चांदनी आज फिर विदा होगी

रोशनी आज फिर फना होंगी



जब कभी रंग रोशनी होंगे

आपके हाथ में हिना होगी



दर्द दे आज फिर हमें मौला

दर्द की आज इन्तहा होगी



हो गया एक नज़्म का सौदा

शायरी देख कर खफा होगी



चूम लों आँख, सोख लों…

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Added by अमि तेष on December 16, 2012 at 1:30pm — 9 Comments

रात से हमने दोस्ती कर ली

रात  से हमने दोस्ती कर ली

लोग कहते है, दिल्लगी कर ली

 

ये फ़िज़ा बहकी, हवा महकी सी

शाम ने तेरी मुख़बिरी कर ली

 

ये हिज़्र मेरे बस की बात नहीं

लो सजा अपनी मुलतवी कर ली

 

तेरा ख्याल ले के सोये थे

ख्वाब में हमनें रोशनी कर ली

 

जो इल्म आया महोब्बत का 'अमि'

आशिको ने शायरी कर ली                                  ~अमि'अज़ीम'

Added by अमि तेष on May 28, 2011 at 12:13am — No Comments

अनुभव..

जिन्दगीं हर घड़ी

एक नया अनुभव लाती है

पर मैं क्या करु मेरा हर नया अनुभव

मेरे हर पुराने अनुभव से

कुछ कड़वा है, कुछ फ़ीका है, कुछ खारा है

कुछ दुर ही सही

मैं उसके साथ चलता हूँ

कभी सभ्लता हूँ, कभी फ़िसलता हूँ

मैं उसे नहीं बांटता

ये ही मुझे रफ़्ता रफ़्ता बांट देता है

मेरी इस छोटी सी जिन्दगी को

जो मेरे लिये ही काफ़ी नही

दो आयामों में काट देता है

वह मेरा सबसे पुराना मित्र है

और सबसे बड़ा…

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Added by अमि तेष on May 26, 2011 at 6:42pm — No Comments

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं......................

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं
बो शक्स जो अज़ीज है, दूर हुआ हैं

मैं समझता हू वो मजबूर ही होगा
लोग कहतें हैं के उसें गुरूर हुआ हैं

अब भी उम्मीद हैं मुझें तेरे आनें की
महोब्बत का बुरा हश्र जरूर हुआ है

लुट के जिसनें कुछ नहीं पाया
प्यार में बो ही तो मशहूर हुआ हैं

तन्हा है 'अमि' फ़िर एक बार दुनियां में
दर्द तो इस बार भी भरपूर हुआ है
-अमि'अज़ीम'

Added by अमि तेष on April 29, 2011 at 9:49am — No Comments

जो पत्थर दिल थे आँसू बहानें लगें हैं.......

जो पत्थर दिल थे आँसू बहानें लगें हैं,

रु-ब-रु गर हो तो मुस्कुराने लगें हैं.

 

अज़ीब तर्ज है तकल्लुफ़ का फ़िज़ायों में,

छुपाते थे जो, सिलसिलें बतानें लगें हैं.

 

कल तलक मायूस थे जो ईद पर हम से,

अब मुखबरी मुहल्लें की सुनानें लगें हैं.…

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Added by अमि तेष on April 21, 2011 at 1:30pm — 4 Comments

बैठा है, किसी नय़ी हलचल का इंतजार है

बैठा है, किसी नई हलचल का इंतजार है,

खुदगर्ज दिल को आज फ़िर किसी से प्यार है

पुरानी उलफ़तों की दुहाई अब नही देता,

खुमारी है नई, पर खौफ़ तो बरकरार है

हर ज़ख्म को वक्त ने कर दिया है बख्तरबंद,

कुछ दर्द के निशान आज भी यादगार है

परख लें कंही नकली न हो पैमानें का नशा

पोशीदा बातों का कोई और भी…

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Added by अमि तेष on April 14, 2011 at 2:00pm — 4 Comments

उंगलियाँ सब पर उठातें रहें है हम............

उंगलियाँ सब पर उठातें रहें है हम,

आईनों से चेहरा छिपातें रहें है हम,



भ्रष्टाचार को हमनें जरुरत बना लिया,

मुल्क को अपनें ड़ुबातें रहें है हम,



रोंशनी से तिलमिलाती है आंखें हमारी,

बेईमानी से नज़रें मिलातें रहें है हम,



सियासत के बकरों का पेट नही भरता,

देश को चारे में खिलातें रहे है हम,



कितने ही बच्चें सोतें हैं यहाँ भूखें,

और सांपों को दुध पिलातें रहें हैं हम,



'अन्ना जी' का बहुत बहुत शुक्रियां,

वर्ना तो धोखा ही… Continue

Added by अमि तेष on April 8, 2011 at 2:00pm — 14 Comments

खुली आंखों से भी उसे सब ख्वाब लगता हैं

 





खुली आंखों से भी उसे सब ख्वाब लगता हैं

वो अंधेरें घर में बस एक चिराग लगता हैं



उसके वालिद भी एक कोरी किताब ही थे

वो भी अधूरी हसरतों का जवाव लगता हैं



जिसके माथे पर हर बक्त पसीना रहता हैं

वो खुद ही पाई पाई का हिसाब लगता हैं…

Continue

Added by अमि तेष on April 3, 2011 at 4:00pm — 2 Comments

मेरे उस्ताद

मेरे उस्ताद कागज़ पर चन्द लकीरें बनाते है,

कभी अल्फ़ाज़ जोडते हैं कभी काफ़िये बनाते है.



पेशानी पर हैरत यूं गश खाती है,

जब अपने रंग मे आकर कोई गज़ल सुनाते है.



मुझे भी फ़ख्र होता है यें देख कर लोंगों,

जब बोलते हैं मेरी रगों में इन्क़िलाब लातें है.



मुझ जैसे शागिर्द पर रख के अपना हाथ,

लफ़्ज़ों की जादूगरी का हुनर सिखाते है.



ऐसी शख्सियत का ज़िक्रे ब्यां क्या हो,

जिन्हे अहले इल्म फ़ख्रे हिन्दुस्तां बताते है.



अपने फ़न की… Continue

Added by अमि तेष on March 29, 2011 at 1:00pm — 4 Comments

यूं मेरे हाथ मुझ को छुड़ानें न दो,

यूं मेरे हाथ मुझ को छुड़ानें न दो,

बहुत याद आयेंगें हम, हमें जानें न दो.



गर हमें प्यार है, तो फ़िर डर कैसा,

अब कोइ राज़-ए-महोब्बत छुपानें न दो.



तेरी सांसों की महक की है ज़रूरत मुझको,

अब मेरे दिल में किसी और को आनें न दो.



इस तरह रोतें रहोंगे तो भला क्या होगा,

अश्क आंखों में मेरी जान कभी आनें न दो.



कर लो अब तो तुम मेरी महोब्बत का यक़ीन.

तुम मुझे अब और क़समें खानें न दो.



'अमी' तेरे प्यार के रंग में सराबोर है… Continue

Added by अमि तेष on March 26, 2011 at 12:51am — 2 Comments

संगदिल शहर

Added by अमि तेष on March 16, 2011 at 12:30pm — 4 Comments

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