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मेरे उस्ताद कागज़ पर चन्द लकीरें बनाते है,
कभी अल्फ़ाज़ जोडते हैं कभी काफ़िये बनाते है.

पेशानी पर हैरत यूं गश खाती है,
जब अपने रंग मे आकर कोई गज़ल सुनाते है.

मुझे भी फ़ख्र होता है यें देख कर लोंगों,
जब बोलते हैं मेरी रगों में इन्क़िलाब लातें है.

मुझ जैसे शागिर्द पर रख के अपना हाथ,
लफ़्ज़ों की जादूगरी का हुनर सिखाते है.

ऐसी शख्सियत का ज़िक्रे ब्यां क्या हो,
जिन्हे अहले इल्म फ़ख्रे हिन्दुस्तां बताते है.

अपने फ़न की दौलत से नवाज़ कर मुझे अमि,
राना जी इल्म की रियासत का सुल्ताँ बनाते है
-अमि'अजिम'

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Comment by अमि तेष on March 31, 2011 at 12:58am
Bhanybaad Saahil ji....
Comment by Saahil on March 30, 2011 at 11:58pm

अपने फ़न की दौलत से नवाज़ कर मुझे अमि,
राना जी इल्म की रियासत का सुल्ताँ बनाते है

 

bahut khoob! khuda kare sabko aisa ustaad mile!

Comment by अमि तेष on March 30, 2011 at 9:07am
Dhanybaad Ganesh Sir..........

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 30, 2011 at 8:44am

मुझ जैसे शागिर्द पर रख के अपना हाथ,
लफ़्ज़ों की जादूगरी का हुनर सिखाते है.

 

अच्छी रचना है , प्रसंसनीय प्रयास |

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