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कविता : लोकतंत्र का क्रिकेट

बड़ा अजीब खेल है लोकतंत्र का क्रिकेट

एक गेंद के पीछे ग्यारह सौ मिलियन लोग

उछल कर, गिर कर

झपट कर, लिपट कर

पकड़नी पड़ती है गेंद

कभी जमीन से, कभी आसमान से

जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी को मिलती है गेंद



और बल्लेबाज

उसे तो मजा आता है क्षेत्र रक्षकों को छकाने में

अगर किसी तरह सबने मिलकर

बल्लेबाज को आउट कर भी दिया

तो फिर वैसा ही नया बल्लेबाज

उसका भी लक्ष्य वही

अगर पूरी टीम आउट हो गई

तो दूसरी टीम के बल्लेबाजों का भी लक्ष्य वही

सबसे ज्यादा पैसा… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 27, 2011 at 10:20pm — 3 Comments

~हिंसा~

यूँ तो 

बहुत पहले से 
रखी थी 
वह किताब शेल्फ में
उठा कर…
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Added by AjAy Kumar Bohat on April 27, 2011 at 4:30pm — 4 Comments

ऐसा भी एक मन्ज़र...

 

पैगाम लिए पंछी चल दिए सुबह को बुलाने ,
बांसुरी से गुजरती शीतल हवा कुछ गुनगुनाई |
 
पीली धूप पहन किरणों ने झाँका आसमान से ,
बाहें फैलाकर मौसम ने फिर ली अंगड़ाई |
 
सिमटने लगी रज़ाई…
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Added by Veerendra Jain on April 27, 2011 at 12:15pm — 9 Comments

समाज

अखब़ार का एक टुकड़ा
बाहर से जला हुआ,
और राख़ वाली परिधि के दरमयां
सिर्फ़ तुम्हारा ज़िक्र.
हुमाद की वही खुशबू,
जिसका कोई आकार नहीं, 
जिसकी कोई दिशा नहीं;
ठंडी आवाज़ में बजती घंटियों सा चमकता है,
दीया और पुष्प जैसा नदियों में बिख़र जाता…
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Added by Rahul Raj on April 26, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

सुर्ख लाल जोड़े में सजी वो जान मेरी

सुर्ख लाल जोड़े में सजी वो जान मेरी

रस्मो को आज निभाने चली है

सीने में मेरी मुहब्बत को दफना कर

रिश्तो की लाज बचाने चली है



मेंहदी से सजा के वो सुर्ख हथेली

दिल के दर्द छुपा तो वो लेगी

होठो पे लाली लगा कर के अपने

गले की हिचकियाँ छुपाने चली है



फेरे जो लेगी वो वेदी पे उस पल

सपनों को अपने जलाती चलेगी

हर ख्वाब जो कभी सजाये थे उसने

वेदी के अग्नि में चढाने चली है



फूलो से सजे उस सुहाग के सेज पे

सपनों की चिता जलाने चली… Continue

Added by Dheeraj on April 26, 2011 at 5:00pm — 2 Comments

मुक्तिका : माँ _संजीव 'सलिल'

मुक्तिका "माँ"

संजीव 'सलिल'

*

बेटों के दिल पर है माँ का राज अभी तक.

माँ के आशिष का है सिर पर ताज अभी तक..



प्रभू दयालु हों इसी तरह हर एक बेटे पर

श्री वास्तव में माँ है, है अंदाज़ अभी तक..



बेटे जो स्वर-सरगम जीवन भर गुंजाते.

सत्य कहूँ माँ ही है उसका साज अभी तक..



बेटे के बिन माँ का कोई काम न रुकता.

माँ बिन बेटों का रुकता हर काज अभी तक..



नहीं रही माँ जैसे ही बेटा सुनता है.

बेटे के दिल पर गिरती है गाज अभी तक..…

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Added by sanjiv verma 'salil' on April 26, 2011 at 2:00pm — 1 Comment

सपने हसीन क्यों होते हैं

स्नेह,दुलार,प्रीत

मिलन,समर्पण
आस, विश्वास  के 
सतरंगी 
ताने बाने से बुने
सपने इस कदर   
हसीन  क्यों होते हैं
कभी मिल जाते हैं 
नींद को पंख
कभी आ जाती है
पंखों को नींद
हम सोते मैं जागते
ओर जागते मैं सोते हैं
सपने इस  कदर  
हसीन क्यों होते हैं
बे नूर आँखों मैं 
नूर जगाते
उदास लबों पर 
मुस्कान…
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Added by rajni chhabra on April 26, 2011 at 1:00pm — 12 Comments

विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन में भोजपुरी के सम्‍मान की मांग तेज

                   देवभूमि ऋषिकेश में दिनांक 23-24 अप्रैल को आयोजित विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन के दसवें राष्‍ट्रीय अधिवेशन के दौरान भोजपुरी भाषा, संस्‍कृति व कला को सम्‍मान दिए जाने की जोरदार मांग की गई । दिनांक 24 अप्रैल को समापन समारोह के अवसर पर मुख्‍य अतिथि के रूप में…

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Added by देवDevकान्‍तKant पाण्‍डेयPandey on April 25, 2011 at 6:00pm — 1 Comment

मकड़ियाँ दिलों की

बड़ी शिद्दत से इनकी आवाजाही रंग लायी है,
किसी का न तिलक और न कहीं कोई सगाई है,
सफ़ाई रोज़ होती है, हठी ये गिर कर पलती है,
मगर फिर भी दीवारों पर मेरे चुपचाप चलती है,…
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Added by neeraj tripathi on April 25, 2011 at 3:30pm — 2 Comments

कालचक्र

कालचक्र : आचार्य संदीप कुमार त्यागी

 

ओस कण भी दोस्तों अँगार हो गये ।

घास के तिनके सभी तलवार हो गये॥

 

रौंदते ही जो रहे फूलों को उम्र भर।

देखलो उनके सभी गुलखार हो गये॥

 

था यकीं जिनपर उन्हें सौ फीसदी कभी।

सब फरेबी देखलो मक्कार हो गये ॥

 

टाँकते थे जो हमारे आसमां पर चिंदियाँ।

चीथड़ों में आज वो सरकार हो गये॥

 

कीजियेगा क्या उन्हें देकर सलाम ।

आजकल वो दुश्मनों के यार हो…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on April 24, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

पक्षपात

पक्षपात





दोष लगेगा उस पर

पक्षपात का

गर ज़रा सा भी दुःख

न वो देगा मुझे

मैं भी तो एक ज़र्रा हूँ

उसकी कायनात का

उसी कारवां की

एक… Continue

Added by rajni chhabra on April 24, 2011 at 4:30pm — 7 Comments

व्यंग्य - टेक्नालॉजी का फसाना

सबसे पहले आपको बता दूं कि औरों की तरह मैं भी तकनीक की टेढ़ी नजर से दूर नहीं हूं। तकनीक के फायदे कई हैं तो नुकसान तथा फजीहत भी मुफ्त में मिलती हैं। वैसे मेरे पास न तो विरासत में मिली संपत्ति है और न ही मैंने इतनी अकूत संपत्ति जुटाई है, जिससे जिंदगी बड़े आराम से गुजरे। मेरा तो ऐसा हाल है, जैसे बिना सिर खपाए कुछ बनता ही नहीं, मगर पिछले दिनों से इस बात को लेकर चिंतित हूं कि मैं रातों-रात लखपति क्या, करोड़पति से अरबपति बनते जा रहा हूं। दरअसल, मैंने सोचा कि जब बड़े शहरों में तकनीक की खुमारी छाई हुई है…

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Added by rajkumar sahu on April 24, 2011 at 1:05am — No Comments

कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में

आपसी प्रेम और लगाव होता है

हर कण दूसरों को अपनी ओर

आकर्षित करता है

और इसी आकर्षण बल से

दूसरों से बँधा रहता है



रेत के कण आकार के अनुसार

चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं

उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है

आपसी आकर्षण नहीं होता

वो एक दूसरे की गति का विरोध करते हैं

उनमें केवल आपसी घर्षण होता है



चिकनी मिट्टी के कणों के बीच

आकर्षण के दम पर

बना हुआ बाँध

बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2011 at 12:48am — 4 Comments

ग़ज़ल

पत्ते जीवन के कब बिखर जाए क्‍या मालूम
शाम जीवन की कब हो जाए क्‍या मालूम

बन्‍द हो गए है रास्‍ते सभी गुफतगू के
अब वहां कौन कैसे जाए क्‍या मालूम

झूठ पर कर लेते है विश्‍वास सब
सच कैसे सामने आए क्‍या मालूम

दो मुहें सापों से भरा है आस पास
दोस्‍त बन कौन डस जाए क्‍या मालूम

विक्षिप्‍त की दुनिया है बेतरतीव बेरंग
कोई संगकार सजा जाए क्‍या मालूम

Added by रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on April 23, 2011 at 8:19pm — 3 Comments

Ghazal-Dil mein chand pal rab ko reejhanaa bhee hotaa thaa.

दिल में चंद पल तन्मय रब रीझाना भी होता था।

हरिक आबाद घर में एक वीराना भी होता था।।

ि

तश्नगी से सहरा में तूं पी करते मर जाना भी होता था ।

हैरतअंगेज गजाला-गजाली सा याराना भी होता था ।।

वादाफर्मा को वादा निभाना भी होता था ।

दिले-नाशाद को जाके मनाना भी होता था ।।

आजकल गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं लोग ।

पहले अपना मजहबीं इक बाना  भी होता था।।

अब तो अजीजों का हमें सही पत्ता नहीं मिलता।

किसी जमाने में दुश्मन का भी ठिकाना भी होता था ।।

अब न…

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Added by nemichandpuniyachandan on April 23, 2011 at 3:30pm — No Comments

शिकवा गिला

उसको भी कुछ शिकवा गिला होगा
मेरे संग कुछ और भी जला होगा

राख उडी तो होगी हवा के साथ
इक ज़र्रा उस दामन पे गिरा होगा

सामान तो सब बचा लिया गया होगा
नहीं वो, जो बदन से सिला होगा

मैनें घर जलाया रोशनी के लिए
कौन मुझ जैसा यहाँ दिलजला होगा

आज भी शाम ढल गयी होगी तन्हां
सूरज भी लाली से सना होगा

रुका होगा कुछ सोचकर मेरा यार
दो क़दम घर से ज़रूर चला होगा

रोजी पे गया सो बेखबर होगा
मस्त है जो मखमल पे पला होगा

Added by Raj on April 23, 2011 at 11:22am — No Comments

पानी चुराकर बिजली उत्पादन कर रहा सीएसपीएल

अमझर गांव में संचालित छत्तीसगढ़ स् टील एण्ड पावर लिमिटेड द्वारा पिछले 3 वर्षो से भू-जल की चोरी कर बिजली पैदा किया जा रहा है। भू-जल दोहन की शिकायत पर प्रशासनिक अधिकारियों ने प्लांट में छापामार कर कंपनी प्रबंधन को बोर से पानी चोरी करते…

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Added by rajendra kumar on April 23, 2011 at 10:49am — No Comments

वसुंधरा का दोहन आखिर कब तक ?

विकास की अंधी दौड़ में हम मं गल और चन्द्रमा पर आशियाना बनाने के सपने देख रहे हैं, लेकिन इस आपाधापी में पृथ्वी को भूल रहे हैं। आज पृथ्वी के बेहतरी लिए गंभीरता से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। एक ओर हम वातावरण में कार्बन बढ़ाने वाले स्त्रोत बढ़ाते जा रहे…

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Added by rajendra kumar on April 23, 2011 at 10:45am — 1 Comment

लेह में गुम हुए परिजनों के इंतजार में पथराई आंखें

महंत गांव की वृद्धा धनकुंवर व गं गाबाई की आंखे भले ही कमजोर हो गई है, लेकिन वे दोनों हर रोज घर के बाहर घंटों बैठकर अपने परिजनों का इंतजार करती है। इनके परिजन लेह में आए जलजले के बाद… Continue

Added by rajendra kumar on April 23, 2011 at 10:33am — No Comments

कविता :-खुली किताब हूँ मैं

कविता :-खुली किताब हूँ मैं…

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Added by Abhinav Arun on April 23, 2011 at 9:00am — 4 Comments

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