For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मनोज अहसास's Blog (149)

अधूरे गीत(कहन)______________मनोज कुमार अहसास

मन के सारे गीत अधूरे,फिर से तुझ को अर्पण है

तुझको मन की बात कहूँ मैं,ऐसा अब फिरसे मन है



मर्यादा का एक महल है जिसमे विरह का आँगन है

ख़ामोशी की एक चिता है पल पल जलता जीवन है



संबंधो में प्रेम कहाँ है प्रेम की अब वो रीत कहाँ

मित्र नयन से जुदा है काजल और तरसता दर्पण है



दुःख,पीड़ा,अवसाद,तपस्या,करुणा,संयम और साहस

उस जीवन में नैसर्गिक है इस जीवन में आयोजन है



टूट गयी है डोर विरह की कैसे कहन का रूप सजे

जीवन की इस भाग दौड़ में बस बेकार का… Continue

Added by मनोज अहसास on May 16, 2015 at 11:30pm — 8 Comments

यूँ ही

यूँही दिन तमाम गुजर गए, यूँही शामें ख़ाली निकल गयी

तेरे फैसले ना बदल सके, मेरी आरज़ू ही बदल गयी



कभी बदगुमानी ने डस लिया,कभी बेबसी ने तबाह किया

कभी फ़र्ज़ ओ रिश्तों की बंदिशे,मेरी ख्वाइशो को कुचल गयी



यहाँ कुछ नहीं है वफ़ा हया,ये हवस का भूख का सिलसिला

तेरे साथ मैंने जो की कभी,मुझे नेकियां वो निगल गयी



मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है,तेरे हौसलो का जुनून भी

कोई बात शेरों में ढल गयी,कोई बात आँखों में जल गयी



यही फैसला ना हुआ कभी,के वो कल था सच… Continue

Added by मनोज अहसास on May 14, 2015 at 6:00pm — 5 Comments

गुब्बारे

मेरी बेटी

तेरी खातिर ,

गुब्बारे लाने थे मुझको,

नीले, पीले,लाल,गुलाबी,

हरे,बैंगनी,खूब सजीले

बहुत सुनहरे और चमकीले

गुब्बारों के दाम बहुत थे

पास मेरे पैसे कुछ कम थे

पर

तेरे हिस्से का समय बहुत था....

दूर कहीं परदेस मे बेटी

तेरे जैसे बहुत से बच्चे

अँधियारो से जूझ रहे है

चमक रहे है,बुझ भी रहे है

तेरे हिस्से का समय मै गुड़िया

इन बच्चों में बाँट रहा हूँ

जिससे इनको रंग मिले

समता समानता स्वतंत्रता के

और खिल जाये इनका… Continue

Added by मनोज अहसास on May 12, 2015 at 3:36pm — 11 Comments

बेखुदी_______मनोज कुमार अहसास

ज़िन्दगी में गीत सारे दिल जलाने को लिखे

या फिर अपने इश्क़ को ही आज़माने को लिखे



बेखुदी में लिख दिया तेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर तुझको छिपाने को लिखे

(या)

बेखुदी में लिख दिया मेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर मुझको छिपाने को लिखे



और हमारी बेबसी का एक वाक्या ये भी है

हमने तुझको ख़त भी तो तुझसे छिपाने को लिखे



जिसने ये लिखकर दिया उम्मीद पर कायम है सब

वो घडी मिलने की भी अब दिल बचाने को लिखे



हम इसी दुनिया… Continue

Added by मनोज अहसास on May 10, 2015 at 5:20pm — 5 Comments

ज़रा सा

वो तेरे इश्क़ में दरिया होना
सिमटकर आज ज़रा सा होना

होश में आके हमने जाना है
कितना मुश्किल था तमाशा होना

तुमको देखा वो सब याद आया
क्या न हो पाना और क्या होना

गलतियां तुममे ढूंढ़ ली मालिक
हमसे हो पाया ना इन्सां होना

गुनाह इस ग़ज़ल का उतरना है
या फिर इसमें ना तेरा होना

तहज़ीब हमसे कोई निभ न सकी
ज़िन्दगी या के काफ़िया होना

मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on May 7, 2015 at 3:36pm — 5 Comments

देखते ही देखते

देखते ही देखते देखो समां क्या हो गया

आज अपना आप ही खुद से पराया हो गया



देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द

वो मेरी दुनिया का मालिक था जो दुनिया हो गया



मैंने उसके हिस्से की तन्हाइयां जब मांग ली

वो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तनहा हो गया



भूलने की कोशिशों में याद रखने की तलब

दो उलट लहरो में फंसकर पाट गहरा हो गया



उसके हाथो की लकीरो में न मेरा नाम था

और जो कुछ भी लिखा था वो भी धुंधला हो गया



रह गयी है पास मेरे दर्द… Continue

Added by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 3:21pm — 10 Comments

सामान

बार बार नुमाईश हुई

पर खरीदारों को सामान पसंद नहीं आया

सामान को काट छाँट कर दिखाया

सजा कर सँवारकर दिखाया

पर.......

फिर भी किसी खरीदार को सामान पसंद नहीं आया

बात कुछ और थी

बाजार सामान के साथ उपहार वाला बन गया है

उपहार भी दिये गए

पर खरीदारों की ज़रूरत पूरी नहीं हुई

सामान नोंचा कुचला गया

निचोड़ा गया और जलाया मिटा दिया गया

और फिर

एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में

एक मासूम लड़की को सामान कह… Continue

Added by मनोज अहसास on May 3, 2015 at 10:22pm — 10 Comments

फैसला

अब फैसला आखिर मे सारी बात का मिला

दिन की थकन के बाद सफ़र रात का मिला



घर से यूँ लौट आता हु मैं दो दिनों के बाद

कैदी को जैसे वक़्त मुलाकात का मिला



मालिक तू है कहाँ मेरी आँखे तरस गयी

लेकिन पता न मुझको मेरी जात का मिला



आयी सुबह ज़रूर मगर बादलो के साथ

अंजाम ये बरसो से लंबी रात का मिला



इस बात का नहीं मुझे कुछ भी पता चला

क्यों जीत में ये रँग हमे मात का मिला



फिर आज मैंने खुद को सताया है देर तक

एक शख़्श मुझको मेरी औकात का… Continue

Added by मनोज अहसास on May 2, 2015 at 2:00pm — 10 Comments

छटपटाहट

हर तरफ है छटपटाहट बोलता कोई नहीं
या हमारी मुश्किलो को जानता कोई नहीं
वो बहुत मज़बूर है या देने की नियत नहीं
या हमारी ख्वाहिशो की इंतहा कोई नहीं
वो अपनी मिट्ठी ज़ुबा से फिर तसल्ली दे गया
और हमारे दर्द की यारो ज़ुबा कोई नहीं
अपने जी का दर्द हम किस्से कहे तू ये बता
अपना तो तेरे शहर में तेरे सिवा कोई नहीं
उसने एक फहरिसित् दी है अपने रिस्तेदारो की
नाम मेरा भी लिखा आगे लिखा कोई नहीं




मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on April 28, 2015 at 5:17pm — 3 Comments

Monthly Archives

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गिरह सहित सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"2122, 1212, 112**बिसलरी पा  नदी को भूल गयाहर अधर तिस्नगी को भूल गया।१।*पथ की हर रौशनी को भूल…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"सादर अभिवादन।"
6 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला वो किसी को भूल गय इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा रात को इक और फिर रात…"
10 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"सादर अभिवादन "
11 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"स्वागतम"
11 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रस्तुति का सहज संशोधित स्वरूप।  हार्दिक बधाई"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त चित्र को आपने पूरे मनोयोग से परखा है तथा अंतर्निहित भावों को…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद  परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाईजी, चौपाई छंद में आपने प्रदत्त चित्र को उपयुक्त शब्द दिये हैं. सुगढ़ रचना के…"
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service