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अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास

221  2121   1221    212

क्या है मेरे होठों की दुआ मैं भुला चुका.
किस तरह मानता है ख़ुदा मैं भुला चुका.

मेरे सभी गुनाहों को अब तू भी भूल जा,
तुझसे हुई है जो भी खता मैं भुला चुका.

असली खुशी दबी पड़ी है गर्त में कहीं,
अब उसको ढूंढने की अदा मैं भुला चुका.

नज़दीक से गुज़र के मेरे देख ले कभी,
वो तेरी रहबरी की हवा मैं भुला चुका.

मुझको पुकार ने की तो आदत सी हो गई,
पर किसको दे रहा हूँ सदा मैं भुला चुका.

इतना फरेब दुनिया में है ए मेरे ख़ुदा,
उस दिलफरेब दिल की दग़ा मैं भुला चुका.

तुमने तो कह दिया है ,मुझे है गमों का शौक,
कैसे करूँ मैं खुद को रिहा मैं भुला चुका.

इतना उलझ गया हूँ मैं जीवन के जाल में,
आएगी एक दिन जो कज़ा मैं भुला चुका.

तुम ही नहीं भूले हो कई बात बेहतरीन,
खुद अपनी ही क़लम का लिखा मैं भुला चुका.

उस कमनसीब यार का मैं जिक्र क्या करूँ,
जो हँस के कह रहा है वफ़ा मैं भुला चुका.

जाकर मैं किस दयार पर पटकूँ ये भारी सर,
बेआस होके सब का पता मैं भुला चुका.

मेरे सिमटते साए को आकर कभी तो देख,
अपनों की उलझनों का नशा मैं भुला चुका.

सन दो हज़ार बीस रहा है गुज़र हुज़ूर,
सोलह बरस पहले का समाँ मैं भुला चुका......

मौलिक और अप्रकाशित

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