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Sushil Sarna's Blog (902)

दिल में सोंधी महक … (एक हास्य रचना )

दिल में सोंधी महक (एक हास्य रचना )

अरे! ये क्या हुआ

कल ही तो वर्कशाप मेंठीक करवाया था

टेस्ट ड्राईव भी करवाई थी

कार्य प्रणाली

बिलकुल ठीक पाई थी

माना टक्कर बहुत भारी थी

कई टुक्क्डे हो गए थे

मगर वर्कशाप में

कमलनयनी ब्रांड के नयनों के फैविकोल से

टूटे दिल के टुकड़े अच्छी तरह चिपकाए थे

उसकी मधुर मुस्कान ने ओके किया था

दिल फिर

अपनी ओरिजनल कंडीशन…

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Added by Sushil Sarna on June 24, 2014 at 1:30pm — 16 Comments

मैं बहुत जीता हूँ, …….

मैं बहुत जीता हूँ, …….

जीता हूँ ….

और बहुत जीता हूँ …..

ज़िन्दगी के हर मुखौटे को जीता हूँ //

हर पल …..

इक आसमाँ को जीता हूँ ……

हर पल …….

इक जमीं को जीता हूँ //

मैं ज़मीन -आसमाँ ही नहीं …..

अपने क्षण भंगुर …..

वजूद को भी जीता हूँ //

कभी हंसी को जीता हूँ ….

तो कभी ग़मों के जीता हूँ …..

जिंदा हूँ जब तक …..

मैं हर शै को…

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Added by Sushil Sarna on June 22, 2014 at 8:30pm — 22 Comments

अहं के ताज़ को

अहं के ताज़ को ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निशिचित है

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर…

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Added by Sushil Sarna on June 19, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ

तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ

बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी

राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

तुम्हारे वाद-ए-फ़र्दा पर ..यकीं करूँ कैसे

हर दीद में इक तिश्नगी ..अजीब पाता हूँ

कूए कातिल से गुजरना ..आदत है मेरी

अपने ज़ख्मों में .अपना अज़ीज़ पाता हूँ

रूए-ज़ेबा को भला ज़हन से भुलाऊँ कैसे

बिन तुम्हारे तो मैं खुद को गरीब पाता…

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Added by Sushil Sarna on June 17, 2014 at 4:30pm — 20 Comments

3 मुक्तक

3 -मुक्तक

1.

हर रंज़ पे .मुस्कुराता हूँ

तन्हा तुझे गुनगुनाता हूँ

किस रंग पे मैं यकीं करूँ

हर रंग से फ़रेब खाता हूँ

..................................

2.

हर तरफ बाज़ार नज़र आता है

हर रिश्ता लाचार नज़र आता है

अब गुल नहीं महकते बहारों में

हर शाख़ पर ख़ार नज़र आता है

.......................................................

3.

रास्ते बदल जाते हैं ...तूफाँ जब आते हैं

यादों के अब्र में ...अरमाँ पिघल जाते हैं

रुकते नहीं अश्क.…

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Added by Sushil Sarna on June 12, 2014 at 1:00pm — 18 Comments

अपने मौसम को ………

अपने मौसम को ………

तुम ही तो थे

मेरे नेत्रों के वातायन से

असमय विरह पीर को

बरसाने वाले

मुझे अपने बाहुपाश में

प्रेम के अलौकिक सुख का

परिचय कराने वाले

मेरी झोली में विरह पलों को डालने वाले

क्या आलिंगन के वो मधुपल भ्रम थे

पर्दे के पीछे मेरी विरह वेदना को

सिसकियों में पिघलते

मूक बन कर देखते रहे

क्यों एक बार भी हाथ बढ़ा कर

मेरे व्यथित हृदय को

ढाढस…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2014 at 4:56pm — 16 Comments

मैं मूक बन जाती हूँ …।

मैं मूक बन जाती हूँ …।

नहीं, अब मैं इस गहन तम में नभ को न निहारूंगी

अपनी अभिलाषाओं को तम के गहन गर्भ में दबा दूंगी

दर्द की नमी को पलकों में ही दफना दूंगी

अपने गिले -शिकवों का बवंडर अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूंगी

कितना विशवास था

तुम तो मेरे हृदय की टीस को पहचानोगे

यौवन की दहलीज़ पर पाँव रखते ही

हर निशा मैं तुम्हें निहारती थी

शशांक मेरे पागलपन पर मुस्कुराता था

पवन मुझे…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2014 at 12:39pm — 18 Comments

जिसका वो अंश है ……

जिसका वो अंश है ……

कौन है ज़िंदा ?

वो मैं,जो सांसें लेता है

जिसका प्रतिबिम्ब दर्पण में नज़र आता है

जो झूठे दम्भ के आवरण में जीवन जीता है

या

वो मैं जो अदृश्य हो कर भी सबमें समाया है

न जिसकी कोई काया है

न जिसका कोई साया है

कितना विचित्र विधि का विधान है

एक मैं, नश्वरता से नेह करता है

एक मैं, अमरत्व के लिए मरता है

मैं के परिधान में जो मैं ज़िंदा है

वही प्रभु का सच्चा परिंदा है …

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Added by Sushil Sarna on May 31, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं ……

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं ……

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं

प्रीतम तुझ को कैसे बुलाऊँ

पल-पल ..तेरी राह निहारूं

एकांत पलों में तुझे पुकारूं

जीने की कोई आस बता दे

किस मूरत से .नेह लगाऊं

खुद रूठूँ और खुद मन जाऊं

प्रीतम तुझ को .कैसे बुलाऊँ

भोर व्यर्थ मेरी .साँझ व्यर्थ है

तुझ बिन मेरी प्यास व्यर्थ है

अंबर के घन .कुछ तो कह तू

कैसे नयन का ...नीर…

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Added by Sushil Sarna on May 30, 2014 at 3:07pm — 12 Comments

आये अज़ल जिस गोद में ……

आये अजल जिस गोद में  ……

कितने निर्दयी हो तुम

दबे पाँव आते हो

मेरे खामोश लम्हों को

अपनी यादों से झंकृत कर जाते हो

झील की लहरों पे चाँद

लहर लहर मुस्कुराता है

मेरी बेबसी को गुनगुनाता है

सबा मेरे गेसुओं से लिपट

मेरी ख़्वाहिशों को बार बार ज़िंदा कर जाती है

तुम्हारे मुहब्बत में डूबे लम्स

मेरे लबों पे कसमसाते हैं

मगर तड़प के इन अहसासों को तुम न समझोगे

तुम क्यों नहीं समझते

मेरे तमाम…

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Added by Sushil Sarna on May 29, 2014 at 1:00pm — 20 Comments

हर पतझड़ को ……

हर पतझड़ को ……

ज़िंदगी को ..हर मौसम की जरूरत होती है

उजालों को भी ...अंधेरों की जरूरत होती है

क्यों सिमटे नहीं सिमटते वो बेदर्द से लम्हे

चश्मे अश्क को .खल्वत की ज़रुरत होती है

रात के वाद-ऐ-फ़र्दा पे ..यकीं भला करूँ कैसे

यकीं को भी इक समर्पण की जरूरत होती है

मिट गयी सहर होते ही वो रूदाद-ऐ-मुहब्बत

रूहे- मुहब्बत को आगोश की जरूरत होती है

हिज़्र की सिसकियों से है नम रात का दामन

सोहबते -लब को…

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Added by Sushil Sarna on May 20, 2014 at 1:00pm — 20 Comments

प्यार भी करते हो …

प्यार भी करते हो …



प्यार भी करते हो तो शर्तों पे करते हो

लगता है तुम शायद मुहब्बत के अंजाम से डरते हो

क्यों मुड़ मुड़ के अपने निशां तका करते हो

क्यों ज़माने के खौफ को दिल में रखा करते हो

कभी इकरार से तो कभी इंकार से डरते हो

न, न

ऐसे तो प्यार न हो पायेगा

पानी के बुलबुले सा ये प्यार

वक्त की लहरों में खो जाएगा

अहसास कभी शर्तों में समेटे नहीँ जाते

शर्त और सौदे तो बाज़ारों में हुआ करते हैं

समर्पण बाज़ारों में कहां हुआ करते हैँ

इससे…

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Added by Sushil Sarna on May 15, 2014 at 4:00pm — 8 Comments

नैन समर्पण ....

नैन समर्पण ....

नैन कटीले होठ रसीले
बाला ज्यों मधुशाला
कुंतल करें किलोल कपोल पर
लज्जित प्याले की हाला
अवगुंठन में गौर वर्ण से
तृषा चैन न पाये
चंचल पायल की रुनझुन से मन
भ्रमर हुआ मतवाला
प्रणय स्वरों की मौन अभिव्यक्ति
एकांत में करे उजाला
मधु पलों में नैन समर्पण
करें प्रेम श्रृंगार निराला

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 6, 2014 at 5:30pm — 18 Comments

किसका साया ……

किसका साया ……

किसका साया मुझे जीने कि सज़ा देता है

कफ़स में आरज़ू की .रूह को क़ज़ा देता है

पेशानी पे बहारों की .अलम लिखने वाली

कौन मेरी आँखों को नमी की क़बा देता है

थी जब तलक साथ तो ज़िंदगी हसीन थी

अब दर्दे हिज़्र मुझे .हर लम्हा रुला देता है

मेरे ख्वाबों के शबिस्तानों में ..रह्ने वाली

बेवफा लौ मेँ पतंगा .खुद को जला देता है

बेवजह मेरे अश्कों की ..वज़ह बनने वाली

कौन मुझे कफ़न मेँ साँसों की दुआ देता…

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Added by Sushil Sarna on May 5, 2014 at 5:36pm — 14 Comments

मुहब्बतों की ज़मीन पर ....

मुहब्बतों की ज़मीन पर ....

वो जागती होगी

यही सोच हम तमाम शब सोये नहीं

चुरा न ले सबा नमीं कहीं

हम एक पल को भी रोये नहीं

वो रुख़्सत के लम्हात,वो अधूरे से जज़्बात

बंद पलकों की कफ़स में कैद वो बेबाक से ख्वाब

क्या वो सब झूठ था

क्यों पल पल के वादे हकीकत की धूप में

हरे होने से पहले ही बेदम हो कर झरने लगे

अटूट बंधन के समीकरण बदलने लगे

खबर न थी कि हमारी खुद्दारी

हमें इस…

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Added by Sushil Sarna on May 1, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

काफी हाऊस.......

जमघट था हर ओर वहां

हर ओर अजब सा शोर था

छल्ले धुऐं के थे कहीं

और कहीं वाद विवाद का जोर था

एक अजनबी से बने

एक मूक दर्शक की तरह

हम कुर्सी की तलाश में

भीड़ से हट कर

एक कोनें में खडे

बार बार अपना

चश्मा साफ़ कर

इधर उधर

बार बार झाँक कर

पलकों के भीतर

आँखों की पुतलियों को

डिस्को करवा रहे थे

तभी एक कुर्सी खाली हुई

ओर हमने तुरत फुरत में

एक लाटरी की तरह

उसे झपट लिया

और एक गहरी सांस के साथ बैठ गये…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2014 at 4:00pm — 14 Comments

अश्क आँखों में …

अश्क आँखों में …

अश्क आँखों में हमारी ......हैं निशानी आपकी

जान ले ले न हमारी .......ये बेज़ुबानी आपकी

आपकी खामोशियों का ......शोर अब होने लगा

हो न जाए आम ये .....दिल की कहानी आपकी

लाख चाहा अब न देखें ...आपके ख़्वाबों को हम

क्या करें कम्बख़्त नीदें भी ...हैं दिवानी आपकी

आप मुज़मिर हैं हमारी ...रातों की तन्हाईयों में

बिस्तर की सलवटों में हैं ...यादें सुहानी आपकी

जीने के वास्ते जिस्म से ..सांसें ज़ेहद…

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Added by Sushil Sarna on April 19, 2014 at 3:26pm — 2 Comments

वो गयी न ज़बीं से

वो गयी न ज़बीं से …

आबाद हैं तन्हाईयाँ ..तेरी यादों की महक से

वो गयी न ज़बीं से .मैंने देखा बहुत बहक के

कब तलक रोकें भला बेशर्मी बहते अश्कों की

छुप सके न तीरगी में अक्स उनकी महक के

सुर्ख आँखें कह रही हैं ....बेकरारी इंतज़ार की

लो आरिज़ों पे रुक गए ..छुपे दर्द यूँ पलक के

ज़िंदा हैं हम अब तलक..... आप ही के वास्ते

रूह वरना जानती है ......सब रास्ते फलक के

बस गया है नफ़स में ....अहसास वो आपका

देखा न एक…

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Added by Sushil Sarna on April 17, 2014 at 5:13pm — 10 Comments

हिज्र में भी उसकी याद ……

हिज्र में भी उसकी याद ……

आज वो रहगुज़र ..हमें बेगानी सी लगती है

उनके वादों पे यकीं इक नादानी सी लगती है

इक वाद-ऐ-फ़र्दा के साथ उनका यूँ ज़ुदा होना

फिर इंतज़ार उनका इक कहानी सी लगती है

जिनकी आमद से ख़ल्वत जलवत हो जाती थी

दीद-ओ-दिल में वही मूरत .पुरानी सी लगती है

दम भरती थी जो सदा जन्नत तक साथ देने का

तसव्वुर में उसकी तस्वीर .अंजानी सी लगती है

आज मेरे ख्वाब में वो इक शरर बनके चमकी है

हिज्र में भी…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2014 at 4:34pm — 10 Comments

वो पलकों की चिलमन …

वो पलकों की चिलमन …

वो पलकों की  चिलमन  उठा के गिराना

वो आँचल  के  कोने  को  मुंह में दबाना

ज़हन में  है  ज़िंदा  वो मंज़र मिलन का

भला   कैसे   भूलूं  मैं  उसका   मनाना

मुहब्बत की   रूदाद क्यूँ अश्कों में भीगी

क्यूँ होता है मुहब्बत का दुश्मन ज़माना



गुजरती है करवट में तमाम शब हमारी

सलवटों में सिसकता है दिल का फ़साना

रंज होता है क्या ये न जाने थे अब…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2014 at 7:30pm — 15 Comments

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