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Dr. Vijai Shanker's Blog (202)

जो चाहेगा वो हंस लेगा - डॉo विजय शंकर

बातें ,
वादे ,
इरादे ,
जब पूरे न हों
तो बात बदल दो ,
इरादे बदल दो ,
चुटकुले सुना दो,
लोगो को हंसा दो ,
इस पर हंस लो ,
उस पर हंस लो ,
जिस पर चाहो
उस पर हंस लो ,
खुद पर हंस लो।
खुद पर ?
खुद पर क्यों ?
नहीं , खुद पर मत हंसो।
ये काम कल कोई और कर लेगा ,
जो चाहेगा वो कर लेगा ,
जो चाहेगा वो हंस लेगा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on May 22, 2017 at 12:28pm — 1 Comment

सही - गलत -- डॉo विजय शंकर

हम इसके गलत की बात करते हैं
उसके गलत की बात नहीं करते हैं ,
हम इसके उसके की बात करते हैं
सही गलत की बात नहीं करते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on May 8, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

चुनावी बहार - डॉo विजय शंकर

वाह रे तेरे लटके ,
वाह रे तेरे झटके ,
वाह रे तेरे फटके ,
वाह रे तेरा हँसना ,
वाह रे तेरा रोना ,
वाह रे तेरा धोना ,
वाह , एक दूसरे को धोना ,
अंत में सबका खूब
धुला धुला होना ,
वाह रे तेरा बेचैन होना ,
वाह रे तेरा चैन से सोना ,
वाह रे तेरा रूठना ,
वाह रे एक दूजे को मनाना ,
वाह रे तेरे आंसू , कितने
जबरदस्त कितने धांसू ,
जय जय जय हो .......

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 24, 2017 at 6:28pm — 7 Comments

क्षणिकाएं (171 ) - डॉo विजय शंकर

प्यार भी कितना
अजीब होता है ,
वहां भी होता है
जहां नहीं होता है ,
तब भी होता है ,
जब नहीं होता है।......1.

नाराज़गी की
सौ वजहें होतीं हैं ,
एक प्यार है
जो बिला वजह होता है।.....2.

इस बेवफ़ाई की
कोई तो वजह होगी ,
हमारी ही वफ़ा में
कुछ कमी रह गई होगी। ......3.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 10, 2017 at 6:16am — 12 Comments

हे लोकतंत्र के निर्माता - डॉo विजय शंकर

हे लोकतंत्र के निर्माता
नेताओं के भाग्यविधाता ,
तंत्र के मायाजाल से अंजान
तुम्हें ही लोकतंत्र नहीं आता।
वो दूर मंच से तुम्हें ,
शब्दों के लॉलीपॉप दिखाता ,
कोरे रंगीन सपने दिखाता और
मन ही मन अपने सपने सजाता ,
हाथ जोड़ कर तुमसे उन्हें पूरे कराता ,
और पांच साल के लिए
तुम्हारा ही भाग्यविधाता बन जाता।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 7, 2017 at 8:46pm — 12 Comments

स्वागत नव् वर्ष का .....डॉo विजय शंकर

जीना ,
जीने से बढ़ कर
जीने की इच्छा ,
इच्छा के साथ
और इच्छायें ,
आशायें , उम्मीदें।
एक आस , हर
आनेवाले दिन से ,
वर्ष से .........
स्वागत नव् वर्ष का .......
कुछ अर्पण के लिए
कुछ समर्पण के भाव लिए
कुछ नये वादों के साथ ,
कुछ दृढ़ इरादों के साथ ....
स्वागत नव् वर्ष का .......

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 30, 2016 at 8:43pm — 11 Comments

सपने -- डॉo विजय शंकर

सपने देखने में
कुछ नहीं जाता है ,
टूट जाएँ तो कुछ
रह भी नहीं जाता है।
इसलिए सपने देखें नहीं ,
हमेशा दूसरों को दिखाएं ,
सुन्दर , लुभावने , बड़े-बड़े ,
पूरे हों तो वाह , .. न हों ,
आपका कुछ नहीं जाता है ,
लेकिन इलेक्शन अकसर
इसी फार्मूले पे जीता जाता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 28, 2016 at 10:55am — 10 Comments

आँधियाँ ( लघु-कविता ) - डॉo विजय शंकर

ये कुदरत है ,
रुख , दाब हवा का संतुलन
बिगाड़िये मत , बना रहने दीजिये।
आँधियाँ किसी के बुलाये ,
लाये से , नहीं आतीं ,
और आ जाएँ तो
किसी के भगाये से नहीं जातीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 27, 2016 at 6:06am — 12 Comments

चाहतें - क्षणिकाएं -- डॉo विजय शंकर

ज़िन्दगी बोझ थी नहीं
अपनी ही चाहतों से
एक बोझ बना लिया
हमने ..............1.

सच में ,
चाहना तुझको था ,
तुझसे ही चाहते
रह गए .............2.


ज़िन्दगी भर
ज़िन्दगी को
ढूंढते रहे ,
वो मिली भी नहीं
और हम ज़िंदा भी रहे .....3.


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 24, 2016 at 6:47am — 15 Comments

बड़ी बात , छोटी सी कविता - डॉo विजय शंकर

हुकूमतें लाजवाल
हाकिम कामयाब
जनता त्रस्त बेहाल ,
अपने अपने नसीब हैं।

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on November 7, 2016 at 7:57am — 4 Comments

समस्या - समाधान ( लघु-कथा ) -- डॉo विजय शंकर

राजा बहुत चिंतित था। चिंतायुक्त विचार विमर्श के लिए वह अपने राजपरिवार के गुरु जी के पास निर्जन वन में गया। कुशल क्षेम के बाद बोला , " गुरु जी , मेरे राज्य में बहुत से बाबा हो गए हैं , प्रजाजन भी उनके पास अक्सर जाते हैं , उनसे आशा करते हैं कि वे परलोक छोड़ इहि लोक में भी उनका कल्याण करेंगे ? क्या ये सही है , वे क्यों जाते हैं ? "
गुरु जी बोले , " क्योंकि तुम उनका अभीष्ट कल्याण नहीं करते हो ,तुम उनका कल्याण करो। फिर देखो।"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 17, 2016 at 7:27am — 12 Comments

हिट-पिट , गिटपिट -- डॉo विजय शंकर

हिट हिटा हिट हिट

पिट पिटा पिट पिट

ये भी एक अज़ब दौर है

क्या हो जाए कब हिट

क्या जाये कब पिट

पब्लिक की च्वॉइस

मीडिया की वॉयस।

जिस नेता की जयंती बरसी

दो दिन उसकी बातें हिट।

जिससे हो अपना भला ,

हो अपना मामला फिट

वही हिट, वही हिट, वही हिट ,

बाकी सब गिटपिट गिटपिट।

ये बड़ी ख़बर , वो ख़बर हिट ,

गाना हिट , पिक्चर हिट ,

विचार हिट , डायलॉग हिट

मेकियावली हिट , चाणक्य हिट ,

ये नेता हिट ,उसका घोर विरोधी भी हिट… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2016 at 9:15am — 4 Comments

तंत्र-मन्त्र-यंत्र--- डॉo विजय शंकर

तंत्र को नैये-नैये मंत्र मिल रहे हैं ,

सफलता और विकास के नैये-नैये

शब्दकोष रचे जा रहे हैं ,

शब्द , नैये-नैये अर्थ पा रहें हैं ,

अर्थ , पुरुषार्थ में पुरोधा बन रहे हैं।

पा लें , सब पा लें की होड़ लगी हैं ,

क्या खो रहें हैं , देख नहीं पा रहें हैं।

सत्ता , मद - यामिनी ,

सिंहासन , पद - वाहिनी ,

जब डोलता है तो ,

डोलता हुआ नहीं लगता है ,

झूला झुलाता हुआ लगता है ,

जागो , जागते रहो , कहनेवाला ,

खुद नींद में सोया-सोया लगता है।

आगे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2016 at 7:35am — 8 Comments

मुद्रा स्फीति --डॉo विजय शंकर

( नवीन मुद्रा के आगमन पर स्वागत सहित, अचानक प्रस्तुत )



कैसे गायब हो जाते हैं छोटे सिक्के ,

पाई , अधेला , धेला , दाम ,

छेदाम , पैसा , दो पैसा ,

इक्कनी , दुअन्नी , चवन्नी ,

गला कर उन्हें तांबे ,

पीतल में ढाल लेते हैं।

कहते हैं , उनकी खरीदने की

ताकत ख़तम हो जाती है ,

या उनकीं अपनी कीमत बढ़ जाती है ?

हमारी समझ घट जाती है ,

तभी तो वे पुराने सिक्के

चलन में आज मिलते नहीं ,

कहीं मिल जायें तो

सौ, दो सौ , हजार , दस हजार… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 16, 2016 at 11:10pm — 12 Comments

पर्दा जो कभी रहा ही नहीं ( लघु - कथा ) - डॉo विजय शंकर

यह चार लाइनों की छोटी सी एक युग-युगीन लघु-कथा है।

एक ऐसे देश-राज्य की जिसमें कहीं कुछ भी परदे के पीछे नहीं रहा है , जो रहा है , सब परदे के सामने रहा है , गौर से देखें , सच में कहीं कभी कोई पर्दा रहा ही नहीं।

बस सबने अपनी-अपनी आँखों पर स्वयं पर्दा डाल रखा है।

व्यवस्था में सबसे ऊपर धृष्टराष्ट्र आसीन रहा है जो कुछ भी हो जाए , हर बात पर एक ही बात कहता है , "कोई मुझे भी तो बताओ , क्या हुआ , क्या हो रहा रहा है ? "

और उधर सीकरी से दूर , बहुत दूर ,प्रजा तानपूरा बजा कर सूरदास के पद… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 16, 2016 at 9:30pm — No Comments

फर्क़ - डॉo विजय शंकर

अमीर उम्र भर रोता रहा
हाय ये भी मिल जाता ,
हाय वो भी मिल जाता ,
ये ये मिलने से रह गया ,
वो चाहा बहुत मिला नहीं।
बस एक गरीब ही है ,
जिसे यही पता नहीं ,
उसने क्या खोया ,
उसे क्या मिला नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 28, 2016 at 10:54am — 2 Comments

संतुलन - डॉo विजय शंकर

जोड़-तोड़ खूब कर लेते हो।
जहां तोड़ लेना चाहिए ,
वहीं जोड़ लेते हो ,
समस्या को निपटा नहीं पाते ,
लिपटा लेते हो , गले लगा लेते हो।
उसी का राग अलापते हो ,
गीत गाते हो , छोड़ते नहीं ,
अलबत मौक़ा मिलते ही भुना लेते हो।
जिनको जोड़ लेना चाहिए ,
उन्हें भूले रहते हो।
संतुलन बनाये रखते हो।
कहते हो , राजनीति है ,
कर लेते हो।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 22, 2016 at 10:24am — 20 Comments

रक्षा का बंधन ( लेख ) - डॉo विजय शंकर

रक्षा बंधन बहन-भाई के पारस्परिक स्नेह , प्रेम , एक दूसरे के प्रति जीवन-पर्यन्त चलने वाले दायित्व बोध का एक अत्यंत खुशनुमा पर्व। शायद इसी का एक रूप विकसित हुआ है ," फ्रेंडशिप बैंड " . राखियों का विशाल बाजार , हीरे और अन्य रत्नों से जड़ी लाख लाख रुपये की राखियां, दिल्ली जैसे महानगर में रक्षा बंधन के दिन ट्रैफिक का भर-पूर रश , डी टी सी द्वारा प्रायः बहनों के लिए रक्षा - बंधन को फ्री-सर्विस। कितना सुन्दर लगता है , सब कुछ। एक दिन भाई के लिए , बहन के लिए , वैसे ही जैसे सारी दुनियाँ में एक साथ " मदर्स… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 17, 2016 at 8:31pm — 2 Comments

आख़िरी आदमी (लघु-कथा) - डॉo विजय शंकर

भाषण अपने चरम पर था। विशाल जन - समूह पूरे मनोयोग से सुन रहा था।
उन्होंने कहा:

"भाइयों! पार्टी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और उच्च पद रिक्त है, मैंने निर्णय लिया है कि यह पद हमारे साथियों में सबसे पीछे खड़े आख़िरी आदमी को दिया जाएगा " .
उनका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ कि सब लोग पीछे की ओर भागने लगे। पूरा मैदान खाली हो गया, मंच खाली हो गया, वे मंच पर अकेले रह गए।
खबर आयी है , लोग एक और भागे जा रहे हैं , बस भागे जा रहे हैं।
.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 10, 2016 at 10:00am — 26 Comments

पहले आप - डॉo विजय शंकर

पहले आप

पहले आप

एक तहजीब थी ,

अंग्रेजी में ,

ऑफ्टर यू ,

एक ही बात ,

आपके बाद।

आपका दौलत खाना ,

ख़ाकसार का गरीबखाना ,

आपके करम ,

बन्दे की खिदमत।

हम कुछ भी हों ,

आपके आगे कुछ नहीं।

वक़्त बदल गया।

पर सब कुछ वैसा ही है ,

तहज़ीब के पैमाने वही।

आपके आगे हम

आज भी कुछ नहीं ,

कुछ नहीं करने में

आप हमसे आगे ,

आपके घोटाले बड़े ,

इतने कि धरती धकेल दें ,

आप आगे , हम बहुत पीछे।

कामचोरी में आप… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 7, 2016 at 10:57am — 2 Comments

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