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कुमार गौरव अजीतेन्दु's Blog (62)

भूख : दोहे

(१) रंक जले राजा जले, कौन सका है भाग |

सबके अंदर खौलती, एक क्षुधा की आग ||

(२) ज्वाल क्षुधा में वो भरी, कहीं न ऐसा ताप |

जल के जिसमें आदमी, कर जाता है पाप ||

(३) भूख बड़ी बलवान है, ना लेने दे चैन |

दौड़ें सब इसके लिए, दिन हो चाहे रैन…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 22, 2012 at 8:51pm — 12 Comments

व्यथा जमाई की (हास्य) : मनहरण घनाक्षरी

ससुर जी ये कब का, तूने बैर है निकाला,

काहे अपनी बेटी को, सर पे मेरे डाला |

लड़की है वो या फिर, बकबक की टोकरी,

साल भर हुआ नहीं, सरका है दिवाला |

पाक कला ज्ञात नहीं, देर जगे बात…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 21, 2012 at 7:11pm — 24 Comments

सड़क बुलाती है

सड़क बुलाती है,

आओ...मेरा अनुसरण करो,
छोड़ो न कभी मुझे,
भटक जाओगे रास्ता,
मुश्किल हो जाएगा
मंजिल…
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 19, 2012 at 7:30pm — No Comments

हे वनराज ! तुम निंदनीय हो !

हे वनराज ! तुम निंदनीय हो !

अक्षम हो प्रजारक्षा में,

असमर्थ हो हमारी प्राचीन

गौरवपूर्ण विरासत सँभालने में ;

आक्रांता लाँघ रहे हैं सीमायें,

नित्य कर रहे हैं अतिक्रमण

हमारी भावनाओं का,…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 17, 2012 at 1:16pm — 6 Comments

दामिनी (मनहरण घनाक्षरी)

नैनों तेरी छवि बसी, मन तेरे गुण गाए,

फिर काहे तू दामिनी, रूठ मुझे सताए |

पल भर तेरी दूरी, दे मुझको तड़पाए,

ठंढी-ठंढी आहें भरूँ, कहीं जिया न जाए |

बिन तेरे ऐसे लगे, फूल भी शूल…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 15, 2012 at 10:44pm — 2 Comments

देशगीत (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

जो कह गए शहीद, चलो उसको दुहराएँ |

आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

है दिन जिसको वीर, जीत कर के लाए थे,

चट्टानों को चीर, मौत से टकराए थे |

कर लें उनको याद, जिन्होंने शीश कटाए,

आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 11, 2012 at 8:21am — 8 Comments

श्रीकृष्ण आराधना

जय श्रीकृष्ण देवकीनंदन | हूँ कर जोड़े, करता वंदन ||

दुख-विपदा से आप निवारो | मेरे बिगड़े काज सँवारो||

भगवन जग है तेरी माया | कण-कण तेरा रूप समाया ||

जगत नियंता, हे करुणाकर | तेरी ज्योति चंदा-दिवाकर ||

देवराज आरती उतारें | नारद जय-जयकार उचारें ||…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 10, 2012 at 6:45pm — 12 Comments

कुण्डलिया : धोती मुनिया फर्श को.....

धोती मुनिया फर्श को, मुन्ना माँजे प्लेट |

कल का भारत देख लो, ऐसे भरता पेट ||

ऐसे भरता पेट, और ये नेता सारे,

चलते सीना तान, लगा के जमकर नारे |

नहीं तनिक है शर्म, कहाँ है जनता सोती,…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 7, 2012 at 6:00pm — 18 Comments

दोहे : आत्मावलोकन

१. नहीं किसी से हूँ चिढ़ा, आता खुद पे रोष |

मुझमें ही सारी कमी, मुझमें सारा दोष ||

२. मैं ही पूरा आलसी, सोता हूँ दिन-रात |

नहीं ठहरती जीत तो, कौन अनोखी बात ||

३. मुझमें ही है वासना, मुझमें है आवेश |

मक्कारी की खान मैं, धर साधू का वेश ||

४. मन को कलुषित कर लिया, लाता नहीं सुधार |

हरा दिया हठ ने मुझे, कर डाला लाचार ||

५. करने थे सत्कर्म पर, किये बहुत से पाप |

इतना नीचे हूँ गिरा, सोच न सकते आप ||

६. जीत गई हैं इन्द्रियाँ, मिली मुझे है हार…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 6, 2012 at 11:08pm — 10 Comments

दुःख

तृष्णा की कोख से जन्मा

वासनाओं के साये में पला

एक मनोभाव है दुःख ;

सांसारिक माया से भ्रमित

षटरिपुओं से पराजित

अंतस की करुण पुकार है दुःख ;

स्वार्थ का प्रियतम

घृणा का सहचर

भोगलिप्सा की परछाई है दुःख ;

वैमनस्य का मूल्य

भेदभाव का परिणाम

आलस्य का पारितोषिक है दुःख ;

अधर्म से सिंचित

अमानवीय कृत्यों की

एक निशानी है दुःख ;

कलुषित मन की

कुटिल चालों का

सम्मानित अतिथि है दुःख ;

निरर्थक संशय से उपजी

मानसिक स्थिति का

एक नाम…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 8:23pm — 22 Comments

किसान

किसान,

प्रतीक अथक श्रम के

अतुल्य लगन के ;

प्रमुख स्तंभ

भारतीय अर्थव्यवस्था के,

मिट्टी से सोना उगानेवाले

आज उपेक्षित हैं

परित्यक्त हैं…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 4, 2012 at 10:45am — 12 Comments

हे मनुज! तुम दिया बनो

हे मनुज! तुम दिया बनो
वो दिया...जो जलता है
प्रकाश के लिए, 
नवनिर्माण के लिए,
भटके को राह दिखाने के लिए,
प्रभु की आराधना के लिए,
हे आर्य! आत्मसात कर लो
इसके गुणों को,
अपना लो इसका स्वभाव,
प्रतीक बनो क्रांति के आगमन का,
सूचक हो परिवर्तन का,
मिटा…
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 3, 2012 at 10:00pm — 12 Comments

दोहे : छोड़ धुँए का पान

१. फूँक रहा क्यों जिन्दगी, ऐ मूरख इंसान |

मर जाएगा सोच ले, छोड़ धुँए का पान ||



२. बीड़ी को दुश्मन समझ, दानव है सिगरेट |

इंसानों की जान से, भरते ये सब पेट ||



३. शुरू-शुरू में दें मजा, कर दें फिर मजबूर |

चले काम या ना चले, ये चाहिए जरूर…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 1, 2012 at 8:00am — 8 Comments

हाइकु बक्सा : बहन बोली भाई से.......

१. बाँधी है राखी
भैया लाज रखना
रक्षा करना
 
२. धागा नहीं ये
बंधन है प्यार का
मान रखना
 …
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 26, 2012 at 6:48pm — 14 Comments

ओ विषधर! तुझमें कितना जहर है

तीखा विषैला हुआ आज नर है |
ओ विषधर! तुझमें कितना जहर है ||
 
जिसका काटा नहीं मांगे पानी,
विष थूकने में ना कोई सानी |
मत समझ दिल को अब तेरा डर…
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 25, 2012 at 9:20pm — 4 Comments

हाइकु बक्सा : रक्षाबंधन

१. भाई-बहिन
बाँटें प्यार ही प्यार
राखी के दिन
 
२. खुशी की घड़ी
न्यारी थाली सजाये
बहना खड़ी
 …
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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 25, 2012 at 12:30pm — 5 Comments

वो बच्चा...

वो बच्चा

बीनता कचरा

कूड़े के ढेर से

लादे पीठ पर बोरी;

फटी निकर में

बदन उघारे,

सूखे-भूरे बाल

बेतरतीब,

रुखी त्वचा

सनी धूल-मिटटी से,

पतली उँगलियाँ

निकला पेट;

भिनभिनाती मक्खियाँ

घूमते आवारा कुत्ते

सबके बीच

मशगूल अपने काम में,

कोई घृणा नहीं

कोई उद्वेग नहीं

चित्त शांत

निर्विचार, स्थिर;

कदाचित

मान लिया खुद को भी

उसी का एक हिस्सा

रोज का किस्सा,

चीजें अपने मतलब की

डाल बोरी में

चल पड़ता…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 2, 2012 at 9:24am — 20 Comments

घन गरज बरस प्यासी धरती पुकारे (रूप घनाक्षरी)

घन गरज बरस प्यासी धरती पुकारे ;

कृषक भी ताक रहे कब से ही आसमान |

मेघा टर्र-टर्र कर थकने लगे हैं जैसे ;

अब सुन ले उनकी अच्छा नहीं ये गुमान |

तुझ पर ही निर्भर खेती हमारे देश की ;

बिन तेरे हो जाएगी रूखी-सूखी सुनसान |…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 23, 2012 at 6:02pm — 25 Comments

अतिथि आप बार-बार आइए (मनहरण घनाक्षरी)

अतिथि से गृहस्वामी बोला मेरे स्नेहपात्र;
आकांक्षा हमारी आप बार-बार आइए|
अतिथि ने अभिभूत कहा धन्य भाग्य मेरे;
इतनी ख़ुशी आपकी, कारण बताइए|
गृहस्वामी ने सुनाया, बड़ा अच्छा लगता है;
इतना तो निश्चित ही आप जान जाइए|
पर जो सुख मिलता है जाते देख आपको;
उस परमानंद से मुक्ति न दिलाइए||

Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 19, 2012 at 12:30pm — 12 Comments

मैं वोटर हूँ...

मैं वोटर हूँ

एक आम मतदाता,

इसी देश का नागरिक

भीड़ का एक चेहरा

ज्यादा नहीं कमाता

शायद लिखना भी नहीं आता;

मेरा कोई संगठन नहीं

कोई नारा नहीं

हैलीकॉप्टर से तो दिखता भी नहीं

बहुत छोटा हूँ मैं

चिल्लाता हूँ कोई सुनता नहीं

इतना खोटा हूँ मैं;

इसी का आदी हूँ

शिकायत नहीं करता,

मेरा भी महत्त्व है

अचानक पता लगता,

पाँच सालों में; एक बार,

जब झुग्गियों में स्कॉर्पियो आती है,

काफिले आते हैं,

मैं "जनता जनार्दन" हो जाता हूँ

देसी…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 16, 2012 at 12:10pm — 4 Comments

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