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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog (238)

ये नज़र किससे मेरी टकरा गई

ये नज़र किससे मेरी टकरा गई

पल में दिल को बारहा धडका गई

 

एक टक उसको लगे हम ताकने

शर्म थी आँखों में हमको भा गई

लब गुलाबों से बदन था संदली

खुशबू जिसकी दिल जिगर महका गई

 

कैद है या खूबसूरत ख्वाब-गाह 

गेसुओं में इस कदर उलझा गई

 

पग जहाँ उसने रखे थे उस जगह

जर्रे जर्रे पे जवानी आ गई

 

“दीप” जो बुझने लगा था इश्क का 

मुस्कुरा के उसको वो भड़का गई

 

संदीप पटेल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 1, 2013 at 1:30pm — 14 Comments

कहकशाँ में उठ रही लहरों की बातें क्या करें

कहकशाँ में उठ रही लहरों की बातें क्या करें

इस गुबारे-गर्द में सहरों की बातें क्या करें

 

हर कोई पहने मुखौटे फिर रहा है जब यहाँ

फिर बताओ हम भला चेहरों की बातें क्या करें

 

इस कदर मसरूफ हैं पाने को नाम औ शोहरतें

वक़्त इक पल का नहीं पहरों की बातें क्या करें

 

तुक मिलाने को समझ बैठा जो शाइर शाईरी

नासमझ से वजन औ बहरों की बातें क्या करें

 

नफरतें हैं वहशतें हैं दहशतें हैं राह में

हर घडी है गमजदा कहरों की…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 27, 2013 at 4:30pm — 28 Comments

खुद ही सारी रात जलता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

शोहरतें पाने मचलता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

हसरतों पे जीता मरता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

 

यूँ किसी की याद में जलने का मौसम गम भरा

फिर उसी को याद करता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

                                                         

चोट खाता है मुसलसल जिन्दगी की राह में

तब सनम जैसे सँवरता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

 

आईने से रू-ब-रू होने की हिम्मत है नहीं

हार के फिर आह भरता नादाँ दिल क्यूँ सोचिये

 

इल्म है उसको गली ये…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 24, 2013 at 4:39pm — 22 Comments

शर्म से हम आँख मीचे क्यूँ रहें

शर्म से हम आँख मीचे क्यूँ रहें

दौड़ है सोहरत की पीछे क्यूँ रहें

 

तब हुए पैदा जमीं पे अब मगर

हौसलों के पर हैं नीचे क्यूँ रहें

 

सच का लज्जत चख चुके हैं हम यहाँ

फिर बता दो हम भी तीखे क्यूँ रहें

 

जानते हैं फल में कीड़े कब लगे

इस कदर फिर हम भी मीठे क्यूँ रहें

 

जिन लकीरों ने कराई जंग है

“दीप” अब तक उनको खींचे क्यूँ रहें

 

संदीप कुमार पटेल “दीप”

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 22, 2013 at 8:13pm — 32 Comments

सोये वीरों को जगाना चाहते हैं इसलिए "ग़ज़ल"

सोये वीरों को जगाना चाहते हैं इसलिए

वीर रस के गीत गाना चाहते हैं इसलिए

 

माँ बहन बेटी की इज्ज़त से न खेले अब कोई

इक कड़ा कानून लाना चाहते हैं इसलिए

 

मर न जाए कोई भी आदम दवा बिन भूख से

हम गरीबी को हटाना चाहते हैं इसलिए

 

हम विरोधी पश्चिमी तहजीब के हरदम रहे

संस्कृति अपनी बचाना चाहते हैं इसलिए

 

रक्त की नदियाँ बहें ना देश में दंगों से अब

रक्त में अब हम नहाना चाहते हैं इसलिए

 

राह में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 6, 2013 at 5:26pm — 20 Comments

आज का प्रेम

की बोर्ड से चिपका
स्क्रीन की सुंदरता से मुग्ध
हर सवाल का जबाब
चेट्टिंग से चेट्टिंग तक
मोबाइल से चीटिंग करते
झूठ से भरमाते
फिर भी मुस्कुराते
आँखें कान नाक
सब अंधे
जिनसे हमेशा
रिसता है
ज़हरीला  
फरेब
ऐसे रिश्ते

प्रेम की पराकाष्ठा है  
आज का प्रेम


संदीप पटेल "दीप"

मौलिक व अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 17, 2013 at 3:09pm — 9 Comments

आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

देश में कैसा बदलाव अब हो गया
नंगपन है रईसी ग़ज़ब हो गया  

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया

हाथ जोड़े थे जिसने कभी वोट को
आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

अब गधों की फ़तह, मात घोड़ों की हो
दौर दस्तूर कैसा अजब हो गया  

हर्फ के कुछ उजाले लुटा प्यार से   
"दीप" खुर्शीद सा जाने कब हो गया

संदीप पटेल "दीप"

(मौलिक व अप्रकाशित)  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 4:01pm — 8 Comments

सलवटें करवटें औ याद सहर से पहले

मिली हैं करवटें औ याद सहर से पहले

पिए हैं इश्क़ के प्याले जो जहर से पहले  



जो दिल के खंडहर में अब बहें खारे झरने  

यहाँ पे इश्क की बस्ती थी कहर से पहले



ग़ज़ब हैं लोग खुश हैं देख यहाँ का पानी

नदी बहती थी जहाँ एक नहर से पहले



कहाँ उलझा हुआ है गाफ़ अलिफ में अब तक

रदीफ़ो काफिया संभाल बहर से पहले



नहीं आसां है उजालों का सफ़र भी इतना  

जले है दीप सारी रात सहर से पहले



संदीप पटेल "दीप"…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 2:30pm — 6 Comments

भोर

ये भोर

काली रात के बाद



अब भी सिसकती है

यादों के ताजे निशाँ

सूखे ज़ख़्मों को

एक टक ताकती  



उसे नहीं पता

आने वाली शाम और

रात कैसी होगी



पता है तो बस

बीता हुआ कल

वो बीता हुआ कल  

जो निकला था

उसकी कसी हुई मुठ्ठी से

रेत की तरह

देखते देखते

रेत की तरह

भरी दोपहर में

तपते रेगिस्तान में

ज्यों छलती है रेत

मृग मारीचिका की तरह



मृग मारीचिका

जिससे भान होता है

पानी का

हाँ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 1:54pm — 9 Comments

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

बहे विशाल वृक्ष जो थे उंघते खड़े खड़े  



बड़ी बड़ी शिलाओं के निशान आज मिट गये

न छत रही न घर रहा मचान आज मिट गये

हुआ प्रलय बड़ा विकट किसान आज मिट गये

सुने किसी की कौन के प्रधान आज मिट गये



पुजारियों के होश भी लगे हमें उड़े उड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े



मदद के नाम पे वो अपने कद महज बढ़ा रहे

खबर की सुर्ख़ियों का वो यूँ लुत्फ़ भी उड़ा रहे

वहीं घनेरे मेघ काले छा के फिर चिढ़ा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 12:28pm — 9 Comments

काश तुम बोलते

भुन्सारे से संझा तक  

घूरे की तरह

उदास

चन्दा घिरा है

काले बादलों में

भरी दोपहर में !!!



सारी रोशनी

खाए जा रहा है

पलकों का बह चुका

काला कलूटा काजल



काश तुम बोलते

ये मौन चिरैया की चुप्पी तोड़ते

गुस्सा लेते

कम से कम कारण तो पता चलता

आँखों से और इन अदाओं से

पता चलता है

प्यार और तकरार

प्यास और इंतज़ार

ईमानदार और मक्कार का



तमन्ना का नहीं

 

अब देखो न …

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 11, 2013 at 4:00pm — 7 Comments

इक्षाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है

सुख के झरने देख पराए दुख को लिए निकलती है

इच्छाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है



मर्यादा में घोर निराशा

बाँध तोड़ती अहम पिपाशा

रस्मों और रिवाजों के पुल  

लगते हैं बस एक तमाशा  



तीव्र वेग से बहती है कब शिव से कहो सम्हलती है

इच्छाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है

अंतरमन का दीप बुझाती

प्रतिस्पर्धा को सुलगाती

होड़ लिए आगे बढ़ने की

लक्ष्य रोज ये नये बनाती



सुधा धैर्य की छोड़ विकल चिंता का गरल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 11, 2013 at 3:00pm — 13 Comments

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



भाषण में झूठे वादों से

अपने नापाक इरादों से

तुम ख्वाब दिखाके उड़ने के

खुद बैठे हो सैयादों से



बस नोट, सियासी इल्ली बन, तुम बोते हो सत्ताधारी   

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



हर ओर मुफलिसी फांके हों  

यूँ रोज ही भले धमाके हों

कागज़ पे सुरक्षा अच्छी है

इस पर भी खूब ठहाके हों



पहले तो खेल सजाते हो फिर  रोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 8, 2013 at 3:30pm — 7 Comments

कुछ झोपड़ों को रोंद के जो घर बना रहा

कुछ झोपड़ों को रोंद के जो घर बना रहा

इस दौर में वो सख्स ही मंजिल को पा रहा

 

जितना नहीं है पास में उतना लुटा रहा

कितना अमीर है ग़मों में मुस्कुरा रहा 

 

अपनी ही गलतियों के हैं कांटे चुभे हमें

वरना सफर तो जिन्दगी का गुलनुमा रहा

 

कहने का शौक औ जुनूं उसका न पूछिए

बेबह्र भी कही ग़ज़ल वो गुनगुना रहा

 

शायद शहद झड़े है उसकी बात से यहाँ

इक झुण्ड मक्खियों सा क्यूँ ये भिनभिना रहा  

 

जब मुल्क में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 3, 2013 at 5:46pm — 7 Comments

तो बंजरों में ही कश्ती चलाना अच्छा है

ग़मों में आपका यूँ मुस्कुराना अच्छा है

हंसी लबों पे रक्खे गम छुपाना अच्छा है  

 

कोई कभी जो पूछे है सबब यूँ हंसने का  

छुपा के चश्मेतर तो खिलखिलाना अच्छा है

 

मुझे तो हर घडी ये गलतियाँ बताता रहा

कोई कहे बुरा चाहे ज़माना अच्छा है

 

ग़ज़ब हैं खेल ये तकदीर के किसे क्या कहें  

खुद अपने आप से ही हार जाना अच्छा है

 

वो जिसकी चोट से दिल जार जार रोया था

उसी की राह से पत्थर उठाना अच्छा है

 

महल न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 1, 2013 at 6:17pm — 17 Comments

ग़ज़ल

वेदियों सा तप्त मन अपने लिए

कर रहा सारे हवन अपने लिए



अपनेपन को छोड़ मतलब साधते

दोस्त का होता चयन अपने लिए



मूढ़ मन में मैल ले गंगा नहा

कर रहा है आचमन अपने लिए



तितलियों को हांक कर भंवरे कहें

फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए



देश की है फ़िक्र किस इंसान को

हर कहीं चिंतन मनन अपने लिए



हिंदियों की नाक ऊँची कर रहा

पश्चिमी का ला चलन अपने लिए



आँख दिखलाता है वो माँ बाप को

संस्कृति का कर हनन अपने लिए…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 30, 2013 at 10:30am — 6 Comments

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

दोहन करते प्रकृति का, बड़े बड़े विद्वान्

चला चला बस योजना, बनते खूब महान

बनते खूब महान , हरे जंगल कटवाते

दूषित कर परिवेश, कारखाने बनवाते

धरा बचाने आज, नहीं आने मनमोहन

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

 

संदीप पटेल “दीप”  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 5:55pm — 13 Comments

प्रगति के महल

आओ ज़रा शहर निहारें

चमचमाती सड़कों पर

चमचमाती कारें

ऊँचे ऊँचे दीप्ति खंभ

अँधेरे को पीते

बड़े बड़े लट्टू

रग रग में संचरित होता दंभ



सुन्दर बाग़

ये महल अटारी

मशीन भारी भारी

और कुछ बड़ी बीमारी



सब तन रहा है

गाँव गाँव

अब शहर जो बन रहा है

बढ़ रहा है

धीरे धीरे

अटारी पर अटारी

तानी जा रही हैं

जो प्रगति की निशानी 

मानी जा रही है 



बेशुध हुआ सा आदम

भागा जा रहा है

अरमानों के…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments

हे पथिक

एक अँधेरी गली

सुनसान

वीरान

पथिक व्यथित

हलाकान

 

न कोई

हलचल

न कोई

आवाज

न साज

पथिक व्यथित

उदास

 

गहन अँधेरा

कालिमा का बसेरा

ह्रदय के स्पंदन

स्वर में बदल रहे हैं

चीत्कार

स्वयं की

बस स्वयं की

 

वर्षों सुनसान

गली में

चलते चलते

स्वयं से

परिचर्चा करते करते

कभी थाम लेता था

हाथ

स्वयं का दिलासा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2013 at 12:00pm — 21 Comments

दोहा-रोला गीत ==ग्रीष्म==

========ग्रीष्म=========

सूर्य गरजता गगन से, गिरा गर्म अंगार

धधके धूं धूं कर धरा, सूखी सरिता धार  

 

मचले मनु मन मार, मगर मिलता क्या पानी

ठूंठ ठूंठ हर ठौर, ग्रीष्म की गज़ब कहानी

उड़ा उड़ा के धूल, लपट लू आंधी चलती

बंजर होते खेत, आह आँखें है भरती

 

रिक्त हुए अब कूप भी, ताल गए सब हार

सूर्य गरजता गगन से, गिरा गर्म अंगार

 

पेड़ पौध परजीव , पथिक पक्षी पशु प्यासे

मृग मरीचिका देख, मचल पड़ते मनु…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2013 at 7:30pm — 19 Comments

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