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दोहा पंचक. . .

दोहा पंचक. . . . .

अद्भुत है ये जिंदगी, अद्भुत इसकी प्यास ।

श्वास-श्वास में आस का, रहता हरदम वास ।।

श्वास-श्वास में  आस का, रहता हरदम वास ।

इच्छाओं की वीचियाँ, दिल में करतीं रास ।।

इच्छाओं की वीचियाँ, दिल में करतीं रास ।

जीवन भर होती नहीं, पूर्ण जीव की आस ।।

जीवन भर होती नहीं, पूर्ण जीव की आस ।

अन्तकाल में जिन्दगी, होती बहुत  उदास ।।

अन्तकाल में जिन्दगी, होती बहुत उदास ।

अद्भुत है ये जिंदगी, अद्भुत…

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Added by Sushil Sarna on June 22, 2022 at 6:12pm — 8 Comments

इन के बिना तो व्यर्थ है सँस्कार मजहबी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

खंडित करे न देश को तलवार मजहबी

आँगन खड़ी न कीजिए दीवार मजहबी।।

*

मन्शा उन्हीं की देश को हर बार तोड़ना

करते रहे हैं लोग  जो  व्यापार मजहबी।।

*

जीवन न जाने कितने ही बर्बाद कर रहा

इन्सानियत से  दूर  हो  सन्सार मजहबी।।

*

माटी का मोल प्रेम की भाषा भी साथ हो

इन के बिना तो व्यर्थ है सँस्कार मजहबी।।

*

समरसता ज्ञान और न आपस का मेल है

बच्चों को जो भी देते हैं आधार मजहबी।।

*

करती नहीं है धर्म का कोई भी काम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 22, 2022 at 10:00am — 2 Comments

ग़ज़ल- दर्द हरने लगते हैं

1212  1122  1212    22 /112

1

हम आह जब कभी महफ़िल में भरने लगते हैं

नज़र में भर के वो हर दर्द हरने लगते हैं

2

जुनून-ए-इश्क़ में अब क्या सुनाएँ हाल-ए-दिल

ख़याल आते ही उनका सँवरने…

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Added by Rachna Bhatia on June 21, 2022 at 8:21pm — 7 Comments

यायावर

मैं बंजारा, मैं आवारा, फिरता दर दर पर ना बेचारा 

ना मन पर मेरा ज़ोर कोई, मैं अपने मन से हूँ हारा 

ठिठक नहीं कोई ठौर नहीं, आगे बढ़ने की होड नहीं

कोई मेरा रास्ता ताके, जीवन में ऐसी कोई और नहीं 

ना रिश्ता है ना नाता है, बस अपना खुद से वादा…

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Added by AMAN SINHA on June 21, 2022 at 11:20am — No Comments

जलाया घर अमावस ने -- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

*

नहीं ऐसा स्वयं यूँ ही सभी को दीप जलते हैं

दुआ माँ की फलित होती तभी तो दीप जलते हैं।।

*

तमस की रात कितनी हो ये सूरज ही करेगा तय

मगर सब को उजाला हो इसी को दीप जलते हैं।।

*

हवा से यारियाँ उन की उसी से साँस चलती है

सदा तूफान से लड़कर बली हो दीप जलते हैं।।

*

तुम्हारे जन्म से यौवन खुशी को जो लड़े तम से

बुढ़ापे में तके पथ को वही दो दीप जलते हैं।।

*

जलाया घर अमावस ने है लेकर नाम उनका ही

कहेगा कौन अब ऐसा सभी को दीप जलते…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 21, 2022 at 5:21am — No Comments

ग़ज़ल (... तमाशा बना दिया)

221 - 2121 - 1221 - 212

मौज आयी..घर को फूंक तमाशा बना दिया

हा.... झोंपड़ा फ़क़ीर ने ख़ुद ही जला दिया 

कर के इशारा बज़्म से जिसको उठा दिया

दरवेश ने उसी का मुक़द्दर बना दिया

अपनों के होते ग़ैर भला क्यूँ उठाए ग़म 

नादान दोस्तों ने ही रुसवा करा दिया

नफ़रत की फ़स्ल देख के ख़ुश हो रहे थे सब

बोया था जिसने ज़ह्र उसी को चखा दिया 

मुझको था ए'तिमाद कि आ जाएगी बहार

रंग-ए-ख़िज़ाँ ने मेरे यक़ीं को…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 20, 2022 at 11:59am — 12 Comments

पितृ दिवस पर कुछ क्षणिकाएँ. . .

पितृ दिवस पर कुछ क्षणिकाएँ ....

काँधे को
काँधे ने
काँधे दिया
इक अरसे के बाद
सृष्टि रो पड़ी
.........................
छूट गया
उँगलियों से
उनका आसमान
इक नाद बनकर रह गया
इक नाम
पापा
............................
पापा
पुत्र का आसमान
पुत्र
पिता का अरमान
एक छवि एक छाया
एक जान
एक पहचान

सुशील सरना / 19-6-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on June 19, 2022 at 8:28pm — 4 Comments

पिता - दोहे

दोहे -पिता

*****

पिता एक उम्मीद सह, हैं जीवन की आस

वो हिम्मत परिवार की, हैं मन का विश्वास।१।

*

जीवन जग में तात ही, केवल ऐसा गाँव

सघन शीत जो धूप दें, और धूप में छाँव।२।

*

जो करते सुत को सरल, जीवन की हर राह

अनुभव से अर्जित हमें, देकर सीख अथाह।२।

*

डाँट-डपट करते भले, भोर, दिवस या रात

सम्बल सबके पर रहे, कठिन समय में तात।४।

*

नित सुख में परिवार हो, होती मन में चाह

हँसते -हँसते झेलते, इस को पीर अथाह।५।

*

पत्थर से व्यवहार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 18, 2022 at 3:53pm — 4 Comments

गीत : कोई चाहे कुछ भी कह ले, जीवन पथ आसान नहीं है

कोशिश  है जीवन  पाने की

सबकी चाह  प्रथम आने की

कई  करोड़ों  लड़ते   लेकिन

कोई - कोई  विजयी  निकले

शेष  कहाँ जा खो जाते हैं, इसका  कुछ अनुमान नहीं है

कोई  चाहे कुछ भी  कह ले, जीवन पथ  आसान नहीं है

शाम  सुबह  या  जेठ  दुपहरी, भूख  मिटाते  जीवन  बीते

कल जैसा ही कल होगा क्या, इस असमंजस में हम जीते

रेत  सरीखे  अपने  सपने,  कब   ढह  जाए  नहीं  भरोसा

जीने  की  उम्मीद  लिए  सब, बूँद  जहर  का  चेतन  पीते

दो  रोटी  पाने  की …

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Added by नाथ सोनांचली on June 17, 2022 at 9:59pm — 2 Comments

आह्वान

जागो मेरे वीर सपूतो, मैंने है आह्वान किया 

आज किसी कपटी नज़रों ने मेरा है अपमान किया 

किसी पापी के नापाक कदम, मेरी छाती पर ना पड़ने पाए 

आज सभी तुम प्रण ये कर लो, जो आया, कुछ, ना लौट के जाने पाये 

दिखला दो तुम दुश्मन को, तुम भारत के वीर सिपाही…

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Added by AMAN SINHA on June 17, 2022 at 11:15am — No Comments

चाहत है मन में एक ही दुनिया सयानी हो-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

चाहत है मन में एक ही दुनिया सयानी हो

अब रक्त डूबी  इस  में  न कोई कहानी हो।।

*

होता अगर  हो  प्यार  का  आबाद हर नगर

हर बात उसकी हम को भी यूँ आसमानी हो।।

*

भटको न आस पास  के  रंगीं नजारे देख

पथ में रखो निगाह जो ठोकर न खानी हो।।

*

हमने उन्हें खुदा का जो दर्जा दिया है फिर

कोई सजा अगर हो तो उन की जुबानी हो।।

*

किस्मत बड़ी है मान ले दामन में गर गिरे

मोती सा आबदार जो आँखों का पानी हो

*

दिल है जवाँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 17, 2022 at 7:14am — No Comments

मुक्तक ( आधार छंद - हंसगति )

मुक्तक

आधार छंद हंसगति  (11,9 )

प्रीतम   तेरी  प्रीत , बड़ी   हरजाई ।

   विगत पलों की याद, बनी दुखदाई ।

      निष्ठुर  तेरा  प्यार , बहुत  तड़पाता -

           तन्हाई में  आज, आँख  भर  आई ।

                        * * *

दिल से दिल की बात, करे दिलवाला ।

    मस्ती  में  बस  प्यार , करे  मतवाला ।

        उसके ही बस गीत , सुनाता  मन  को -

             पी कर हो  वो  मस्त , नैन  की  हाला ।

सुशील सरना / 15-6-22

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on June 15, 2022 at 11:44am — 4 Comments

मदिरा सवैया आधारित दो छन्द

1

माँ गुरु थी पहली अपनी जिसका तप पावन ज्ञान लिखूँ

छाँव मिली जिस आँचल में उसको सब वेद पुरान लिखूँ

गर्भ  पला जिसके  तन में  उसको अपना भगवान लिखूँ

मात  सनेह  समान  यहाँ कुछ  और नहीं  उपमान लिखूँ

2

साजन  जो परदेश  गए  करके   मकरन्द  विहीन कली

अश्रु गिरें दिन रात यहाँ  बरसे  जस  सावन  की  बदली

बात रही दिल में जितनी दिल ने दिल से दिल में कह ली

हाल  हुआ  दिल का अपने जस नीर बिना तड़पे मछली

नाथ…

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Added by नाथ सोनांचली on June 15, 2022 at 7:54am — 4 Comments

संख्या का खेल देश में मन्जूर अब नहीं-(गजल)

आओ कसम लें देश जलाया न जाएगा

अब एक दूसरे  को  चिढ़ाया न जाएगा।।

*

यह देश राम श्याम से विक्रम भरत से है

वन्शज इन्हीं के सारे भुलाया न जाएगा।।

*

मंगोल हूण शक या मुगल आर्य जो भी हैं

आपस में इन को और लड़ाया न जाएगा।।

*

बाबर की भूल आज भी जुम्मन गले लगा

सबको कसम है ऐसा सिखाया न जाएगा।।

*

संख्या का खेल देश में मन्जूर अब नहीं

कोई भी भेद-भाव  हो  गाया न जाएगा।।

*

होगी समान न्याय की जब रीत देश में

तब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 14, 2022 at 6:18pm — 2 Comments

क्यों परेशान होता है तू

क्यों परेशान होता है तू , जिसे जाना है वो जाएगा 

हाथ जोड़ कर पैर पकड कर, तू उसको रोक ना पाएगा 

वो जाता है तो जाने दे, पर याद न उसकी जाने दे 

तू उसको ये अवसर ना दे, वो बाद मे तुझे बहाने दे 

 

जिसको आँसू की क़दर नहीं, ना होने का तेरे असर नहीं 

उसे रोक के क्या तू पाएगा, तेरी खातिर जो बेसबर नहीं 

तू रोके तो रुक जाएगा, घड़ियाली आँसू बहाएगा 

अपनी हर नाकामी…

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Added by AMAN SINHA on June 14, 2022 at 12:30pm — 1 Comment

गीत (सोचना क्या, छोड़ना क्या, कुछ नहीं बस में हमारे)

तृप्ति भी मिलती नहीं औ द्वंद भी कुछ इस तरह है

सोचना क्या? छोड़ना क्या? कुछ नहीं बस में हमारे

साथ किसके क्या रहा है छोड़कर धरती गगन को

फूल  जो  भी  आज  हैं वे छोड़ देंगे कल चमन को

मौत  पर  होवें  दुखी  या  जन्म पर खुशियाँ मनाएँ

हार   से  हम  हार  जाएँ  या   लड़े  औ जीत जाएँ

ज़िन्दगी   के  राज़  गहरे   दूर   जितने   चाँद   तारे

सोचना क्या? छोड़ना क्या? कुछ नहीं बस में हमारे

हर  पतन  के  बाद  ही  होता जगत उत्थान  भी है

शांति  की  ही  गोद  में …

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Added by नाथ सोनांचली on June 13, 2022 at 11:10am — 6 Comments

गुण्डे समूची फौज ले थाने पे आ गये -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

बाबर से यार  जो  भी बुलाने पे आ गये

इतिहास लिख के झूठ छुपाने पे आ गये।१।

*

अनबन से घर की गैर जो न्योते गये कभी

अपनों के बाद खुद भी निशाने पे आ गये।२।

*

पुरखों को अपने भूल के अपनाते गैर को

ये  कौन  लोग  देश  जलाने  पे  आ  गये।३।

*

कानून कैसे आज भी पहले सा है विवश

गुण्डे समूची  फौज  ले  थाने  पे आ गये।४।

*

गुजरा वो दौर बम से जो दहले था देश पर

पत्थर से  आज  शान्ति  उड़ाने  पे जा गये।५।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 12, 2022 at 9:30pm — 4 Comments

मुक्तक

(1222 1222 1222 1222  - हजज मुसम्मन सालिम)

न देखा है कभी उनको हुई पर प्रीत क्या कहने.

न जाना ही न पहचाना बने मनमीत क्या कहने. 

कहें सब जाल दुनिया यह सभी सुर ताल आभासी,

लिखे ऋतु गीत उपवन के बजे संगीत क्या कहने.

- शून्य…

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Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on June 11, 2022 at 7:00pm — No Comments

मुक्तक (मदिरा सवैया आधारित)

बोझ पड़ा सिर पे घर का मन में घनघोर अशांति हुई

यौवन में तन वृद्ध हुआ अरु जर्जर मानस क्लांति हुई

बीत गए सुख चैन भरे दिन जो अब लौट नहीं सकते

बाल सफेद हुए सिर के मुख की सब गायब कांति हुई

जीवन के दिन  चार यहाँ  इसमें  उसमें  हम  त्रस्त हुए

अर्थ क्षुधा बुझती न कभी धन संचय में बस व्यस्त हुए

वक़्त नहीं मिलता जिसमें हम बैठ कहीं कुछ सोच सकें

बन्धु सखा हित वक़्त नहीं अब यूँ हम शुद्ध गृहस्थ हुए

नाथ सोनांचली

विधान -: भानस ×7…

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Added by नाथ सोनांचली on June 11, 2022 at 2:30pm — No Comments

मैं बिकती हूँ बाज़ारों में

मैं बिकती हूँ बाज़ारों में, तन ढंकने को तन देती हूँ 

मैं बिकती हूँ बाज़ारों में, अन्न पाने को तन देती हूँ 

तन देना है मर्जी मेरी, मैं अपने दम पर जीती हूँ 

जिल्लत की पानी मंजूर नहीं, मेहनत का विष मैं पिती हूँ 

           

हाथ पसारा जब मैंने, हवस की नज़रों ने भेद दिया 

अपनों के हीं घेरे में, तन मन मेरा छेद…

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Added by AMAN SINHA on June 11, 2022 at 10:24am — No Comments

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