For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – December 2021 Archive (9)

सिर्फ सुख में रहें सब नये वर्ष में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२ /१२२१/२२१२



खूब आशीष  दो  रब नये वर्ष में

सिर्फ सुख में रहें सब नये वर्ष में/१

*

सुन जिसे पीर मन की स्वयं ही हरे

गीत  ऐसा  लिखें  अब  नये वर्ष में/२

*

छोड़कर द्वेष बाँटें सभी में सहज

प्रेम की सीख मजहब नये वर्ष में/३

*

नीति ऐसी बने जिससे आगे न हो

बन्द कोई भी मकतब नये वर्ष में/४

*

काम आये यहाँ और के आदमी

सिर्फ साधे न मतलब नये वर्ष में/५

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2021 at 10:39am — 2 Comments

जाते साल के दोहे

आने  वाले  साल   से,  कहे  बीतता  वर्ष
मुझ सा दुख मत बाँटना, देना केवल हर्ष।।
*
वर्ग भेद जग से मिटा, मिटा जाति संधर्ष
कर देना कर थामकर, निर्धन का उत्कर्ष।।
*
पहले सा परमार्थ भी, वह फिर गुणे सहर्ष
स्वार्थ साधना ही न हो, सत्ता का निष्कर्ष।।
*
घर आँगन है जो बसा, झाड़ पोंछ सब कर्ष
भर   देना  सौहार्द्र  से, अब  के   भारतवर्ष।।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2021 at 7:30am — No Comments

दोहा सप्तक -५ ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

सूरज यूँ है गाँव में, बहुत अधिक अँधियार।

नगर-नगर ही कर रही, किरणें हर व्यापार।।१

*

बन जाती है देश  में, जिस की भी सरकार।

जूती सीधी कर रहे, नित उस की अखबार।।२

*

कैसे ये बस्ती जली, क्यों उजड़ा बाजार।

किस से पूछें बोलिए, जगी नहीं सरकार।।३

*

गमलों में  फसलें  उगा, खेतों  में हथियार।

इसी सोच से क्या सुखी, होगा यह संसार।।४

*

कोई जब हो छीनता, थोड़ा भी अधिकार।

आँखों से आँसू  नहीं, निकलें  बस अंगार।।५

*

बातें व्यर्थ सुकून की,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2021 at 6:02am — 6 Comments

दोहा सप्तक -४ (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

लेता है भुजपाश में, बढ़चढ़ ज्यू ही काम।

एक हवेली प्यार  की, होती नित नीलाम।।१

*

कर लो ढब ऐश्वर्य  को, चाहे  इस के नाम।

दुधली की दुधली रहे, हर जीवन की शाम।।२

*

सिलता रहा जुबान जो, बढ़चढ़ यहाँ निजाम।

शब्दों ने झर आँख से, किया कहन का काम।।३

*

निर्धन को जिसने दिये, हरदम कम ही दाम।

धनी उसे  ठग  ले  गया, पैसा  नित्य तमाम।।४

*

रमे  यहाँ  व्यापार में , सब  ले  उसका नाम।

महज भक्ति के भाव से, किसको प्यारे…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 23, 2021 at 10:00am — 4 Comments

दोहा सप्तक-३

लघु से लघुतम बात को, जो देते हैं तूल।

ये तो निश्चित जानिए, मन में उनके शूल।१।

*

बनते बाल दबंग अब, पढ़ना लिखना भूल।

हुए नहीं क्यों सभ्य वो, जाकर नित स्कूल।२।

*

करती मैला भाल है, मद में उठकर धूल।

करे शिला को ईश यूँ, न्योछावर हो फूल।३।

*

साक्ष्य समय विपरीत पर, तजे सत्य ना मूल।

ज्यों नद सूखी  पर  हुए, एक  नहीं  दो कूल।४।

*

जलने को पथ काल का, तकना होगी भूल।

हवा कभी  होती  नहीं, सुनो  दीप अनुकूल।५।

*

कड़वी बातें तीर सी,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2021 at 10:28pm — 8 Comments

दोहा सप्तक -२

राजनीति के पेड़  से, लिपटे  बहुत भुजंग।

जिनके विष से हो गये, सब आदर्श अपंग।१।

*

बँधकर पक्की डोर से, छूना नहीं अनंग।

सबके मन की चाह है, होना कटी पतंग।२।

*

शिव सा बना न आचरण, होते गये अनंग।

लील रहे  जीवन  तभी, ओछे  प्रेम प्रसंग।३।

*

क्षीण,हीन उल्लास अब, शेष न कोई ढंग।

हालातों ने कर दिया, जीवन अन्ध सुरंग।४।

*

बेढब फीके  हो  गये, जब  से जीवन रंग।

कितनों ने है कर लिया, अपनी साँसें भंग।५।

*

तन की गलियाँ बढ़ गयीं, मन का आँगन…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2021 at 2:26pm — 4 Comments

दोहा सप्तक -१

धनी बसे परदेश में, जनधन सदा समेट।

ढकते निर्धन  लोग यूँ, यहाँ  पाँव से पेट।१।

*

कीचड़ में जब हैं सने, पाँव तलक हम दीन।

राजन  के  प्रासाद  का, क्या  देखें कालीन।२।

*

नेताओं की हर सभा, फिरे बजाती आज।

यूँ जनता है झुनझुना, भले वोट का नाज।३।

*

ऊँचे  आलीशान   हैं,  नेताओं  के  गेह।

दुहरी जिनके बोझ से, हुई देश की देह।४।

*

गूँगे बहरे लोग  जब, भरे  पड़े इस देश।

कैसे बदले बोलिए, अपना यह परिवेश।५।

*

सुख के दिन दोगे बहुत,…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 15, 2021 at 4:30am — 8 Comments

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



बजेगा भोर का इक दिन गजर आहिस्ता आहिस्ता 

सियासत ये भी बदलेगी मगर आहिस्ता आहिस्ता/१

*

सघन  बादल  शिखर  ऊँचे  इन्हें  घेरे  हुए  हैं पर

उगेगी घाटियों  में  भी  सहर आहिस्ता आहिस्ता/२

*

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

तपिस आने लगी है जो इधर आहिस्ता आहिस्ता/३

*

हमीं  कम  हौसले  वाले  पड़े  हैं  घाटियों  में  यूँ

चढ़े दिव्यांग वाले भी शिखर आहिस्ता आहिस्ता/४

*

अभी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2021 at 6:30am — 8 Comments

दूर तम में बैठकर वो रोशनी अच्छी लगी- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



मन था सुन्दर तो वदन की हर कमी अच्छी लगी

उस के अधरों  ने  कही  जो  शायरी  अच्छी लगी/१

*

सात जन्मों  के  लिए  वो  बन्धनों  में बँध गये

जिन्दगी के बाद जिनको जिन्दगी अच्छी लगी/२

*

आँख चुँधियाती रही जो पास में अपनी सनम

दूर  तम  में  बैठकर  वो  रोशनी  अच्छी  लगी/३

*

एक  हम  ही  भागते  रंगीनियों  से  दूर  नित

और किसको बोलिए तो सादगी अच्छी लगी/४

*

हाथ में था हाथ उनका दूर तक कोई न…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2021 at 7:32pm — 8 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
22 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
4 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
13 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
16 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
19 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
19 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
23 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service