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दोहा सप्तक -४ (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

लेता है भुजपाश में, बढ़चढ़ ज्यू ही काम।
एक हवेली प्यार  की, होती नित नीलाम।।१
*
कर लो ढब ऐश्वर्य  को, चाहे  इस के नाम।
दुधली की दुधली रहे, हर जीवन की शाम।।२
*
सिलता रहा जुबान जो, बढ़चढ़ यहाँ निजाम।
शब्दों ने झर आँख से, किया कहन का काम।।३
*
निर्धन को जिसने दिये, हरदम कम ही दाम।
धनी उसे  ठग  ले  गया, पैसा  नित्य तमाम।।४
*
रमे  यहाँ  व्यापार में , सब  ले  उसका नाम।
महज भक्ति के भाव से, किसको प्यारे राम।।५
*
कैसे कैसे दृश्य अब, हुए यहाँ पर आम।
पर्दे में पूजा  दिखे, और  खुले  में काम।।६
*
बापू को  बेटा  नहीं, करता  जहाँ प्रणाम।
उस घर कैसे वास हो, सच कहते हैं राम।।७
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
****

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2021 at 1:41pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 30, 2021 at 11:24am

क्या ही सुन्दर दिहे सृजित हुए हैं आदरणीय धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2021 at 8:46pm

आ. भाई समर जी , सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद । 

मात्रा गणना के हिसाब से महज को किसी भी रूप में लिखें दोहे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वर्तनी के हिसाब से आप सही हैं।

इसे अब इस प्रकार देखें -

सिर्फ भक्ति के भाव से,

Comment by Samar kabeer on December 26, 2021 at 7:15pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'महज भक्ति के भाव से, किसको प्यारे राम'

आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि इस पंक्ति में सहीह शब्द है "मह्ज़" और इसका वज़्न 21 होता है ।

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