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राज़ नवादवी's Blog – December 2018 Archive (14)

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८८

2212 1212 2212 12



रुक्का किसी का जेब में मेरी जो पा लिया

उसने तो सर पे अपने सारा घर उठा लिया //१



लगने लगा है आजकल वीराँ ये शह्र-ए-दिल

नज्ज़ारा मेरी आँख से किसने चुरा लिया //२



ममनून हूँ ऐ मयकशी, अय्यामे सोग में

दिल को शिकस्ता होने से तूने बचा लिया //३



सरमा ए तल्खे हिज्र में सहने के वास्ते

दिल में बहुत थी माइयत, रोकर…

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Added by राज़ नवादवी on December 26, 2018 at 4:00pm — 20 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८७

2212 1212 2212 12



आती नहीं है नींद क्यों आँखों को रात भर

हमने तो उनसे की थी बस दो टूक बात भर //१



दिल में न और ज़िंदगी की ख्व़ाहिशात भर

हस्ती है सबकी नफ़सियाती पुलसिरात भर //२



पढ़ ले तू मेरी आँख में जो है लिखा हुआ

गरचे किताबे दिल नहीं है काग़ज़ात भर //३



हर आदमी में मौत की ज़िंदा है एक लौ

तारीकियों की बज़्म ये रौशन है रात भर //४…

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Added by राज़ नवादवी on December 25, 2018 at 12:17pm — 15 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८६

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल 

 

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२



न हो जब दिल में कोई ग़म तो फिर लब पे फुगाँ क्यों हो

जो चलता बिन कहे ही काम तो मुँह में ज़बाँ क्यों हो //१



जहाँ से लाख तू रह ले निगाहे नाज़ परदे में

तसव्वुर में तुझे देखूँ तो चिलमन दरमियाँ क्यों हो //२




यही इक बात पूछेंगे तुझे सब मेरे मरने पे

कि तेरे देख भर लेने से कोई कुश्तगाँ क्यों हो…

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Added by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:30am — 19 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८५

२२१२ १२१२ २२१२ १२



हस्ती का मरहला सभी इक इक गुज़र गया

मैं भी तमाशा बीन था, अपने ही घर गया //१



इश्वागरी के खेल से मैं यूँ अफ़र गया

सारा जुनूने आशिक़ी सर से उतर गया //२



खोया न मैं हवास को आई जो नफ़्से मौत

ज़िंदा हुआ मशामे जाँ, मैं जबकि मर गया //३



हैराँ हूँ अपने शौक़ की तब्दीलियों पे मैं

नश्शा था तेरे हुस्न का, कैसे उतर गया //४…

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Added by राज़ नवादवी on December 17, 2018 at 7:41pm — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८४

2212 1212 2212 12



अच्छे बुरे का बार है सबके ज़मीर पे

ख़ुद को जवाब देना है नफ़्से अख़ीर पे //१



रख ले मुझे तू चाहे जितना नोके तीर पे

मरने का ख़ौफ़ हो भी क्या दिल के असीर पे //२



कुछ रह्म तो दिखा मेरे शौक़े कसीर पे

पाबंदियाँ लगा न दीदे ना-गुज़ीर पे //३



यकता है इस जहान में क़ुदरत की हर मिसाल

तामीरे ख़ल्क़ मुन्हसिर है कब नज़ीर पे…

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Added by राज़ नवादवी on December 14, 2018 at 4:00am — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८३

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



दिल मेरा ख़ाली नहीं ज्यों कस्रते आज़ार से

है फुगाँ मजबूर अपनी फ़ितरते इसरार से //१



लाख समझाऊँ तेरी तब-ए-सितम को प्यार से

तू मुकर जाता है अपने वादा-ए-इक़रार से //२



वस्ल की तश्नालबी बढ़ जाती है दीदार से

कम नहीं फिर दिल ये चाहे सुहबते बिस्यार से //३



आ गए जब तंग हम हर वक़्त की गुफ़्तार से

सीख ली हमने ज़ुबाने ख़ामुशी…

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Added by राज़ नवादवी on December 14, 2018 at 3:51am — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८२

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



जह्र बनके काम करती है दवाई देख ली

अच्छे अच्छों की भी हमने रहनुमाई देख ली //१



पीठ पीछे मर्तबा ए बे अदाई देख ली

तेरी भी मेहमाँ नवाज़ी हमने, भाई देख ली //२



आरज़ी थी दो दिनों की जाँ फ़िज़ाई देख ली

इश्क़ की ताबे जुनूने इब्तिदाई देख ली //३



दिन को सोना और शब की रत-जगाई देख ली

मय की जो भी कैफ़ियत थी इंतिहाई देख ली…

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Added by राज़ नवादवी on December 12, 2018 at 6:38pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८१

2122 1122 1122 22/ 112



बज़्मे अग्यार में नासूरे नज़र होने तक

क्यों रुलाता है मुझे दीदा-ए-तर होने तक //१



कितने मुत्ज़ाद हैं आमाल उसके कौलों से

टुकड़े करता है मेरा लख़्ते जिगर होने तक //२



गिर के आमाल की मिट्टी में ये जाना मैंने

तुख़्म को रोज़ ही मरना है शज़र होने तक //३



मौत का ज़ीस्त में मतलब है अबस हो जाना

ज़िंदा हूँ हालते…

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Added by राज़ नवादवी on December 12, 2018 at 2:30pm — 13 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८०

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



ज़र्बे दिल तू दे, पे हम दिल की दवाई तो करें

हम तेरी ख़ू ए गुनह की मुस्तफ़ाई तो करें //१



कह के दिल की बात किस्मत आज़माई तो करें

करते हों गर वो जो मुझसे कज अदाई तो करें //२ 



नफ़रतों को ख़त्म कर दिल की सफ़ाई तो करें

आप समझें गर हमें भी अपना भाई,तो करें //३ 



गर मिलें हम, कुछ नहीं पर, ख़ुश अदाई तो करें 

आप हमसे…

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Added by राज़ नवादवी on December 8, 2018 at 3:00pm — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७९

२२१२ २२१२ २२१२ १२



जब से मैं अपने दिल का सूबेदार हो गया

सहरा भी मेरे डर से लालाज़ार हो गया //१



छोड़ा जो तूने साथ, ख़ुद मुख्तार हो गया

तू क्या, ज़माना मेरा ख़िदमतगार हो गया //२



आईन मेरा ग़ैर क्या बतलायेंगे मुझे

मैं ख़ुद ही अपना आइना बरदार हो गया //३



गर बेमज़ा है आशिक़ी मेरे हवाले से

तू क्यों फ़साने में मेरे किरदार हो गया…

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Added by राज़ नवादवी on December 6, 2018 at 3:00pm — 11 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७८

१२१२ ११२२ १२१२ २२ 



कभी तो बख्त ये मुझपे भी मेहरबाँ होगा

मेरी ज़मीन के ऊपर भी आस्माँ होगा //१



गवाह भी नहीं उसका न कुछ निशाँ होगा

जो तेरे हुस्न के ख़ंजर से कुश्तगाँ होगा //२



हम एक गुल से परेशाँ हैं उसकी तो सोचो

वो शख्स जिसकी हिफ़ाज़त में गुलसिताँ होगा //३



ये ख़ल्क हुब्बे इशाअत का इक नतीजा है

गुमाँ नहीं था कि होना सुकूंसिताँ होगा…

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Added by राज़ नवादवी on December 5, 2018 at 3:27pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७७

2122 2122 2122 212



बाग़पैरा क्या करे गुल ही न माने बात जब

शम्स का रुत्बा नहीं कुछ, हो गई हो रात जब //१



बाँध देना गाँठ में तुम गाँव की आबोहवा

शह्र के नक्शे क़दम पर चल पड़ें देहात जब //२



दोस्त मंसूबा बनाऊं मैं भी तुझसे वस्ल का

तोड़ दें तेरी हया को मेरे इक़दमात जब //३



इक किरन सी फूटने को आ गई बामे उफ़ुक़

रौशनी की जुस्तजू में खो गया…

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Added by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:30pm — 7 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७६

2121 2121 2121 212



उड़ रहे थे पैरों से ग़ुबार, देखते रहे

वो न लौटे जबकि हम हज़ार देखते रहे //१



ताब उसकी, बू भी उसकी, रंग भी था होशकुन

गुल को कितनी हसरतों से ख़ार देखते रहे //२



हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर

वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

तोड़ते थे बेदिली से वो मकाने इश्क़, हम 

टूटते मकाँ का इंतेशार देखते रहे //४ …



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Added by राज़ नवादवी on December 2, 2018 at 3:00am — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७५

2122 1122 1212 22/ 112



उसका बदला हुआ तर्ज़े करम सताता था

यार बेज़ार था कुछ यूँ कि कम सताता था //१



होके कुछ यूँ वो ब मिज़गाने नम सताता था

कब मैं समझा कि वो अबरू-ए-ख़म सताता था //२ 



दूर रहने पे तेरी क़ुरबतों की याद आई

पास रहने पे जुदाई का ग़म सताता था //३ 



जिनको इफ़रात थी रिज़्को ग़िज़ा की जीने में

ऐसे लोगों को भी कर्बे शिकम…

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Added by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 11:30am — 8 Comments

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