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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७६

2121 2121 2121 212

उड़ रहे थे पैरों से ग़ुबार, देखते रहे
वो न लौटे जबकि हम हज़ार देखते रहे //१

ताब उसकी, बू भी उसकी, रंग भी था होशकुन
गुल को कितनी हसरतों से ख़ार देखते रहे //२

हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर
वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

तोड़ते थे बेदिली से वो मकाने इश्क़, हम 

टूटते मकाँ का इंतेशार देखते रहे //४ 


सख़्त जाँ बनाने दरम्यानी ऐतबार को
टूटता है कैसे ऐतबार, देखते रहे //५ 


देखते थे टकटकी निगाह से उन्हें भी हम
हैरतों से हम को भी मज़ार देखते रहे //६ 

सर्फ़ हो रही थी साँस साँस अपनी ज़िंदगी
उड़ रही थी धूल बेशुमार, देखते रहे //७ 

हम गिरीबाँ चाक होके देखते थे उनकी सू  
वो हमारा ज़ख्मे आश्कार देखते रहे //८  

आ रही थी लाश सरहदों से मरने वालों की
रोके रिश्ते दार ज़ार ज़ार देखते रहे //९

हम किसी फ़क़ीर की तरह जहाँ से चल दिए
जो न थे तबा से बुर्दबार, देखते रहे //१० 

ले गए उड़ा के माल साहिबाने इक़्तेदार
जो थे इनके सच में दावेदार, देखते रहे //११ 

जब भी बात इश्क़ में उठी जफ़ा ओ ज़ुल्म की
लोग क्यों तुझे ही बार बार देखते रहे //१२

जैसे कोई देखता है अपने घर को टूटता
राज़ हम यूँ कूचा ए निगार देखते रहे //१३ 

~राज़ नवादवी

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

इंतेशार- बिखराव; ज़ख्मे आश्कार- प्रकट घाव; बुर्दबार- शांतचित्त, गंभीर, सहनशील; साहिबाने इक़्तेदार- हैसियत वाले लोग; निगार- प्रेमिका

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Comment by राज़ नवादवी on December 5, 2018 at 9:47pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2018 at 7:19pm

आ. भाई राजनवादवी जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by राज़ नवादवी on December 5, 2018 at 2:47pm

आदरणीय तेज वीर सिंह साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by TEJ VEER SINGH on December 5, 2018 at 2:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राज नवादवी जी।बेहतरीन गज़ल।

हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर
वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

Comment by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:19pm

आदरणीय जनाब नरेन्द्र सिंह साहब, ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिले से शुक्रिया. सादर, 

Comment by narendrasinh chauhan on December 3, 2018 at 12:41pm

खूब सुन्दर रचना , आदरणीय

Comment by राज़ नवादवी on December 2, 2018 at 11:16pm

आदरणीय समर कबीर साहब, ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by Samar kabeer on December 2, 2018 at 5:24pm

जनाब राज़ साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल है,बधाई स्वीकार करें ।

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