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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – October 2016 Archive (8)

आओ मिलकर दीप जलाएँ(नवगीत)/सतविन्द्र कुमार राणा

आओ मिलकर दीप जलाएँ



करने सबकुछ जगमग-जगमग

प्रेम रौशनी हम छितराएँ

आओ मिलकर दीप जलाएँ।



जो सरहद पर लगे हुए हैं

इसकी बस रक्षा करने को

इसकी खातिर तैयार खड़े

जो जीने को औ मरने को

शत्रु को निढाल बनाते हैं

उर में उनका मान बढ़ाएँ।

आओ मिलकर दीप जलाएँ



तन में तो मन धरा सभी ने

जीवन सबको मिला हुआ है

बस जीवन को काट रहे जो

शिक्षण जिनका हिला हुआ है

अज्ञान तिमिर में डूबे जो

ज्ञान सभी तक लेकर जाएँ

आओ मिलकर दीप… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 29, 2016 at 2:47pm — No Comments

आओ मिलकर दीप जलाएँ(नवगीत)/सतविन्द्र कुमार राणा

आओ मिलकर दीप जलाएँ



करने सबकुछ जगमग-जगमग

प्रेम रौशनी हम छितराएँ

आओ मिलकर दीप जलाएँ।



जो सरहद पर लगे हुए हैं

इसकी बस रक्षा करने को

इसकी खातिर तैयार खड़े

जो जीने को औ मरने को

शत्रु को निढाल बनाते हैं

उर में उनका मान बढ़ाएँ।

आओ मिलकर दीप जलाएँ



तन में तो मन धरा सभी ने

जीवन सबको मिला हुआ है

बस जीवन को काट रहे जो

शिक्षण जिनका हिला हुआ है

अज्ञान तिमिर में डूबे जो

ज्ञान सभी तक लेकर जाएँ

आओ मिलकर दीप… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 29, 2016 at 2:46pm — No Comments

आओ मिलकर दीप जलाएँ(नवगीत)/सतविन्द्र कुमार राणा

आओ मिलकर दीप जलाएँ



करने सबकुछ जगमग-जगमग

प्रेम रौशनी हम छितराएँ

आओ मिलकर दीप जलाएँ।



जो सरहद पर लगे हुए हैं

इसकी बस रक्षा करने को

इसकी खातिर तैयार खड़े

जो जीने को औ मरने को

शत्रु को निढाल बनाते हैं

उर में उनका मान बढ़ाएँ।

आओ मिलकर दीप जलाएँ



तन में तो मन धरा सभी ने

जीवन सबको मिला हुआ है

बस जीवन को काट रहे जो

शिक्षण जिनका हिला हुआ है

अज्ञान तिमिर में डूबे जो

ज्ञान सभी तक लेकर जाएँ

आओ मिलकर दीप… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 29, 2016 at 2:43pm — 7 Comments

एक ग़ज़ल-सतविन्द्र कुमार राणा

2122 2122 212
क्यों रहा गुस्ताखियों पे तू अड़ा
इसलिए ही गाल पर झापड़ पड़ा।

बैठ जा खाली पड़ी हैं कुर्सियाँ
तू रहेगा कब तलक यूँ ही खड़ा।

बेसुरी आवाज तेरी हो गयी
इसलिए ही तो तुझे अंडा पड़ा।

देख जिसके हाथ में अंडा नहीं
पास उसके है टमाटर इक सड़ा।

शाइरी को छोड़ के कुछ और कर
देख ले के फैसला ये तू कड़ा।

आब ‘राणा’ को मिला पूरा नहीं
देख खाली ही पड़ा उसका घड़ा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 26, 2016 at 10:30am — 4 Comments

तरही ग़ज़ल-सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:122 122 122 122

----

नहीं कम हुई मेरी उलझन किसी से

कहाँ मिल सका हूँ अभी तक खुदी से।



है गुरबत ने ओढ़ा ख़ुशी का ये चोला

बहकती है दुनिया लबों की हँसी से।



मुहब्बत बसाती है उनसब घरों को

उजाड़ा किसी ने जिन्हें दुश्मनी से।



मुलाकात होती जरूरी कभी तो

मुहब्बत बढ़ेगी तभी बानगी से।



चढ़ा जा रहा हूँ मैं गुस्से में खुद पर

*उतारे कोई कैसे मुझको मुझी से*।



सितारा करम का चमक जाए ‘राणा’

तो मिट जाए गम सब तेरी जिंदगी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 17, 2016 at 7:02am — 10 Comments

शक्ति छ्न्द/सतविन्द्र कुमार

122 122 122 12

----

किसी ने कभी यह सही है कही

किया पूर्व ने ही उजाला सही

सकल नूर को दूर पश्चिम करे

सभी क्यों उसी की नकल में मरे।

2

महकते सुमन कुछ इशारा करें

गई चाहतों को दुबारा भरें

खिली जो कली है पिया की गली

लगन प्रेम की यह लगाती भली।

3.

कुहू की सुने हम सुवाणी अगर

चलें काटते हर कठिन सी डगर

सभी ओर मीठा अगर शोर हो

कहीं कष्ट का फिर नहीं जोर हो

4.

घटा से घटा है सकल ताप ये

बना जा रहा था सुजल भाप ये

नहीं… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 16, 2016 at 4:59pm — 4 Comments

एक फीलब्दीह/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:122 122 122 122
-----
नहीं ये किसी को बताया हुआ है
कि इस दिल में तुमको बसाया हुआ है।

रहा जो हमेशा से दुश्मन हमारा
उसे भी गले से लगाया हुआ है।

जमाने को लगने न देंगे खबर भी
खजाना वफ़ा का छुपाया हुआ है।

करम से रहा जो हमेशा ही जालिम
वही अब तो रब का सताया हुआ है।


मुहब्बत वतन से ही ए ‘राणा’ कमायी
तहे दिल से इसको कमाया हुआ है।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 9, 2016 at 10:00pm — 18 Comments

जब ठहरना न मुनासिब हो तो चलते रहिये(तरही गज़ल)/सतविन्द्र कुमार

बह्र:2122,1122 1122 22



जब ठहरना न मुनासिब हो तो चलते रहिए

साथ चलके भी जमाने को' बदलते रहिए।  



रुत बदलती सी ये तबियत पे ही होती भारी

ठीक होगा यूँ अगर आप भी ढलते रहिये।



आग खामोश करा देती सभी  का जीवन

एक दीपक की' तरह खुद ही तो जलते रहिए।



वक्त आवाज खिलाफत में उठाने का है

जुल्म से दब क्युँ यूँ बस खुद ही में गलते रहिए।



ग़म मिला है तो ख़ुशी भी आ मिलेगी यारो

*हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये*।



क्या मिला है जो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2016 at 8:35pm — 6 Comments

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