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आओ मिलकर दीप जलाएँ(नवगीत)/सतविन्द्र कुमार राणा

आओ मिलकर दीप जलाएँ

करने सबकुछ जगमग-जगमग
प्रेम रौशनी हम छितराएँ
आओ मिलकर दीप जलाएँ।

जो सरहद पर लगे हुए हैं
इसकी बस रक्षा करने को
इसकी खातिर तैयार खड़े
जो जीने को औ मरने को
शत्रु को निढाल बनाते हैं
उर में उनका मान बढ़ाएँ।
आओ मिलकर दीप जलाएँ

तन में तो मन धरा सभी ने
जीवन सबको मिला हुआ है
बस जीवन को काट रहे जो
शिक्षण जिनका हिला हुआ है
अज्ञान तिमिर में डूबे जो
ज्ञान सभी तक लेकर जाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएँ।

प्रेम मिलन से खिलते उत्सव
सौहार्द इन्हीं से बढ़ता है
आपस में सब हिले-मिले हों
हर दिन उत्सव-सा चढ़ता है
सारी रंजिश को जीवन से
आओ सब ही दूर भगाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएँ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on November 2, 2016 at 9:36pm

 

सुन्दर भावपूर्ण नवगीत के लिए बधाई, सतविन्द्र जी।

Comment by रामबली गुप्ता on November 1, 2016 at 5:51am
अव्वल तो सुंदर गीत के लिए हार्दिक बधाई लीजिये आद0 भाई सतविंदर जी।
कुछेक जगहों पर मुझे प्रवाह में अटकाव लगा यथा-
शत्रु को निढाल______।
अज्ञान तिमिर_______।
कहीं कहीं वक्यों में कसावट की कमी हो गयी है।
शत्रु को_____बढ़ाएं।
अज्ञान तिमिर_____जाएं।
इन वाक्यों में भाव उलझा हुआ प्रतीत हुआ।सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 31, 2016 at 6:46am
आदरणीय समर कबीर साहबसादर वन्दे!आपको प्रयास पसन्द आया,यह सार्थक हुआ बहुत बहुत आभार।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 31, 2016 at 6:45am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी साहब,प्रयास का अनुमोदन कर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 31, 2016 at 6:44am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी साहब,प्रयास का अनुमोदन कर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल आभार!
Comment by Samar kabeer on October 30, 2016 at 9:11pm
जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,दीपावली की बढ़िया सौग़ात दी है आपने मंच को,अच्छा सन्देश दे रहा है आपका नवगीत,इस प्रस्तुति के साथ ही दीपावली की बधाई और शुभकामनायें स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2016 at 2:51pm
दीपोत्सव को वर्तमान परिदृश्य व परिप्रेक्ष्य में संदर्भित करते हुए बेहतरीन भावपूर्ण रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय सतविंदर कुमार राणा जी। दीपावली पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आप सभी को।

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