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सुरेश कुमार 'कल्याण''s Blog – October 2016 Archive (6)

पंख /सुरेश कुमार ' कल्याण '

पंख

---



पंख

जो

समय की मार से

हो चुके थे

जीर्ण-शीर्ण

मैंने

खूब फैलाने का प्रयास किया,

ताकि

विश्राम कर सकें

इनकी छत्रछाया में

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



मगर

जब वो जीर्णावस्था से

उबरे

जब पूर्ण छाया

देने ही वाले थे

चढ़ गए

मेरे

सुन्दर पंखों पर

काटने के लिए

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



बहुत दर्द

बहुत पीड़ा

सहने की कोशिश

बहुत… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 23, 2016 at 12:48pm — 10 Comments

ज़लज़ला /सुरेश कुमार ' कल्याण '

छब्बीस जनवरी

दो हजार एक

भारत का

बावनवां गणतंत्र दिवस

खुशियां थी अपार

सारी खुशियाँ

एक झटके से

बह गई ।



दिन चढ़ते ही

शुरू हुआ

विनाश का तांडव

अटारियाँ सारी

एक झटके से ढह गई ।



लील गया

हजारों जिंदगियां

लाखों घर

हुए नेस्तनाबूत।



गुजरात प्रांत

इक्कीस जिले

जलजले से

सारे हिले।

लाखों लोग

बेघर हो गए।



गांव के गांव

शहर के शहर

मिट्टी में मिल गए

जमींदोज हो… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 17, 2016 at 7:46pm — 4 Comments

ए वतन /सुरेश कुमार ' कल्याण '

हम भारत के शूरवीर

जाने न देंगे कश्मीर

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

ठण्डी-ठण्डी इसकी हवाएँ

झर-झर बहते इसके झरने

हृदय सी गहरी वादियां इसकी

बड़े सुन्दर हैं इसके दर्रे

अखण्ड यह भारत सारा है

यह सिर का ताज हमारा है

हमें प्राणों से भी प्यारा है।

हम हिन्दू सिक्ख या मुसलमान हैं

हम सबका वतन हिन्दुस्तान है

हिन्दू मुस्लिम का ये किस्सा

नहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा

ऊँच-नीच और जाति-पाति

फूटी आँख हमें न… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 12, 2016 at 7:42pm — 3 Comments

गुरु महिमा (दोहा छन्द)/सुरेश कुमार ' कल्याण '

धन दौलत के फेर में, फैल रहा अन्धेर।

गुरु मारग पै चालिये, ना भटकेगा फेर।1।



दया धर्म अरु ज्ञान बिन, मिथ्या है अभिमान।

गुरु बिन तीनों ना मिलैं,सम हैं गुरु भगवान ।2।



दया धर्म सब व्यर्थ हैं, व्यर्थ पड़ा सब ज्ञान।

शीश झुके गुरु चरण में, मिले सन्त सुजान।3।



गुरु की राह न त्यागिये, यही गुणों की खान।

गुरु को छाड़ैं ना मिलै, कहीं प्रेम आराम।4।



गुरु बिन गति हो ज्ञान की, जैसे धनु बिन बाण।

सच्चे गुरु की ओट में, पूरे हों… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 8, 2016 at 4:00pm — 7 Comments

केवल एक प्रयास

अपनी मिट्टी से पैदा हुई

कपास की बाती

अपनी मिट्टी

अपने खेतों की

सरसों का तेल

अपने घर में

बिलोया गया

शुद्ध देशी घी

अपने कुम्हार के चाक पर

बना अपनी मिट्टी का

दीपक

जलना चाहिए

अपनी मिट्टी पर

अपने मान पर

अपनी मर्यादा पर

अपने शिखर पर

खासकर

अपने मन पर।

कह दो पडोसियों से

वापस ले जाएं

अपनी चमचमाती चीजें

चिरागों के मौसम में

चमकेंगे हमारे चिराग ही हमेशा

शहीदों की चिताओं पर

आँखें… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 7, 2016 at 10:56am — 2 Comments

मर्ज

मरीज के
मर्ज का इल्जाम
मरीज पर आ रहा है
आश्चर्य नहीं
इस दौर में
मरीज को
मरीज
खींचे जा रहा है ।
क्या
किसी की
नजर में
बीमार
बीमार है?
मगर
स्वस्थ दिखने वाले
कितने
लाचार हैं ।
जन-जन
कण-कण
समस्त पर्यावरण
कौन
किसको
दवा दे?
क्योंकि
चिकित्सक और दवाखाना
दोनों
बीमार हैं।

सुरेश कुमार ' कल्याण '
मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 6, 2016 at 9:45am — 8 Comments

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