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Rajesh kumari's Blog – August 2015 Archive (6)

मिला आज बेटा वो बलवाइयों में (फिलबदीह ग़ज़ल 'राज')

122   122  122    122

कुहुकती है कोयलिया अमराइयों में

महकते  कई  फूल पुरवाइयों में  

 

दिखाई  न  दी आज दीवार उनकी

अजी, क्या सुलह हो गई भाइयों में ?

 

ग़मों के  भँवर में जो खोया था बचपन

मिला आज यादों की परछाइयों में

 

पिघलते हों पत्थर धुनें जिनकी सुनकर

फुसूँ हमने देखा वो शहनाइयों में

 

उजाले  में दिन के छुपे रहते बुजदिल

उमड़ते वही अब्र तन्हाइयों में

 

न कद से समंदर की औकात…

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Added by rajesh kumari on August 31, 2015 at 11:57am — 15 Comments

नाम माशूक का तो खूँ से लिखा करते थे(तरही ग़ज़ल 'राज')

चीर चट्टान के सीने को मिला करते थे

तब मुहब्बत में सनम लोग वफ़ा करते थे  

 

काट देता था ज़माना भले ही पर नाजुक 

होंसलों से नई परवाज़ भरा करते थे

 

दिल के ज़ज्बात कबूतर के परों पर लिखकर

प्यार का अपने वो  इजहार किया करते थे

 

कैस फ़रहाद या राँझा कई दीवाने तब   

नाम माशूक का तो खूँ से लिखा करते थे

 

एक हम थे  जो जमाने  की नजर से डरकर

जल्द खुर्शीद के ढलने की दुआ करते थे 

 

आज वो रह गए केवल मेरा…

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Added by rajesh kumari on August 23, 2015 at 10:00pm — 19 Comments

.जशने आज़ादी है आज--(फ़िलबदीह ग़ज़ल.'राज')

२१२२  २१२२  २१२२   २१२१ 

दीप राहों में जलाओ जशने आज़ादी है आज,

 ध्वज वतन का लह्लहाओ जशने आज़ादी है आज,

 

भूल कर शिकवे गिले इक दूसरे का हाथ थाम

एक सुर में सुर मिलाओ जशने आज़ादी है आज,

 …

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Added by rajesh kumari on August 16, 2015 at 10:30am — 16 Comments

प्यार की आंच से ये फिर से पिघलते क्यूँ हैं (तरही ग़ज़ल 'राज ')

पुरख़तर इश्क की राहें हैं तो चलते क्यूँ हैं

चोट खाकर ही मुहब्बत में सँभलते क्यूँ हैं

 

प्यारा के दीप इन आँखों में यूँ जलते क्यूँ हैं

चाँदनी रात में अरमान मचलते क्यूँ हैं

 

रात में ख़्वाब इन आँखों पे हुकूमत करते

सुब्ह होते ही ये हालत बदलते क्यूँ हैं

 

बेवफाई से हुए  इश्क में जो दिल पत्थर

प्यार की आंच से ये फिर से पिघलते क्यूँ हैं

 

दूर से खूब लुभाते हैं ये तपते सहरा

तिश्नगी में ये मनाज़िर हमे छलते क्यूँ…

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Added by rajesh kumari on August 11, 2015 at 7:49pm — 17 Comments

सावन का 'कजरी' लोकगीत

 रिमझिम सावन की फुहार आज मेरा भैय्या आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

अम्बर पे बादल छाये

सखियों ने झूले पाए

भाभी ने गायी कजरी

बाबा जी घेवर लाए

कर लूँ अब मैं तनिक सिंगार आज मेरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

दीवार पे कागा बोले

यादों की खिड़की खोले

अम्मा ने संदेसा भेजा

सुनसुन मेरा मन डोले

मायके से आया तार आज मोरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार…

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Added by rajesh kumari on August 8, 2015 at 11:52am — 6 Comments

होंसलों के सामने आँधियों का वजूद क्या(ग़ज़ल 'राज')

2122   212  2122 1212  

सर फरोशों के लिए बंदिशे क्या हुदूद क्या

होंसलों के सामने आँधियों का वजूद क्या

 

बांटता सबको बराबर न रखता कोई हिसाब    

इक  समन्दर के लिए मूल क्या और सूद क्या 

 

बूँद इक मोती बनी दूसरी ख़ाक में मिली                

सिलसिला है जीस्त का बूद है क्या नबूद क्या 

                        

जिन चिरागों की जबीं पर लिखी हुई हो तीरगी  

अर्श उनके वास्ते लाल, पीला, कबूद क्या 

 

उस अदालत में…

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Added by rajesh kumari on August 4, 2015 at 10:55am — 24 Comments

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