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होंसलों के सामने आँधियों का वजूद क्या(ग़ज़ल 'राज')

2122   212  2122 1212  

सर फरोशों के लिए बंदिशे क्या हुदूद क्या

होंसलों के सामने आँधियों का वजूद क्या

 

बांटता सबको बराबर न रखता कोई हिसाब    

इक  समन्दर के लिए मूल क्या और सूद क्या 

 

बूँद इक मोती बनी दूसरी ख़ाक में मिली                

सिलसिला है जीस्त का बूद है क्या नबूद क्या 

                        

जिन चिरागों की जबीं पर लिखी हुई हो तीरगी  

अर्श उनके वास्ते लाल, पीला, कबूद क्या 

 

उस अदालत में खुदा की लिखे फेंसले सभी    

हैं बराबर जुर्म सारे ठगी क्या रबूद क्या

 

दिल में जिनके प्यार का कोई मफ़्हूम ही नहीं

जुल्म कारों के लिए मिन्नतें क्या सुजूद क्या 

 

रबूद  =डकैती  

हुदूद =सीमा

बूद ओ नबूद =होना या न होना

कबूद =नीला/आसमानी  

सुजूद =सर झुकाकर प्रेयर करना

 मफ़्हूम=भाव/भावना  

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 5, 2015 at 12:57pm

प्रिय सावित्री मिश्र जी, अर्थ देने पर आपको ग़ज़ल समझ आई अच्छी लगी इसके लिए बहुत- बहुत शुक्रिया  उर्दू के इन क्लिष्ट शब्दों के अर्थ ढूदकर उन्हे ग़ज़ल में फिट करना मेरे लिए भी आसान नहीं था |

Comment by savitamishra on August 5, 2015 at 12:19pm

बहुत खुबसुरत दी ..समझ में आई क्योकि आपने अर्थ भी दे दिए वर्ना तो सर के उप्पर से गुजर जाती ....सादर _/\_


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 5, 2015 at 12:02pm

आ० डॉ० आशुतोष मिश्रा जी,आप जैसे रचनाकार से ग़ज़ल पर दाद पाना अलग ही सुकून देता है इस होंसलाफ्जाई का तहे दिल से शुक्रिया   

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 5, 2015 at 11:06am

आदरणीया राज जी ..आपकी आज की इस शानदार ग़ज़ल में उर्दू के शब्दों के अर्थ होने से बिषय बस्तु को समझने में मदद मिली ..नए शब्दों से रूबरू होने का मौका मिला ..सुंदर भावो की इस रचना हेतु आपको हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 4, 2015 at 8:38pm

जी आदरनीय भाव स्पस्ट हुआ! शुक्रिया आदरणीय!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 4, 2015 at 8:26pm

कृष्ण मिश्रा जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपने मुक्त कंठ से सराहना की जिसके लिय मैं बेहद शुक्रगुजार हूँ |रही बात आपके संशय की तो उसके एवज में बस ये कहना है जैसे छोटा हो या बड़ा झूठ झूठ है उसी तरह कोई ठगी हो या डकैती दोनों ही जुर्म हैं ...अर्थात ऊपर वाले की निगाह में जुर्म जुर्म है छोटा हो या बड़ा|शायद मैं स्पष्ट कर पाई | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 4, 2015 at 8:21pm

आ० नरेन्द्र सिंह चौहान जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार व्यक्त करती हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 4, 2015 at 8:20pm

आ० नरेन्द्र सिंह चौहान जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार व्यक्त करती हूँ |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 4, 2015 at 8:19pm

बूँद इक मोती बनी दूसरी ख़ाक में मिली                

सिलसिला है जीस्त का बूद है क्या नबूद क्या 

लाजव़ाब आदरनीय!ये काफिया निभाना वाकई कठिन है, पर बहुत ही खूबसूरती के साथ आपने शेर ढाले हैं और बेहतरीन भाव पिरोये है!दिल से दाद प्रेषित है!

उस अदालत में खुदा की लिखे फेंसले सभी    

हैं बराबर जुर्म सारे ठगी क्या रबूद क्या................इस शेर में सारे जुर्म का बराबर होने का अर्थ मेरी समझ में नही आ रहा!

 

Comment by narendrasinh chauhan on August 4, 2015 at 7:22pm

बूँद इक मोती बनी दूसरी ख़ाक में मिली                

सिलसिला है जीस्त का बूद है क्या नबूद क्या ,, 

खूब सही फ़रमाय , खूब सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई 

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