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गिरिराज भंडारी's Blog – July 2014 Archive (9)

( ग़ज़ल )पर यहीं पर करार सा है कुछ -- गिरिराज भंडारी

2122    1212  22 /112  

पर यहीं  पर करार सा  है कुछ

****************************

उजड़ा  उजड़ा दियार सा है कुछ

पर यहीं  पर करार सा  है कुछ 

 

गर्मियाँ  खून  में  कहाँ  बाक़ी

गर्म हूँ , तो बुखार सा  है कुछ

 

खूब बोले थे खुल के, क्यूँ आखिर

बच गया फिर, उधार सा है कुछ

 

दिल को  बेताबियाँ नहीं  डसतीं

प्यार है, या कि प्यार सा है कुछ

 

फूल कलियों में  खूब  चर्चा  है

अब ख़िंज़ा मे उतार सा  है…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 30, 2014 at 10:30am — 26 Comments

कँपकपी - एक अतुकांत चिंतन ( गिरिराज भंडारी )

कँपकपी

********

तुम कौन हो भाई ?

जो शीत से कँपकपाती मेरी देह की कँपकपी को झूठी बता रहे हो

शीत एक सत्य की तरह है

और कंपकपी मेरी देह पर होने वाला असर है

शीत-सत्य पर मेरा अर्जित अनुभव , व्यक्तिगत  , सार्वभौमिक तो नहीं न

 

क्या तुम्हारे माथे पर उभर आयीं पसीने की बून्दें भी झूठी है

क्या मैने ऐसा कहा कभी ?

ये तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है , इस मौसमी सच की आपकी अपनी अनुभूति

तुम्हारी देह की प्रतिक्रिया पसीना है , तो है , इसमे…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 26, 2014 at 12:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - कभी दोश अश्कों से तर रहा ( गिरिराज भंडारी )

11212     11212      11212       11212  

न तो आँधियाँ ही डरा सकीं , न ही ज़लजलों का वो डर रहा

तेरे नाम का लिये आसरा , सभी मुश्किलों से गुजर रहा

 

न तो एक सा रहा वक़्त ही , न ही एक सी रही क़िस्मतें

कभी कहकहे मिले राह में , कभी दोश अश्कों से तर रहा

 

कोई अर्श पे जिये शान से , कहीं फर्श भी न नसीब हो 

कहीं फूल फूल हैं पाँव में , कोई आग से है गुज़र रहा

 

तेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी , हुआ मौत से जहाँ सामना

हुआ हासिलों…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 24, 2014 at 2:30pm — 22 Comments

ग़ज़ल - अदावत भी हमी से, हमदमी भी ( गिरिराज भन्डारी )

1222     1222      122  ---  

कभी महसूस कर मेरी कमी भी

तेरी आँखों में हो थोड़ी नमी भी

 

नदी की धार सी पीड़ा बही, पर

किनारों के दिलों में क्या जमी भी ?

 

खुशी तो है उजालों की, मगर क्यों

कहीं बाक़ी दिखी है बरहमी* भी     ( खिन्नता )

 

उड़ाने आसमानी भी रखो पर

तुम्हे महसूस होती हो ज़मी भी

 

ये रिश्ता किस तरह का है बताओ ?

अदावत* भी हमी से, हमदमी भी       ( दुश्मनी )

 

उफ़क पे देख लाली है खुशी…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 20, 2014 at 10:39am — 22 Comments

ग़ज़ल - कोई तो मिल जाये जो ठहरा दिखाई दे ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122     2122      2   

कोई तो मंज़र कभी अच्छा दिखाई दे

एक तो आदम कभी सच्चा दिखाई दे

 

आपा धापी से लगे हैं पस्त हर कोई

कोई तो मिल जाये जो ठहरा दिखाई दे

 

उथलों में कब ठहरा है बरसात का पानी

ढूँढता है ताल , जो गहरा दिखाई दे   

 

भावनायें गूंगी हो कोनों में हैं सिमटीं  

शब्द क़ैदी सा लगा, पहरा दिखाई दे 

 

कोयला जो राख के नीचे दबा था कल

ये हवा कैसी ? कि वो दहका दिखाई दे…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 15, 2014 at 11:00am — 21 Comments

अतुकांत ---- तुम , तुम ही न रहे तो क्या बचा ? ( गिरिराज भंडारी )

तुम्हारे फूल अलग रंग के क्यों लग रहे हैं आज

पत्तों का आकार भी बदला बदला सा है

तुम्हारे फूल और पत्ते ऐसे तो उगते न थे

 

पोषण किसी और श्रोत से तो प्राप्त नहीं करने लगे

जड़ या तना बदल तो नहीं लिया है तुमने

बेतुक की बडिंग तो नहीं करवा ली है

किसी और प्रजाति के पौधे से

प्रजातियाँ अच्छी बुरी तो नहीं होतीं  

सभी अपनी जगह ठीक होतीं हैं

पर अपनी, अपनी होती है 

तुक की होती है !

 

बात केवल स्वतंत्रता पर खत्म…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 9:00am — 18 Comments

ग़ज़ल - रोज़ करवट हम बदल के देखते हैं ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122      2122 

 

नाम  अपना  चल  बदल  के देखते हैं

घेरे से  बाहर  निकल  के  देखते   हैं

 

चाँद  सुनता  हूँ  कि थोड़ा पास आया

आ  ज़रा  फिर से  उछल के देखते हैं

 

पैरों  को  मज़बूतियाँ  भी  चाहिये कुछ

चल  ज़रा  काटों पे चल  के  देखते हैं

 

रोशनी  की  चाह में तो  हैं  बहुत, पर 

कितने हैं ? जो ख़ुद भी जल के देखते हैं 

 

कुछ मज़ा फिसलन में है,गर है यक़ीं तो  

हम  कभी  यूँ  ही  फिसल के देखते…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 10, 2014 at 7:00pm — 22 Comments

ग़ज़ल - - ' ज़िन्दगी क्यूँ है उधारी सी ' ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122        2

कुछ  परायी  कुछ  हमारी  सी

ज़िन्दगी  क्यूँ   है  उधारी  सी

 

अश्क़ों की  नदियाँ  थमीं तो  हैं

सिसकियाँ अब तक हैं जारी सी

 

लोग कहते हैं  कि  जी ली, पर

ज़िन्दगी  लगती   गुजारी  सी

 

बदलियों के सामने  क्यों  धूप

हो  रही  है  इक  भिखारी  सी

 

आसमाँ रोया  बहुत  था  कल

आज  सूरत  है  निखारी  सी

 

हर तरफ़  घायल हुआ हूँ   मै

बात  शायद   थी  दुधारी…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 6, 2014 at 12:04pm — 28 Comments

हत्या ( अतुकांत चिंतन ) गिरिराज भन्डारी

कुछ ऐसी बात कह देना बे आवाज, महज़ इशारों से

जो नहीं कहनी चाहिये , किसी सूरत नहीं

या , कुछ ऐसी बात न कहना जिसे कह देना ज़रूरी है

किसी के भले के लिये ,खुशी के लिये , वो भी इसलिये

 

ताकि हम छीन सकें , किसी के होठों की हँसी

नोच सकें किसी के मन की शांति

उतार सकें , बिखरा सकें

विचारों के , भावों के समत्व को

अन्दर के प्यार को , ममत्व को  

छितरा सकें मन की शांति  

ताकि  टूट जाये , बिखर जाये किसी का व्यक्तित्व

किसी को…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2014 at 11:30am — 15 Comments

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