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Samar kabeer's Blog – July 2017 Archive (5)

'महब्बत कर किसी के संग हो जा'

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



हिमाक़त छोड़ दे फ़रहंग हो जा

महब्बत कर किसी के संग हो जा



ग़ज़ल मेरी सुना लहजे में अपने

मैं गूँगा हूँ मेरा आहंग हो जा



यहाँ घुट घुट के मरने से है बहतर

निकल मैदाँ में मह्व-ए-जंग हो जा



करे अपना के दुनिया फ़ख़्र जिस पर

वफ़ा का वो निराला ढंग हो जा



चढ़े इक बार जिस पर फिर न उतरे

महब्बत का तू ऐसा रंग हो जा



ये दुनिया सीधे साधों की नहीं है

उदासी छोड़ शौख़्-ओ-शंग हो जा



जुदा ता उम्र कोई कर न… Continue

Added by Samar kabeer on July 24, 2017 at 12:00am — 25 Comments

'ये लहू दिल का चूस्ती है बहुत'

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत
पर जमी इसमें गंदगी है बहुत

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना
ये लहू दिल का चूस्ती है बहुत

एक एक पल हज़ार साल का है
चार दिन की भी ज़िन्दगी है बहुत

चींटियाँ सी बदन पे रेंगती हैं
लम्स में तेरे चाशनी है बहुत

फ़न ग़ज़ल का "समर"सिखाने को
एक 'दरवेश भारती'है बहुत
---
लम्स-स्पर्श
समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on July 18, 2017 at 11:03am — 24 Comments

'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

१२१२ ११२२ १२१२ २२/११२



ख़ुलूस-ओ-प्यार की उनसे उमीद कैसे हो

जो चाहते हैं कि नफ़रत शदीद कैसे हो



छुपा रखे हैं कई राज़ तुमने सीने में

तुम्हारे क़ल्ब की हासिल कलीद् कैसे हो



बुझे बुझे से दरीचे हैं ख़ुश्क आँखों के

शराब इश्क़ की इनसे कशीद् कैसे हो



हमेशा घेर कर कुछ लोग बैठे रहते हैं

अदब पे आपसे गुफ़्त-ओ-शुनीद कैसे हो



इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर

अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे…

Continue

Added by Samar kabeer on July 13, 2017 at 11:30am — 57 Comments

यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ये काम आज के एह्ल-ए-जदीद करते हैं

ग़ज़ल के मुँह पे तमांचा रसीद करते हैं



लगे हुए तो हैं पैहम इसी तग-ओ-दौ में

हमें वो देखिये किस दिन शहीद करते हैं



ये नफ़रतें तो महज़ आरज़ी हैं,सच ये है

यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं



मुसालहत की अगर आरज़ू है तुमको भी

तो आओ बैठ कर गुफ़्त-ओ-शुनीद करते हैं



वफ़ा से दूर तलक जिन को वास्ता ही नहीं

ये लोग उनसे इसी की उमीद करते हैं



तू भूल से भी "समर" मेरा… Continue

Added by Samar kabeer on July 10, 2017 at 12:31am — 26 Comments

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़



यारों में जब रंजिश होने लगती है

चुपके चुपके साज़िश होने लगती है



आँखों में जब सोज़िश होने लगती है

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है



बाबू जी का साया सर से उठते ही

धरती की पैमाइश होने लगती है



तुम जब मेरे साथ नहीं होते जानाँ

मुझ पर ग़म की यूरिश होने लगती है



मुझसे कोई काम अटक जाता है जब

उनको मेरी काविश होने लगती है



जब जब भी मैं नाम तुम्हारा लिखता हूँ

हाथों में क्यूँ लरज़िश… Continue

Added by Samar kabeer on July 4, 2017 at 12:07am — 39 Comments

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