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'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'

मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन
ख़ुलूस-ओ-प्यार की उनसे उमीद कैसे हो
जो चाहते हैं कि नफ़रत शदीद कैसे हो

छुपा रखे हैं कई राज़ तुमने सीने में
तुम्हारे क़ल्ब की हासिल कलीद् कैसे हो

बुझे बुझे से दरीचे हैं ख़ुश्क आँखों के
शराब इश्क़ की इनसे कशीद् कैसे हो

हमेशा घेर कर कुछ लोग बैठे रहते हैं
अदब पे आपसे गुफ़्त-ओ-शुनीद कैसे हो

इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर
अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो
----
शदीद-सख़्त
क़ल्ब-दिल
कलीद्-चाबी
कशीद्-खींचना
गुफ़्त-ओ-शुनीद-बात चीत
पलीद-गन्दा,ग़लीज़
समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 8:57pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 7:53pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है आदरणीय समर भाई जी | हार्दिक बधाई आपको |

Comment by Samar kabeer on September 12, 2017 at 2:32pm
जनाब अफ़रोज़'सहर'साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Afroz 'sahr' on September 12, 2017 at 12:54pm
आली जनाब समर कबीर साहब निहायत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल है!अल्लाह नज़रे बद से बचाए!उम्दा कवाफ़ी के बेहतरीन इस्तेमाल ने ग़ज़ल को मज़ीद मुज़य्यन कर दिया!दिल की गहराईयों से मुबारकबाद पेश ए ख़िदमत
है!कुबूल फ़रमाएं!
Comment by Samar kabeer on September 10, 2017 at 11:01am
जनाब रवीन्द्र पाण्डेय जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Ravindra Pandey on September 10, 2017 at 9:25am

शानदार ग़ज़ल के लिए आपको मुबारकबाद समर कबीर साहब..

बहुत ही सुन्दर... करीने से सजाकर आपने ये खुबसूरत ग़ज़ल पेश की है...

पढ़कर मजा आ गया...

http://kavi-ravindra.blogspot.in

Comment by Samar kabeer on August 4, 2017 at 9:43pm
जनाब श्याम किशोर सिंह साहिब आदाब,मैं अपनी ग़ज़ल के साथ मुश्किल शब्दों के अर्थ इसी लिये लिख देता हूँ कि जो पाठक उर्दू नहीं जानते उनको ग़ज़ल समझने में आसानी हो ।
सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 4, 2017 at 9:11pm

श्रीमान समर कबीर साहब, सादर नमस्कार!

यूँ तो मुझे उर्दू का सतही ज्ञान भी नहीं है, जो थोड़ा बहुत है वो फ़िल्मी गीतों, और गज़लों को सुनकर ही हुआ है। ऐसे में आपका ये तरीका बेहतर है कि भारी शब्दों के अर्थ लिख दिए जाएँ ताकि हम जैसे लोग भी समझ पाएँ और गाहे - बगाहे उर्दू शब्दों का प्रयोग भी कर पाएँ। इस प्रयास के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।

Comment by Samar kabeer on August 1, 2017 at 5:55pm
जनाब उपाध्याय जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 1, 2017 at 1:32pm

"इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर
अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो"
वाह वाह ! शानदार ग़ज़ल !! बधाई स्वीकार करें  Samar kabeer साहब | 

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