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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – July 2016 Archive (7)

बैठा चिता पर हवन कर रहा है-ग़ज़ल

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बैठा हुआ बस मनन कर रहा हूँ।
दुख बाँटने का जतन कर रहा हूँ।।

पीड़ा जगत की है मन को लपेटे।
नयन नीर से आचमन कर रहा हूँ।।

संसार से तम मिटाने की चाहत।
चिन्ता चिता पर हवन कर रहा हूँ।।

अधरों पे मुस्कान आई अचानक।
प्रियतम से मानो मिलन कर रहा हूँ।।

लिखता चला जा रहा भावनायें।
कहते हैं सब मैं सृजन कर रहा हूँ।।

हर शब्द महके मेरी लेखनी का।
मनुजता मनुजता भजन कर रहा हूँ।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 25, 2016 at 11:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल खूबरू इक लिखूँ तुझ ग़ज़ल पर--------पंकज

122 122 122 122



इज़ाज़त ये तुमसे, है माँगे सुखनवर।

ग़ज़ल खूबरू इक, लिखे तुझ ग़ज़ल पर।।



कहो तो लिखे झील, आँखों को तेरी।

लिखे, चाहता हुस्न, का इक समंदर।।



गज़ब की हो तुम तो, विधाता की रचना।

बहुत खूबरू ज्यूँ, हिमालय का मंजर।।



ये होंठों की मुस्कान, है क़ातिलाना।

कलम लिख रहा है, इसे ज़िंदा खंज़र।।



है जो मरमऱी सा, बदन ये तुम्हारा।

सजा कर बसाया, इसे मन के अंदर।।



मौलिक-अप्रकाशित



(आदरणीय समर सर की इस्लाह पर… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 14, 2016 at 12:00pm — 6 Comments

कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ----Gazal

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दर पर तुम्हारे बसर छोड़ता हूँ।

लो मैं तुम्हारा नगर छोड़ता हूँ।।

क्या फ़र्क है, ग़र है धड़कन तुम्हीं से।

मैं ज़िन्दगी की बहर छोड़ता हूँ।।

चिंता नहीं कर न आऊँगा मिलने।

कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ।।

तुमको नज़र लग न जाये किसी की

काज़ल ये दिल भस्म कर छोड़ता हूँ।।

खुद पे तुम्हारा यकीं कम न होये।

तुमको ग़ज़ल में अमर छोड़ता हूँ।।

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 10, 2016 at 11:30am — 14 Comments

दर पर किसे रोकना चाहते हो?-ग़ज़ल

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हँसती निगाहें अधर मुस्कुराते
सच सच बताओ कि क्या चाहते हो?

रेशम सी ज़ुल्फ़ें हैं उड़तीं हवा से
बोलो किसे बांधना चाहते हो?

गालों पे ये जो भवर है तुम्हारे
किसको डुबाना भला चाहते हो?

बाँहों पे खुद की टिका करके सर तुम
दर पर किसे रोकना चाहते हो?

बोलो अदाओं की गिराकर
करना किसे तुम फ़ना चाहते हो?

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 6, 2016 at 11:25pm — 10 Comments

चलो बंजारा बनें-ग़ज़ल

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कैद हो रहने से बेहतर, चलो बंजारा बनें।

घुट के यूँ जीने से बेहतर, चलो आवारा बनें।।



देख पैसे की हवस हमको है ले आई कहाँ।

चल के जंगल में रहें आदमी दोबारा बनें।।



अपनी दुनिया में ही मशरूफ हैं लायक तो सभी।

चल मुहल्ले की उदासी हरें नाकारा बनें।।



पूछता कोई नहीं प्यासे हैं कुछ बूढ़े शज़र।

स्नेह बरसाए जो उन पर वही फव्वारा बनें।।



डोर रिश्तों की नहीं दिखती है अँधेरा घना।

हम ही दीपक से जलें रात में उजियारा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 5, 2016 at 5:25pm — 8 Comments

लजाये भला क्यूँ- ग़ज़ल

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ग़ज़ल में एक नया प्रयास- #कुण्डलियाँ# शैली में

बतायें, तो मन में समाये भला क्यूँ।
समाये तो इसको सताये भला क्यूँ।।

सताये अगर तो बतायें ज़रा ये।
अदाओं से इसको रिझाये भला क्यूँ।।

रिझाये तो सपने जवाँ हो गये सब।
जगा कर के चाहत जगाये भला क्यूँ।।

जगाये अगर रात भर आप हमको।
तो घर से न निकले लजाये भला क्यूँ।।

लजाये भी तो सबसे पहले लजाते।
निगाहें निगाह से मिलाये भला क्यूँ।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 3, 2016 at 3:59pm — 5 Comments

सताया मुझे रात भर आपने तो

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सताया मुझे रात भर आपने तो।
जगाया मुझे रात भर आपने तो।

न मिलने ही आये न सन्देश भेजा।
भुलाया मुझे रात भर आपने तो।।

नयन ये बरसते रहे रात भर कल।
रुलाया मुझे रात भर आपने तो।।

अमावस के हिस्से में बस कालिमा है।
सिखाया मुझे रात भर आपने तो।।

सुलगते रहे ख़्वाब जितने थे सारे।
जलाया मुझे रात भर आपने तो।।

मौलिक तथा अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 2, 2016 at 4:58pm — 10 Comments

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