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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – July 2015 Archive (4)

अख़बारों में (सुझाव के निमित्त प्रस्तुत)

बिक जाता है चन्द रूपये की खातिर अख़बारों में।

बहुत तलाशा मिला नहीं पर सच आख़िर अख़बारों में।।



बेंच रहे हैं ज़हर मिलाकर भोजन में बाज़ारों में।

विज्ञापन की बाढ़ आ गयी पैसे से अख़बारों में।।



पेड़ बचाओ करो सफाई ऐसे कैसे संभव है।

भौतिकता का नशा बेंचते रोज़ रोज़ अख़बारों में।।



चोरी और अपराध रुकेगा किस तरहा से कहिये ना।

महंगी वाली कार-मोबाइल दिखते जब अख़बारों में।।



लोभ-मोह का त्याग सिखाते गुरुकुल सारे गायब हैं।

मैकाले की नीति बाँचते विद्यालय…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 30, 2015 at 10:00pm — 4 Comments

श्रद्धांजलि

आधुनिक भारत के भगवान चले गए।
इस देश के असली स्वाभिमान चले गए।।

धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए।
एक साथ गीता और कुरान चले गए।।

मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए।
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।।

इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए।
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।।

ज्ञान राशि के अमित निधान चले गए।।
सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए।।

=============================
मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 27, 2015 at 10:30pm — 11 Comments

खुद को रावण सा लिक्खूँगा

मानवता की नए सिरे से

नूतन परिभाषा लिक्खूँगा।

राम कृष्ण सब लिखो स्वयं को।

खुद को रावण सा लिक्खूँगा।।



जब तक जला नहीं लेता मैं

खुद के भीतर की कामुकता।

जब तक खत्म नहीं हो जाती

शक्ति बाहुबल की अभिलाषा।



जब तक मनस नगर में पुष्पित

है अक्षय स्पृहा वाटिका।

तब तक नैतिकता पर कैसे

कहिये अभिभाषण लिक्खूँगा।।

राम कृष्ण सब लिखो स्वयं को।

खुद को रावण सा लिक्खूँगा।।



जब तक इन आँखों में छाये

हुए रहेंगे लोभ के बादल।

जब… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 9:52pm — 12 Comments

लोकतातंत्र तो दफ़न हो गया संसद की दीवारों में

कुछ तो बात अवश्य मित्र है संसद के गलियारों में।

वर्ना देश नहीं रह जाता अब तक यूँ अँधियारों में।।



उसको ही भाया है जनता सदा रहे दुःख से विह्वल।

जिसको भी सौंपी सत्ता जो पहुँचा उस चौबारे में।।



बड़ी बड़ी बातें जो अब तक घूम घूम कर करते थे।

उनका भी मन रमने लगा है परदेशी सत्कारों में।।



भले चिताएँ जलें सैकड़ों जनता की चौराहों पर।

चाहे जैसे रहे किन्तु हो राजमहल उजियारे में।।



जी करता है फूँक फ़ाँक दूँ काली पुस्तक अंधी देवी।

जब मज़ाक उड़ता है… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 12:11pm — 11 Comments

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