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Featured Blog Posts – July 2010 Archive (64)


सदस्य टीम प्रबंधन
पावस-गीत

.

नव-पावस के भीगे हम-तुम...

कुछ अनचीन्हे कुछ परिचित-से मृदुभावों में जीएँ हम-तुम।



इस भावोदय की वेला में चलो अलस की साँझ भुला दें

चाह रहे जो कहना अबतक आज जगत को चलो सुना दें

इच्छाएँ कह अपनी सारी जड़-चेतन झन्ना दें हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...



अर्थ बने क्यों रुकने के अब, अलि तन्द्रिल हो क्यों उपवन में

गंध बँधे कब तक कलियों में, पवन रुके कब तक आँगन में

नीरस-चर्या सभी बदल कर नव-उल्लास गहें मिल हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे… Continue

Added by Saurabh Pandey on July 27, 2010 at 2:02pm — 6 Comments

चिंतन और आकलन: हम और हमारी हिन्दी संजीव सलिल'

चिंतन और आकलन:



हम और हमारी हिन्दी



संजीव सलिल'

*



हिंदी अब भारत मात्र की भाषा नहीं है... नेताओं की बेईमानी के बाद भी प्रभु की कृपा से हिंदी विश्व भाषा है. हिंदी के महत्त्व को न स्वीकारना ऐसा ही है जैसे कोई आँख बंद कर सूर्य के महत्त्व को न माने. अनेक तमिलभाषी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार हैं. तमिलनाडु के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में प्रति वर्ष सैंकड़ों छात्र एम्.ए. और अनेक पीएच. डी. कर रहे हैं. मेरे पुस्तक संग्रह में अनेक पुस्तकें हैं जो तमिलभाषियों ने… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 26, 2010 at 10:38am — 6 Comments

गुरु पूर्णिमा पर : दोहे गुरु वंदना के... संजीव 'सलिल'

गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरूवार.

गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार..

*

विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.

अगम अमित है गुरु कृपा, कोई नहीं पर्याय..

*

गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.

ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भाव का पाश..

*

गुरु भास्कर अज्ञान तम्, ज्ञान सुमंगल भोर.

शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर..

*

गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान.

ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान..

*

गुरुता…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 25, 2010 at 8:30am — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
सदन खड़ी द्रोपदी बनकर...

कौरव पांडव मिल चीर खीचते ,

सदन खड़ी बेचारी द्रोपदी बनकर,

हाथ जोड़े लुट रही थी वो अबला,

कृष्ण ना दिखे किसी के अन्दर ,



चुनाव का चौपड़ है बिछने वाला ,

शकुनी चलेगा चाल,पासे फेककर,

खेलेंगे खेल दुर्योधन दुश्शाशन ,

होगा खड़ा शिखंडी भेष बदलकर,



हे!जनता जनार्दन अब तो जागो,

रक्षा करो कृष्ण तुम बनकर,

दिखाओ,तुम्हे भी आती है बचानी आबरू ,

"बागी" नहीं जीना शकुनी का पासा बनकर,…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2010 at 8:00pm — 22 Comments

आईना

जो सच है वही दिखाता है आईना.

कहाँ -कहाँ दाग जिस्म पर, दिखलाता है आईना.

जो सच है वही दिखाता है आईना.

चेहरे भले बदलते हैं, पर बदले ना आईना.

राजा-रंक या ऊँच-नीच का, भेद ना माने आईना.

सच्चाई का एक धर्म ही, मानता है आईना.

जो सच है वही दिखाता है आईना.

चाहे कोई कुछ भी कर ले, झूठ कभी ना बोले.

बुरा लगे या भला लगे, ये भेद सभी का खोले.

चेहरा गर हो दागदार तो, शरमाता है आईना.

जो सच है वही दिखाता है आईना.

दिन भर में लाखों को उनका, चेहरा दिखलाता… Continue

Added by satish mapatpuri on July 21, 2010 at 4:44pm — 5 Comments

एक मजदूर की भूख

उसके भी

दो आँख /दो कान /एक नाक है

थोड़े अलग है तो उसके हाथ ॥

मेरा हाथ उठाता है कलम

मगर

उसके हाथ उठाते है कुदाल

और इसी कुदाल से

लिख लेता है वह

अनजाने में ही

देश प्रेम की गाथा ॥



मेरी माँ कहती है

भूख लगे तो खा लो

नहीं तो भूख मर जाती है ॥





जब भारत बंद/ बिहार बंद होता है

उसकी भूख मर जाती है

कई बार /बार -बार ॥



ओ ...बंद कराने वाले नेताओ

आर्थिक नाकेबंदी करने वाले नक्सलवादियों

क्या आपकी भी… Continue

Added by baban pandey on July 18, 2010 at 6:18pm — 5 Comments

हम नहीं सुधरेगे

वर्षा में नाले जाम है

नगर निगम वाले आते ही होंगें

दोषी , और मैं

क्या कह रहे है आप ?



मैंने क्या किया भाई

बस

घर के थोड़े से कचड़े

पोलीथिन में बाँध कर

नाले में इसलिए डाल दी

क्योकि ......

कचड़े का कंटेनर

मेरे घर से मात्र २०० फिट दूर है ॥



मैं अफसर हो कर

२०० फिट दूर क्यों जाऊ

नाक कट जायेगी मेरी

महल्ले वाले क्या कहेगे ॥





उधर , राजघाट पर

एक विदेशी सज्जन ने

लाइटर से सिगरेट जलाई

और राख एक… Continue

Added by baban pandey on July 17, 2010 at 10:00pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
मैं घबरा जाता हूँ...

मैं घबरा जाता हूँ यह सोच सोच कर ,
कैसे कोई गरीब अपना घर चलाता होगा,

सौ लाता है मजदूर पूरे दिन मर कर,
कैसे भर पेट दाल रोटी खा पाता होगा,

बीमार मर जायेगा दवा का दाम सुनकर,
हे! ईश्वर कैसे वो ईलाज कराता होगा,

मुर्दा डर जायेगा लकड़ी की दर सुनकर,
कैसे कोई मजलूम शव जलाता होगा ,

लगी है आग गंगा में महंगाई की "बागी",
कैसे कोई अधनंगा डुबकी लगाता होगा ,

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 17, 2010 at 3:00pm — 16 Comments

प्यार में डूबने के बाद

कुर्क हो जाती है आत्मा मेरी तुम्हारी मुस्कान से हर बार

सुर्ख मधुर अधरों से गूंजा सा मेरा नाम जब पुकारती हो तुम



स्वेक्षा से अपने आप को को मरता हुआ सा देख सकता हु

मार डालो मुझे मृत्यु तुम्हारे अधरों पे लटका देख सकता हु



नित तुम्हारा नाम लेता हु चेहरा मस्तिस्क में लिए फिरता हु

हम तुम शब्दों के पुष्प उछाल रहे हैं दिल का स्पंदन जब्त सा है



मुक्त करो तुम्हारी यादो के भरोसे से संजोकर मुझे आज

तुम में पूरा डूबा मैं अब किनारे पर सूखने की कोशिश में… Continue

Added by Anand Vats on July 17, 2010 at 2:30pm — 6 Comments

नज़रिया

एक कवि ने
अपनी कवितायें
पत्रिका में
प्रकाशित करने को भेजी ॥

संपादक महोदय ने
कचड़ा कह लौटा दिया ॥
पुनः दूसरी पत्रिका में भेजी
सहर्ष स्वीकृत की गयी
और प्रकाशित हुई ॥


इधर रिश्ते बनाने के क्रम में
माँ ने
लड़की को नापसंद कर दी ॥
पुनः उसी लड़की को
दुसरे लड़के की माँ ने देखा
फूलों की मलिका की संज्ञा से नवाजा ॥

सच
हर चीज में दो चेहरा नहीं होता
बल्कि हम
अपने -अपने तरीके से देखते है ॥

Added by baban pandey on July 17, 2010 at 7:26am — 3 Comments

वाह , क्या कहने !!!

बैंक अधिकारी है मेरे मित्र
कृषि ऋण देने में कहते है
बैंक का फायदा कम हो जाएगा ॥
मगर ...
किसानों से पूछते है
भिन्डी २५ रूपये किलो क्यों ?


महिला आयोग की सदस्यों ने
मंच पर
दहेज़ प्रथा के खिलाफ खूब बोली ॥
पर जब
रिश्तों की बात चली
भरपूर मांग कर दीं ॥
याद दिलाने पर कहा
मंच की बात मंच पर ही ॥

Added by baban pandey on July 16, 2010 at 9:11pm — 3 Comments

क्या बिच्छु डंक मारना छोड़ सकता है ??

मुंबई पर
आतंकवादी हमलों (२६/११) के बाद
रेलवे स्टेशनों पर
लगाए गए थे
मेटल डिटेक्टर ॥
अब
हटा दिए गए ॥
पूछने पर अधिकारी ने बताया
पकिस्तान से
हमारे रिश्ते सुधर गए है ॥



मैं सोच रहा था
क्या सचमुच
एक बिच्छू
डंक मारना छोड़ सकता है ?

Added by baban pandey on July 16, 2010 at 9:09pm — 3 Comments

कमर तोड़ दी ये बेदर्द महंगाई ,

कमर तोड़ दी ये बेदर्द महंगाई ,
जीने नहीं देती हैं बेशर्म महंगाई ,
गेहू जो आज कल राशन में आता हैं ,
तीन दिन तक भोजन चल पाता हैं ,
सत्ताईस की हर दम रहती है जोहाई,
कमर तोड़ दी ये बेदर्द महंगाई ,
चीनी के दाम बढे आलू रुलाता हैं ,
चावल लेने में आसू आ जाता हैं ,
नौकरी नहीं हैं करता खेती बारी ,
बारिश ना होती हैं जाती जान हमारी ,
बचालो जीवन मेरा सरकार दुहाई ,
कमर तोड़ दी ये बेदर्द महंगाई ,

Added by Rash Bihari Ravi on July 16, 2010 at 5:30pm — 1 Comment

जिंदगी

जिंदगी फ़िर हमें उस मोड़ पे क्यों ले आई । याद आई वो घड़ी आँख मेरी भर आई ।

जिंदगी तेरे हर फ़साने को , मैंने कोशिश किया भुलाने को ।

मेरी आंखों से खून के आंसू , कब से बेताब हैं गिर जाने को ।

मेरे माजी को मेरे सामने क्यों ले आई । याद आई वो घड़ी आँख मेरी भर आई ।

मैंने बस मुठ्ठी भर खुशी मांगी , प्यार की थोड़ी सी ज़मीं मांगी ।

अपनी तन्हाइयों से घबड़ाकर , अपनेपन की कुछ नमीं मांगी ।

क्या मिला- क्या ना मिला फ़िर वो बात याद आई । याद आई वो आँख मेरी भर आई ।

जिंदगी मैंने तेरा रूप… Continue

Added by satish mapatpuri on July 16, 2010 at 3:58pm — 6 Comments

सत्य दिखता नही ,

सत्य दिखता नही ,

या सच्चाई से परहेज हैं ,

सच्चाई स्वीकारते नहीं ,

इसी बात का खेद हैं ,

सच्चाई न स्वीकारना ,

कितना महंगा पड़ता है ,

आप ही देखिये ,

महाभारत गवाह हैं ,

रामायण ही लीजिये ,

रावण की लंका जली ,

सत्य दिखा तुलसी को ,

तो तुलसी दास बने ,

सत्य दिखा बाल्मीकि को ,

तो उत्तम प्रकाश बने ,

सत्य दिखा अर्जुन को ,

कितनो का कल्याण किये ,

सत्य दिखा सिद्धार्थ को ,

तो गौतम महान बने ,

सत्य दिखा हरिश्चंद्र को… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on July 15, 2010 at 3:00pm — 1 Comment

दिनचर्या

मैं नदियो पर बाँध बनाकर

और नहरें खोदकर ,

पानी किसानों के खेतों तक पहुचाता हू ॥

मैं सिंचाई विभाग में काम करता हू ॥





किसान कहते है

सर , जब फसलों में बालियां आती है

मेरे चेहरे में खुशियाली आती है ॥



पत्नी कहती है

जब किचन में लौकी काट देते हो

तुम अच्छे और सच्चे लगने लगते हो ॥







जब एक खिलाडी कम होता है

बच्चे कहते है ...

अंकल , बोल्लिंग कर दो न

कर देता हू ...

फिर कहते है ..थैंक अन्कल ॥



मैं… Continue

Added by baban pandey on July 14, 2010 at 6:37am — 1 Comment

मेरी कविता को लिफ्ट करो

हे ! प्रभु !!

महंगाई की तरह

मेरी कविता को लिफ्ट करो ॥

सब मेरे प्रशंसक बन जाए

ऐसा कुछ गिफ्ट करो ॥





जब भारतीय नेता न माने

जनता -जनार्दन की बात

डंके की चोट पर

वोटिंग मशीन पर हीट करो ॥

मेरी कविता को लिफ्ट करो





जब न पटे , हमारी - तुम्हारी

और काम न बने न्यारी -न्यारी

मत देखो इधर - उधर

दूसरी पार्टी में शिफ्ट करो ॥

मेरी कविता को लिफ्ट करो ॥





जब कानून की जड़े हिल जायें

और न्याय व्यवस्था सिल… Continue

Added by baban pandey on July 13, 2010 at 10:50pm — 2 Comments

मेरी कविता जलेबी नहीं है

मित्रो , कविता पढना प्रायः दुरूह कार्य है ...यह तब और कठिन हो जाता है ..जब कविता जलेबी हो हो जाती है , मेरा मतलब है , उसका अर्थ केवल ही कवि महोदय ही

explain कर सकते है ...कई मित्रो ने चाटिंग के दौरान मुझे बताया कि आप सरल रूप में लिखते है और कविता का भाव मन में घुस ... जाती है ।, आज अभी इसी के ऊपर एक कविता ....धन्यवाद



मेरी कविता कोई जलेबी नहीं है ॥



रहती है गरीबों के घर

किसानों की सुनती है यह

ये कोई हवेली नहीं है

मेरी कविता कोई जलेबी नहीं है… Continue

Added by baban pandey on July 13, 2010 at 12:52pm — 3 Comments

बंजारा मन

जब बंजारा मन
ज़िन्दगी के किसी
अनजान मोड़ पे
पा जाता है
मनचाहा हमसफ़र
चाहता है,कभी न
रुके यह सफ़र
एक एक पल बन जाये
एक युग का और
सफ़र यूं ही चलता रहे
युग युगांतर

Added by rajni chhabra on July 12, 2010 at 10:13pm — 2 Comments

हक ???

मुझे भी हक है

कुछ भी करूँ.

दूँ सबको दुख-दर्द

या करुँ किसी का कत्ल.

सबको मारूँ,

लाशों की ढेर पर नाचूँ,

देखकर मेरा मृत्युताण्डव,

काँप जाएँ,भाग जाएँ,

मौत का खेल खेलनेवाले दानव.

मुझे भी हक है

दूँ सबको गाली,

हो जाएँ

अपशब्द की पुस्तकें खाली.

ना देखूँ मैं,

माँ,बहन,भाई,

लगूँ मैं कसाई.

देखकर मेरा ऐसा रंग,

मर जाए मानवता,भाईचारा

और प्रेम का तन.

जब मैं ऐसा हो जाऊँगा,

थर्रा जाएँगे,

अपशब्द बोलने…
Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 12, 2010 at 2:18pm — 4 Comments

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