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June 2025 Blog Posts (6)


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ग़ज़ल -मुझे दूसरी का पता नहीं ( गिरिराज भंडारी )

११२१२     ११२१२       ११२१२     ११२१२  

मुझे दूसरी का पता नहीं 

***********************

तुझे है पता तो बता मुझे, मैं ये जान लूँ तो बुरा नहीं

मेरी ज़िन्दगी यही एक है, मुझे दूसरी का पता नहीं

 

मुझे है यकीं कि वो आयेगा, तो मैं रोशनी में नहाऊंगा

कहो आफताब से जा के ये, कि यक़ीन से मैं हटा नहीं

 

कहे इंतिकाम उसे मार…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 26, 2025 at 8:30pm — 8 Comments

करेगी सुधा मित्र असर धीरे-धीरे -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२

*****

जुड़ेगी जो टूटी कमर धीरे-धीरे

उठाने लगेगा वो सर धीरे-धीरे।१।

*

दिलों से मिटेगा जो डर धीरे-धीरे

खुलेंगे सभी के  अधर धीरे -धीरे।२।

*

नपेंगी खला की हदें भी समय से

वो खोले उड़ेगा जो पर धीरे -धीरे।३।

*

भले द्वेष का  विष चढ़े तीव्रता से

करेगी सुधा मित्र असर धीरे-धीरे।४।

*

उलझती हैं राहें अगर ज़िन्दगी की

सुलझती भी हैं  वे मगर धीरे-धीरे।५।

*

भला क्यों है जल्दी मनुज को ही ऐसी

हुए   देव   भी …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 25, 2025 at 11:40pm — 4 Comments

कहते हो बात रोज ही आँखें तरेर कर-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

221/2121/1221/212

***

कहते हो बात रोज ही आँखें तरेर कर

होगी कहाँ से  दोस्ती  आँखें तरेर कर।।

*

उलझे थे सब सवाल ही आँखें तरेर कर

देता  रहा  जवाब  भी  आँखें  तरेर कर।।

*

देती  कहाँ  सुकून  ये  राहें   भला मुझे

पायी है जब ये ज़िंदगी आँखें तरेर कर।।

*

माँ ने दुआ में ढाल दी सारी थकान भी

देखी जो बेटी  लौटती  आँखें तरेर कर।।

*…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 24, 2025 at 9:28pm — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - सुनाने जैसी कोई दास्ताँ नहीं हूँ मैं

.

सुनाने जैसी कोई दास्ताँ नहीं हूँ मैं 

जहाँ मक़ाम है मेरा वहाँ नहीं हूँ मैं.

.

ये और बात कि कल जैसी मुझ में बात नहीं    

अगरचे आज भी सौदा गराँ नहीं हूँ मैं.

.

ख़ला की गूँज में मैं डूबता उभरता हूँ   

ख़मोशियों से बना हूँ ज़बां नहीं हूँ मैं.

.

मु’आशरे के सिखाए हुए हैं सब आदाब  

किसी का अक्स हूँ ख़ुद का बयाँ नहीं हूँ मैं.

.

सवाली पूछ रहा था कहाँ कहाँ है तू

जवाब आया उधर से कहाँ नहीं हूँ मैं?

.

परे हूँ जिस्म से अपने…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2025 at 1:08pm — 23 Comments

तरही ग़ज़ल

2122 2122 2122 212 

मित्रवत प्रत्यक्ष सदव्यवहार भी करते रहे

पीठ पीछे लोग मेरे वार भी करते रहे

वो ग़लत हैं जानते थे पर अहेतुक स्नेहवश

हम सभी से मित्रवत व्यवहार भी करते रहे

आपके मंतव्य में थे अन्यथा कुछ अर्थ तो

मौन रहकर भाव से प्रतिकार भी करते रहे

दुष्प्रचारित कर रहे वो क्या कहूँ छल छद्म पर

शत्रुओं का पक्ष लेकर प्यार भी करते रहे

लाभ एवं हानि का था लक्ष्य उन के प्रेम में

अस्तु वो संबंध में व्यापार…

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Added by Ravi Shukla on June 9, 2025 at 1:25pm — 8 Comments

गीत-आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा

सार छंद 16,12 पे यति, अंत में गागा



अर्थ प्रेम का है इस जग में

आँसू और जुदाई

आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा

कैसी रीत चलाई



सूर्य निकलता नित्य पूर्व से

पश्चिम में ढल जाता

कब से डूबा सूर्य हृदय का

अब भी नजर न आता



धीरे धीरे बढ़ता जाए

अंतस में अँधियारा

दिशाहीन पथहीन जगत में

भटक रहा बंजारा



अभी शेष है कितनी पीड़ा

बोलो कुछ पुरवाई

आह बुरा हो कृष्ण तुम्हारा

कैसी रीत चलाई



ओ दक्षिण को…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 5, 2025 at 12:30pm — 12 Comments

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