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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – February 2017 Archive (5)

ये मान सरोवर का पंकज, आँखों में ढूंढे है पानी- पंकज मिश्रा की गजल

22 22 22 22 22 22 22 22



कब रात हुई कब सुब्ह हुई, इस पत्थर ने कब है जानी

जब ताप चढ़ा ग़म का बेहद, तब धड़कन ने की मनमानी



चिंगारी पैदा होनी है, इस पत्थर से मत टकराओ

शोला ए इश्क़ ही भड़केगा, ग़र तूने बात नहीं मानी



वो सभी कथानक कल्पित हैं, जिनमें प्रियतम से मिलन हुआ

इस देवदास की प्यास अमिट, जो साथ घाट तक है जानी



ले जाना है तो ले जाओ, ये कुंडल कलम व ग़ज़ल कवच

इतिहास भला कैसे बदले, हर युग में कर्ण परम् दानी



इस दर पर लक्ष्मण का स्वागत,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 12, 2017 at 11:00am — 19 Comments

नामुमकिन है- गजल

22 22 22 22 22 22 22 2

(बह्र ए मीर)



वो आएं मैं चहक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है

उन्हें देख कर चमक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



तन पाटल चन्दन मन सुरभित वाणी ज्यों कचनार झरे

उनसे मिल कर महक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



गेंहुवन रंग लटें नागिन सी हृदय पे सीधे वार करें

फिर भी उनके निकट न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



सुर सरिता अधरों से बहती, इधर राग स्नेहिल पंछी

कोकिल स्वर संग कुहक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



भाव भंगिमाओं का उत्तर,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2017 at 10:48pm — 13 Comments

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही-पंकज मिश्र

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही



मासूम बच्चों की किलकारियों में

खोया हुनर अपना हम आज ढूंढें



चलते ठुमक कर के नन्हें पगों सं'ग

हम भी तो चलने का कुछ सीख लें ढं'ग



जीने का अंदाज़ पाने दे यूँ ही

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही।।



गिल्लू फुदकती, चहकते परिंदे

हम सीख लें मस्त, रहना तो इनसे



कल कल का संगीत बहती नदी से

कोयल की कू कू, से स्वर सीखने दे



हो के मगन मुस्कुराने दे यूँ ही

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 5, 2017 at 4:15pm — 4 Comments

मैं ज़िन्दगी का आशिक़, भावों से पिला साक़ी- पंकज द्वारा गजल

221 1222 221 1222



ये जाम अलग रख दे, आँखों से पिला साक़ी

सदियों से अधूरी है, होठों से पिला साक़ी



अंगूर की मदिरा तो, करती है असर कुछ पल

ता उम्र नशा होए, साँसों से पिला साक़ी



गिर जाते जिसे पीकर, वो जाम नहीं चाहूँ

आऊँ मैं नज़र खुद को आँखों से पिला साक़ी



मैं तोड़ भी लाऊँगा कह दे तो सितारे भी

तू इश्क़ को ग़र अपने ख्वाबों से पिला साक़ी



शीशे के ये पैमाने बेजान नहीं भाते

मैं ज़िन्दगी का आशिक़, भावों से पिला साक़ी



मौलिक… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 2, 2017 at 9:30am — 8 Comments

ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही---- पंकज द्वारा गजल

2122 2122 2122 212
ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही
और मीरा पर नशे सी प्रीत चढ़ती ही रही

फैसला दुनिया का कुछ औ इश्क़ को मंजूर कुछ
कोई दीवानी मुरत अश्कों से गढ़ती ही रही

रास राधा संग कान्हा का हुआ ब्रज भूमि में
एक पगली मूर्ति की मुस्कान पढ़ती ही रही

तान मुरली पर मचल कर नृत्य करतीं गोपियाँ
इक दिवानी प्रिय को अपने हिय में मढ़ती ही रही


मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 1, 2017 at 12:25pm — 6 Comments

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