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August 2011 Blog Posts

दहेज प्रथा: बीच बहस में

दहेज प्रथा पर तमाम लोगों का एकमत राय है कि यह एक अभिशाप है, कि सभ्य समाज पर कलंक है, कि ....... . परन्तु यह सोचने और मंथन करने की बात है कि इतनी ज्यादा बहस, निंदा और कानूनों को बना-बनाकर ढेर लगा देने के बाद भी यह प्रथा समाप्त नहीं हो पा रही है, वरन् नये सिरे से परवान चढ़ रही है, इसके पीछे अवश्य ही कोई ता£कक और गंभीर कारण भी तो रहे होंगे, जिसपर भी ध्यान देना चाहिए. आइए एक नजर डालते है:

1. लड़की पक्ष हमेशा ही खुद से ज्यादा क्वालिफाई और सम्पन्न तबका का हिस्सा बनाना चाहता है, दुर्भाग्य से…

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Added by Rohit Sharma on August 2, 2011 at 7:14pm — 1 Comment

ओ बी ओ अष्टक

एक समय रवि साथ लिए सब,

बागी गणेश प्रीतम जी आयो,

ओबीओ का जब जनम भयो तब,

ये ख़ुशी लिए बिजय जी आयो,

सभे मिली जब किये बिनती,

योगराज जी प्रधान बने हमारो,



को नहीं जानत हैं ओबीओ पर,

पाठ साहित्य पर होत बिचारो!



गजल की बात राणाजी शुरू कियो,

तब आगे बढ़ी तिलकराज जी आयो,

योगराज जी साथ दियो तब,

अम्बरीश जी किये बिचारो,

शुरू किये सब मिली मुशायरा,

सौरभ जी और अभिनव हमारो.



को नहीं जानत हैं ओबीओ पर,

पाठ साहित्य पर होत…

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Added by Rash Bihari Ravi on August 1, 2011 at 8:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल - अश्कों से चश्में-तर कर गया कोई

अश्कों से चश्में-तर कर गया कोई।
वीरान सारा शहर कर गया कोई।।

सारा जहाँ मुसाफिर है तो फिर क्या मलाल।
गर किनारा बीच सफर कर गया कोई।।

नावाकिफ थे जो राहे-खुलूस से।
उन्हें इल्म पेशे-नजर कर गया कोई।।

जिनकी जुबाँ से नफरत की बू आती थी।
उन्हें उलफत से मुअतर कर गया कोई।।

जिंदगी का सफर काटे नहीं कटता चंदन।
तन्हा जिसे हमसफर कर गया कोई।।

नेमीचंद पूनिया चंदन

Added by nemichandpuniyachandan on August 1, 2011 at 5:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल - ग़मों का दौर हूँ मैं

ग़ज़ल - ग़मों का दौर हूँ मैं

ग़मों का दौर हूँ मैं ,

ग़ज़ल है और हूँ मैं |

 

दशहरी गंध तुम हो ,

तुम्हारी बौर हूँ मैं |

 

तेरा हर तिल…

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Added by Abhinav Arun on August 1, 2011 at 4:19pm — 15 Comments

मुक्तिका: ..... बना दें --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

..... बना दें

संजीव 'सलिल'

*

'सलिल' साँस को आस-सोहबत बना दें.

जो दिखलाये दर्पण हकीकत बना दें.. 



जिंदगी दोस्ती को सिखावत बना दें..

मदद गैर की अब इबादत बना दें.



दिलों तक जो जाए वो चिट्ठी लिखाकर.

कभी हो न हासिल, अदावत बना दें..



जुल्मो-सितम हँस के करते रहो तुम.

सनम क्यों न इनको इनायत बना दें?



रुकेंगे नहीं पग हमारे कभी भी.

भले खार मुश्किल बगावत बना दें..



जो खेतों में करती हैं मेहनत…

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Added by sanjiv verma 'salil' on August 1, 2011 at 11:30am — 4 Comments

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