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डॉ. नमन दत्त and fauzan are now friends
Sep 12, 2011
fauzan commented on Aradhana's blog post अब तक
"एक बात कही थी याद है अब तकलहज़े-वह्ज़े याद नहींएक दर्द हुआ, एहसास है अब तकदिल या ज़हन में याद नहीं .........waaaaaaaaaaaaaaaaaah.........bahut khoob...."
Sep 10, 2011
fauzan posted a status
"wo chahta hai ki uske adheen ho jaun / wo aasman rahe mai zameen ho jaun // fauzan"
Sep 9, 2011
fauzan commented on mohinichordia's blog post मुक्तक
"हकीकत न बन सके ख्वाब  लेकिन सोचती हूँ , उन चंद हसीन लम्हों की रोशनी काफी होगी  बची हुई जिन्दगी का सफ़र  तय करने के लिए |waaaaaaaah............bahut khoob...."
Sep 8, 2011
fauzan commented on fauzan's blog post Aik Ghazal ke do Sher
"Arun Bhai.........Venus Bhai,,,,,bahut Shukria.......himmatafzai ke liye."
Sep 8, 2011
fauzan posted a status
"mere hone ki wajah aur sabab poochti hai / zindagi mujhse sawalaat ajab poochti hai..//...fauzan."
Sep 8, 2011
fauzan commented on Arun Kumar Pandey 'Abhinav''s blog post ग़ज़ल :- हथेली पे कैक्टस उगाने से पहले
"वो अक्सर हवाओं के रुख़ देखता है , पतंगों से पेंचें लड़ाने से पहले |   घरों से सभी पिंजरों को हटा दो , परिंदों को दाना खिलाने से पहले |.............waaaaaaaaaaaaaaaaaah.............zabardast......kya kahna.........."
Sep 7, 2011
fauzan commented on डॉ. नमन दत्त's blog post जाने कब के बिखर गये होते....
"जाने कब के बिखर गये होते.ग़म न होता,तो मर गये होते.............lajawab matla kaha hai aapne......zindabad   इक ख़लिश उम्र भर रही, वर्ना -सारे नासूर भर गये होते...............zabardast................  "
Sep 7, 2011
Arun Kumar Pandey 'Abhinav' commented on fauzan's blog post Aik Ghazal ke do Sher
"न कल के ख्वाब न पुरखों की आनबान मे हैतेरा वजूद अगर है तो वर्तमान मे है ..... वाह बहुत असर दार हजारों पर भारी इन दो शेरों का वार वाह वाह वाह !!! badhai !!"
Sep 7, 2011
वीनस केसरी commented on fauzan's blog post Aik Ghazal ke do Sher
"वर्तमान शब्द कि ऐसी काफिया बंदी हुई है कि दिल बाग-बाग हो गया   सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई  "
Sep 7, 2011
fauzan commented on mohinichordia's blog post अस्तित्व की तलाश
"Waaaah..........bahut khoob..........sunder anubhuti  se  abhivyakti  tak.......sunder varnan........mubarakbad"
Sep 6, 2011
fauzan posted a blog post

Aik Ghazal ke do Sher

हमारी सोच का पंछी अभी उड़ान मे है ज़ॅमी से दूर बहुत दूर  आसमान मे हैन कल के ख्वाब न पुरखों की आनबान मे हैतेरा वजूद अगर है तो वर्तमान मे है .....See More
Sep 6, 2011
Ganesh Jee "Bagi" left a comment for fauzan
Oct 18, 2010
fauzan replied to Rana Pratap Singh's discussion OBO लाइव तरही मुशायरा-2
"शजर के दुःख में इन्हें साथ कब निभाना है / मसर्रतों के परिंदों का क्या ठिकाना है // ज़मीन ओ ज़र को जो ठोकरों पे रखते हैं / उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है // तुली है बर्क नशेमन तबाह करने पर / हमें भी जिद है यहीं आशियाँ बनाना है // ये बोले…"
Sep 12, 2010
fauzan replied to Rana Pratap Singh's discussion OBO लाइव तरही मुशायरा-2
"Bhai mohabbat hai aapki...koshish karta hun..Allah Hafiz"
Sep 11, 2010
fauzan replied to Rana Pratap Singh's discussion OBO लाइव तरही मुशायरा-2
"Tuli hai barq nasheman tabah karne par / Hame bhi zid hai yahin aashiyan banana hai // Ye bole agni pariksha me Ram Laxman se / Wo bawafa hai magar usko aazmana hai //"
Sep 11, 2010

Profile Information

City State
Uttar Pradesh
Native Place
barabanki
Profession
teacher
About me
I m a nobody

Fauzan's Blog

Aik Ghazal ke do Sher

Posted on September 5, 2011 at 7:37pm 3 Comments

हमारी सोच का पंछी अभी उड़ान मे है
ज़ॅमी से दूर बहुत दूर  आसमान मे है

न कल के ख्वाब न पुरखों की आनबान मे है
तेरा वजूद अगर है तो वर्तमान मे है .....

Ghazal-8

Posted on June 8, 2010 at 12:00am 7 Comments

यदि एकलव्य से विद्यार्थी नहीं होते
तो द्रोणाचार्य कभी स्वार्थी नहीं होते

कहीं पे भाव का अनुवाद छूट जाता है
कहीं पे शब्द समानार्थी नहीं होते

न जाने कौन सा बनवास है की बंजारे
किसी नगर में भी शरणार्थी नहीं होते

न आज है कोई अर्जुन न है महाभारत
तभी तो कृष्ण कहीं सारथि नहीं होते

विनम्रता से क्षमा याचना जो करते हैं
सदा ह्रदय से क्षमाप्रार्थी नहीं होते

Ghazal-7

Posted on June 4, 2010 at 5:32pm 7 Comments

गुमाँ का बोझ हटा तो संभल गया हूँ मैं
इसी यक़ीन के नीचे कुचल गया हूँ मैं

ये क्या कि मोम कि सूरत पिघल गया हूँ मैं
तेरे क़रीब की हर शय में ढल गया हूँ मैं

इस अंधकार की सीमा तलाशने के लिए
एक आफताब से आगे निकल गया हूँ मैं

अज़ीज़ दोस्त के चेहरे की अजनबी आँखें
बता रहीं हैं कि कितना बदल गया हूँ मैं

मेरा वजूद समंदर की रेत जैसा है
ख़याल छाओं का आते ही जल गया हूँ मैं

Ghazal-6

Posted on June 3, 2010 at 9:47pm 8 Comments

रक्त से सारा मरुस्थल तरबतर करते हुए
प्राण तो त्यागे मगर खुद को अमर करते हुए

सब्र की सारी हदों से कोई आगे बढ़ गया
अग्निपथ पे तिशनगी को अग्रसर करते हुए

उसके चेहरे के वरक़ को झुर्रियों से भर दिया
उम्र की रेखाओं ने हस्ताक्षर करते हुए

धीरे धीरे बोझ बुनियादों पे कम होता गया
वक़्त यूँ गुज़रा हवेली को खंडहर करते हुए

ज़िंदगी वो खेल है जिसका समापन ही नहीं
मौत आई खेल मे मध्यांतर करते हुए

Comment Wall (9 comments)

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At 1:33pm on October 18, 2010, Ganesh Jee "Bagi" said…

At 8:11pm on June 20, 2010, asha pandey ojha said…
कहीं पे भाव का अनुवाद छूट जाता है
कहीं पे शब्द समानार्थी नहीं होते

न जाने कौन सा बनवास है की बंजारे
किसी नगर में भी शरणार्थी नहीं होते
kamal gzab
At 8:10pm on June 20, 2010, asha pandey ojha said…
तेरी आँखे बदल भी सकती हैं
मेरा चेहरा बदल नही सकता

मुझ को मिट्टी मे तुम मिला भी दो
तेरे साँचे मे ढल नही सकता
bahut khoob surat ...waah
At 8:09pm on June 20, 2010, asha pandey ojha said…
Your most welcome
At 3:13pm on May 23, 2010, Ganesh Jee "Bagi" said…

At 2:55pm on May 16, 2010, aleem azmi said…
bahut umda likhte hai aap janaab ...hum to aapke kaayal ho gaye
likhte rahiye
At 7:20pm on May 14, 2010, Ratnesh Raman Pathak said…


RATNESH RAMAN PATHAK
At 12:49pm on May 14, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

At 12:31pm on May 14, 2010, Admin said…

 
 
 

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