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Om Prakash Agrawal
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  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' and Om Prakash Agrawal are now friends
May 24
Om Prakash Agrawal commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय जी सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद आदरणीय"
May 20
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आद0 ओम प्रकाश अग्रवाल जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। उर्दू शब्दों से लबरेज। बधाई स्वीकार कीजिये।"
May 20
Om Prakash Agrawal commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय प्रशंसा हेतु साभार धन्यवाद ।"
May 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई ओमप्रकास जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 18
Om Prakash Agrawal replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-109 in the group चित्र से काव्य तक
"चित्र लेखन सार छंद सूरज दादा सूरज दादा , छुप जाओ थोड़ा सा। दूल्हा दुल्हन साथ हमारे , सुस्ता लो थोड़ा सा।। सूरज दादा सूरज दादा , धरती यह तपती है। छुप जाओ थोड़ा सा दुल्हन, तृषित बहुत तरसी है।। कांधे थक कर चूर हुए हैं , अधर प्यास से सूखे। दूल्हे राजा…"
May 16
Om Prakash Agrawal joined Admin's group
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चित्र से काव्य तक

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोंत्सव" में भाग लेने हेतु सदस्य इस समूह को ज्वाइन कर ले |See More
May 16
Om Prakash Agrawal commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय कबीर साहब सराहना और बहुमूल्य सुझावों के लिये सहृदय आपार। आपके सुझावानुसार सुधार कर लेंगे। पुनश्च आभार"
May 16
Samar kabeer commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"जनाब क़दम जयपुरी जी आदाब,मुश्किल क़वाफ़ी में ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल' इस मिसरे में 'हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल इस मिसरे में 'नुक़्ताचीं'…"
May 15
Om Prakash Agrawal posted a blog post

ग़ज़ल

2212 1212 2212 1212यूँ तो ये माहेरीन हैं मशहूर हैं ज़हीन हैंफिर रगड़ें क्यों ज़मीन में कुर्सी को ये जबीन हैंसंसार है विचित्र यह नाकाम कामयाब सबजो माहिर और ज़हीन हैं वह आज दीनहीन हैंहर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़ललअक्सर ज़हीन लोग ही नाक़ाबिल-ए-यक़ीन हैंबंदिश हज़ार थोप दीं तुम ये करो न वो करोक्यों लड़कियां समाज में समझी गयीं रहीन हैंजम्हूरियत तो नाम है चलता है हुक्म शाहों कासब ऊंचे ऊंचे ओहदों पे इनके लवाहिक़ीन हैंसब हुक्मरां हैं जेब में ज़ालिम खुले में घूमतेजो ज़ुल्म हों रिआया पे राजा तमाशबीन…See More
May 15
TEJ VEER SINGH commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय क़दम जयपुरी जी। बेहतरीन गज़ल। जश्न-ए-आज़ादी हूं मैं कैसे कहूँलगता है जैसे हादसा हूँ मैंतोड़ पत्थर में बन गया पत्थरअलविदा ख़ाब कह चुका हूं मैं"
May 14
Om Prakash Agrawal left a comment for लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद"
May 14
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आ. ओमप्रकाश जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 14
Om Prakash Agrawal commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय विजय निकोरे जी, सराहना हेतु साभार धन्यवाद।"
May 14
Om Prakash Agrawal commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय कबीर साहब, आपका सुझाव और सराहना बहुत बहुमूल्य है । हृदय से आभारी हूँ। अपेक्षित सुधार करूंगा। सामार धन्यवाद"
May 14
vijay nikore commented on Om Prakash Agrawal's blog post ग़ज़ल
"आ० कदम जयपुरी जी, गज़ल पढ़ी, लय अच्छी लगी। बधाई आदरणीय। भाई समर कबीर जी, आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझको अक्सर बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है। दिल से शुकिया।"
May 13

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur
Native Place
Agra
Profession
Retired engineer
About me
Learning Ghazal composition

Om Prakash Agrawal's Blog

ग़ज़ल

2212 1212 2212 1212



यूँ तो ये माहेरीन हैं मशहूर हैं ज़हीन हैं

फिर रगड़ें क्यों ज़मीन में कुर्सी को ये जबीन हैं





संसार है विचित्र यह नाकाम कामयाब सब

जो माहिर और ज़हीन हैं वह आज दीनहीन हैं





हर बात में है नुक़्ताचीं सर गर्मियों में है ख़लल

अक्सर ज़हीन लोग ही नाक़ाबिल-ए-यक़ीन हैं





बंदिश हज़ार थोप दीं तुम ये करो न वो करो

क्यों लड़कियां समाज में समझी गयीं रहीन हैं





जम्हूरियत तो नाम है चलता है हुक्म शाहों का

सब… Continue

Posted on May 15, 2020 at 12:06pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22 /112



सिर्फ़ कुर्सी का रास्ता हूँ मैं

यूं रियाया का रहनुमा हूं मैं



आदमी हूं अना है ग़ैरत है

फिर भी वक़्त आने पर बिका हूं मैं



रसन-ए-जोर-ओ-ज़ुल्म इतनी चली

रह गया ढांचा घिस गया हूं मैं



जश्न-ए-आज़ादी हूं मैं कैसे कहूँ

लगता है जैसे हादसा हूँ मैं



तोड़ पत्थर में बन गया पत्थर

अलविदा ख़ाब कह चुका हूं मैं



मुफ़लिसी का न ज़ात-ओ-मज़हब है

ये अगर कह दूं तो बुरा हूं मैं



जेब मुफ़लिस की.. दिल अमीरों… Continue

Posted on May 11, 2020 at 12:04pm — 6 Comments

ग़ज़ल (मातृ दिवस पर विशेष)

2122 2122 2122 212



ख़ुद रही भूकी मुझे जी भर खिलाना याद है

मुफ़लिसी में टाट का 'स्वेटर' बनाना याद है



इम्तिहां कोई भी हो आशीष देती थी सदा

मां का हाथों से दही चीनी खिलाना याद है



एक मुर्शिद की तरह से हाथ सर पर फेरती

मैंने क्या कीं ग़लतियां इक इक गिनाना याद है



पाठशाला हम न जाएंगे ये ज़िद जब हमने की

पकड़े कान और खींच कर बस्ता थमाना याद है



बद-नज़र से दूर रखना था सियह टीका लगा

जो हरारत थोड़ी भी हो सहम जाना याद है



माँ सा तो…

Continue

Posted on May 10, 2020 at 6:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल

सिवाय मंज़िल-ए-मक़्सूद गर क़िफ़ा होगी

मसाफ़त उम्र भर अपनी तो बे-जज़ा होगी

मरीज़-ए-इश्क़ हैं चारागरी भी कीजे जनाब

दवा-ए-क़ुरबत-ए-जानां से ही शिफ़ा होगी

चला हूँ जानिब-ए-कूचा-ए-यार उमीद लिये

सलाम आख़िरी होगा या इब्तिदा होगी

हमारे रिश्ते के उक़्दे खुले नहीं अब तक

लगी जो गिरह-ए-शक़-ओ-शुबह दोख़्ता होगी

हुआ तलत्तुफ़-ए-ख़ैरात -ए-आमिर आज ही क्यों

ज़रूर ख़ूं-ओ-पसीने की इक़्तिज़ा होगी

ज़रूर होंगें फ़साहत पे सामयीं मसहूर…

Continue

Posted on May 7, 2020 at 8:30pm — 2 Comments

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