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Naveen Mani Tripathi
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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आद0 नवीन जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने, शैर दर शैर मुबारकबाद कुबूल करें। सादर"
8 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"आद0 नवीन जी सादर अभिवादन। आद0 आली जनाब समर कबीर साहब के इस्लाह से ग़ज़ल में…"
8 hours ago
Rakshita Singh commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"आदरणीय , नवीन जी बहुत ही खूबसूरत गज़ल , बहुत बहुत बधाई।"
Thursday
Rakshita Singh commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय , नवीन जी आधुनिक युग की वास्तविकता को आपने बहुत ही सुन्दर पंक्तियों में पिरोया..बधाई स्वीकार करें।"
Thursday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"नमन सर "
Thursday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 कबीर सर सादर प्रणाम  । अवश्य ठीक करता हूँ ।"
Thursday
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । छटे शैर के सानी मिसरे में 'जुर्म' की जगह "ज़ुल्म" कर लें । सातवें शैर के सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,'मुल्क को',इसे "देश को" कर सकते…"
Thursday
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"बहुत ख़ूब ।"
Thursday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"जनाब अफरोज सहर साहब शुक्रिया के साथ अमीन"
Thursday
Afroz 'sahr' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई देखो
"जनाब नवीन मणि जी इस सुंदर रचना पर बहुत बधाई आपको,,,,"
Thursday
Naveen Mani Tripathi posted blog posts
Thursday
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई शायद
"आमीन, सुम्मा आमीन ।"
Thursday
Afroz 'sahr' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई शायद
"आमीन,,,"
Thursday
Mohammed Arif commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई शायद
"आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदाब,                                   मुझे आपकी इस्लाह पर आना पड़ा । आने की वजह मिसरों की रब्त और रदीफ " शायद नई नई" है ।…"
Thursday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई शायद
"आ0 कबीर सर काफी हद तक स्थिति साफ हो गई । विशेष आभार के साथ नमन ।"
Wednesday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post उसकी सूरत नई नई शायद
"आ0 मण्डल साहब कबीर सर की इस्लाह से ही मैं सन्तुष्ट होता हूँ । ग़ज़ल तक आने के लिए आभार ।"
Wednesday

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

ग़ज़ल

2122 2122 212

फिर कोई सिक्का उछाला जा रहा ।

रोज मुझको आजमाया जा रहा ।।

मानिये सच बात मेरी आप भी ।

देश को बुद्धू बनाया जा रहा ।।

कौन कहता है यहां सब ठीक है ।

हर गधा सर पे बिठाया जा रहा ।।



हो रहे मतरूफ़ सारे हक यहां ।

राज अंग्रेजों का लाया जा रहा ।।

हर जगह रिश्वत है जिंदा आज भी ।

खूब बन्दर को नचाया जा रहा ।।

कुछ हिफाज़त कर सकें तो कीजिये ।

बेसबब ही जुर्म ढाया जा रहा…

Continue

Posted on December 7, 2017 at 1:58am — 4 Comments

उसकी सूरत नई नई देखो

2122 1212 22

उसकी सूरत नई नई देखो ।

तिश्नगी फिर जगा गई देखो।।

उड़ रही हैं सियाह जुल्फें अब ।

कोई ताज़ा हवा चली देखो ।।

बिजलियाँ वो गिरा के मानेंगे ।

आज नज़रें झुकी झुकी देखो ।।

खींच लाई है आपको दर तक ।

आपकी आज बेखुदी देखो ।।

रात गुजरी है आपकी कैसी ।

सिलवटों से बयां हुई देखो ।।

डूब जाएं न वो समंदर में ।

क्या कहीं फिर लहर उठी देखो ।।

हट गया जब नकाब चेहरे से ।

पूरी बस्ती यहां…

Continue

Posted on December 5, 2017 at 7:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

वक्त के साथ खो गयी शायद ।

तेरे होठों की वो हँसी शायद ।।

बन रहे लोग कत्ल के मुजरिम।

कुछ तो फैली है भुखमरी शायद ।।

मां का आँचल वो छोड़ आया है ।

एक रोटी कहीं दिखी शायद ।।

है बुढापे में इंतजार उसे ।

हैं उमीदें बची खुची शायद ।।

लोग मसरूफ़ अब यहां तक हैं ।

हो गयी बन्द बन्दगी शायद ।।

खूब मतलब परस्त है देखो ।

रंग बदला है आदमी शायद…

Continue

Posted on December 5, 2017 at 2:30pm — 3 Comments

तो दोष क्या है

1222 1222 122



(बिना कोई मात्रा गिराए हिंदी ग़ज़ल)



पलायन का वरण तो दोष क्या है ।

प्रगति पर है ग्रहण तो दोष क्या है ।।



न अपनाओ कभी तुम वह प्रसंशा।

पृथक हो अनुकरण तो दोष क्या है ।।



जिन्हें शिक्षा मिली व्यभिचार की ही ।

करें सीता हरण तो दोष क्या है ।।



मरी हो सभ्यता प्रतिदिन जहां पर ।

नया हो उद्धवरण तो दोष क्या है ।



अनावश्यक अहं की तुष्टि से बच ।

करेंगे संवरण तो दोष क्या है ।।



वो भूखों मर रहा है कौन… Continue

Posted on December 2, 2017 at 8:23am — 5 Comments

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