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Naveen Mani Tripathi
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Naveen Mani Tripathi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-81
"2122 2122 2122 212 चाँद के आने से कुछ रातें सुहानी हो गईं । महफ़िलें बीते दिनों की अब कहानी हो गईं।। हसरतों का क्या भरोसा बह गईं सब हसरतें । वो छलकती आँख में दरिया का पानी हो गईं ।। हुस्न के इजहार का बेहतर सलीका था जिन्हें । देखते ही देखते वो…"
17 hours ago
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भंडारी साहब सादर नमन अत्यंत महत्वपूर्ण इस्लाह के लिए ह्रदय से आभारी हूँ ।"
Thursday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरनीय नवीन भाई , खूबसूरत गज़ल के लिये बधाइयाँ आपको । आ,रवि भाई की बातों का ख्याल कीजियेगा । -- कुछ सलाह है .. सही लगे तो स्वीकार करें ...इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे   ---- इक जख़्म पुराना है इक और नया दोगे इक आग बुझाने में इक आग लगा…"
Thursday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनांब मुहम्मद आरिफ साहब शुक्रिया ।"
Wednesday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 मोहित मुक्त जी सादर आभार ।"
Wednesday
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि शुक्ल जी सादर आभार ।"
Wednesday
Ravi Shukla commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने । बधाई स्‍वीकार करें चौथे श्‍ोर मे तकाबुले रदीफ हो गया है और छठे शेर में शायद मजमून की जगह मजबून टाईप हो गया है देख लीजियेगा ।सादर"
Tuesday
Mohit mukt commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  शेर दर शेर दाद के साथ दिल छूती ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई "
Monday
Mohammed Arif commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।"
Mar 19
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

ग़ज़ल

221 1222 221 1222इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे ।मासूम मुहब्बत है कुछ दाग लगा दोगे ।।कमजर्फ जमाने में जीना है बहुत मुश्किल ।है खूब पता मुझको दो पल में भुला दोगे ।।एहसान करोगे क्या बेदर्द तेरी फ़ितरत ।बदले में किसी भी दिन पर्दे को उठा दोगे ।।कैसे वो यकीं कर ले तुम लौट के आओगे ।इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।।आदत है पुरानी ये गैरों पे करम करना ।अपनों की तमन्ना पर अफ़सोस जता दोगे ।।मजबून वफाओं का लिक्खा है बहुत खत में ।बेख़ौफ़ हवाओं में यह ख़त भी उड़ा दोगे ।।तुमने ही निभाया कब किरदार भरोसे का…See More
Mar 19

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे
"आदरनीय नवीन भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये दिल से बधाइयाँ आपको । बाक़ी बातें आदरनीय समर भाई कह ही चुके हैं , खयाल कीजियेगा ।"
Mar 9
Mahendra Kumar commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे
"अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय नवीन जी। हार्दिक बधाई स्वीकार करें। आदरणीय समर सर की बातों पर ध्यान दें। सादर।"
Mar 8
Mahendra Kumar commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी
"इस अच्छी सामयिक ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय नवीन जी। गुणीजनों की बातों का ध्यान रखें। सादर।"
Mar 8

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी
"आदरणीय नवीन भाई , बहुत अच्छी सामयिक ग़ज़ल हुई है .. हार्दिक बधाइयाँ । आदरनीय समर भाई जी की सुझाई बातों का ख्याल कीजियेगा ।"
Mar 8
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी
"आ0 नीलेश भाई सादर आभार । आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ ।"
Mar 8
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे
"आ0 आरिफ साहब विशेष आभार सर ।"
Mar 8

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

ग़ज़ल

221 1222 221 1222



इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे ।

मासूम मुहब्बत है कुछ दाग लगा दोगे ।।



कमजर्फ जमाने में जीना है बहुत मुश्किल ।

है खूब पता मुझको दो पल में भुला दोगे ।।



एहसान करोगे क्या बेदर्द तेरी फ़ितरत ।

बदले में किसी भी दिन पर्दे को उठा दोगे ।।



कैसे वो यकीं कर ले तुम लौट के आओगे ।

इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।।



आदत है पुरानी ये गैरों पे करम करना ।

अपनों की तमन्ना पर अफ़सोस जता दोगे ।।



मजबून… Continue

Posted on March 19, 2017 at 5:23pm — 8 Comments

ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे

2122 1212 22

कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे ।

चैन आया है हर दफ़ा तुझसे ।।



इक सुलगती हुई सी खामोसी ।

इक फ़साना लिखा मिला तुझसे ।।



वो इशारा था आँख का तेरे ।

दिल था पागल छला गया तुझसे ।।



भूल जाती मेरा तसव्वुर भी ।

क्यूँ हुई रात भर दुआ तुझसे ।।



बेखुदी में जो इश्क कर बैठा ।

उम्र भर बस वही जला तुझसे ।।



कर लूँ कैसे यकीन वादों पर ।

कोई वादा कहाँ निभा तुझसे ।।



कुछ रक़ीबों से गुफ्तगूं करके ।

तीर वाज़िब…

Continue

Posted on March 7, 2017 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी

वज़्न - 2122 1122 1122 22/112



अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी ।

भर गया मुल्क की आँखों में हया का पानी ।।



मिट ही जाए न कहीं शाख जे एन यू की अब ।

आइये साफ़ करें मिल के ये गन्दा पानी।।



मन्नतें उन की हैं हो जाएं वतन के टुकड़े ।

सर के ऊपर से निकल जाए न खारा पानी ।।



कुछ हैं जयचन्द सुख़नवर जो खुशामद में लगे ।

बेच बैठे हैं जो इमानो कलम का पानी ।।



आलिमों का है ये तालीम ख़ता कौन कहे ।

ख़ास साजिश के तहत हद से गुजारा पानी… Continue

Posted on March 6, 2017 at 10:30pm — 8 Comments

आसमा कब से पड़ा वीरान है

2122 2122 212

बेसबब लिखता कहाँ उन्वान है ।

वो नई फ़ितरत से कब अनजान है ।।



कुछ मुहब्बत का तजुर्बा है उसे ।

मत रहो धोखे में वो नादान है ।।



सिर्फ माँगा था अदा की इक नज़र।

कह गई वह जान तक कुर्बान है ।।



दायरों से दूर जाना मत कभी ।

ताक में बैठा कोई अरमान है ।।



है भरोसा ही नहीं खुद पर जिसे ।

ढूढ़ता फिरता वही परवान है ।।



कहकशां में ढूँढिये अब चाँद को।

आसमा कब से पड़ा वीरान है ।।



इश्क़ की गलती करेगा आदमी… Continue

Posted on February 25, 2017 at 12:04am — 1 Comment

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At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें!

 
 
 

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"बहुत आभार नादिर भाई !!!"
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