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Naveen Mani Tripathi
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Naveen Mani Tripathi's Page

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Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 'नए चहरों की कुछ दरकार है क्या' इस मिसरे में 'दरकार'शब्द का अर्थ होता है,ज़रूरी,मतलूब, इस अर्थ में 'चहरों'शब्द की वजह से…"
11 hours ago
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या

1222 1222 122 नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या । बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या ।। बड़ी मुश्किल से रोजी मिल सकी है । किया तुमने कोई उपकार है क्या ।। सुना मासूम की सांसें बिकी हैं । तुम्हारा यह नया व्यापार है क्या ।। इलेक्शन लड़ गए तुम जात कहकर । तुम्हारी बात का आधार है क्या ।। यहां पर जिस्म फिर नोचा गया है । यहां भी भेड़िया खूंखार है क्या ।। बड़ी शिद्दत से मुझको पढ़ रहे हो । मेरा चेहरा कोई अखबार है क्या ।। हिजाबों में खरीदारों की रौनक । गली में खुल गया बाज़ार है क्या ।। बहुत दिन से कसीदे लिख…See More
14 hours ago
Niraj Kumar commented on Naveen Mani Tripathi's blog post नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या
"आदरणीय नविन जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है.दाद के साथ मुबारकबाद.  'गमों का हो गया भरमार है क्या' में शायद 'गमों का' की जगह 'ग़मों की' होना चाहिए था. सादर "
17 hours ago
Mohammed Arif commented on Naveen Mani Tripathi's blog post नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत अच्छे अश'आर । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।"
yesterday
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या
"आद0 नवीन मणि जी उम्दा ग़ज़ल पर दाद हाजिर है,बधाई"
yesterday
laxman dhami commented on Naveen Mani Tripathi's blog post नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या
"आ. भाई नवीन जी बहुत ही धारदार गजलहुई है । हार्दिक बधाई ।"
yesterday
Naveen Mani Tripathi posted a blog post

नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या

1222 1222 122 नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या । बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या ।। बड़ी मुश्किल से रोजी मिल सकी है । किया तुमने कोई उपकार है क्या ।। सुना मासूम की सांसें बिकी हैं । तुम्हारा यह नया व्यापार है क्या ।। इलेक्शन लड़ गए तुम जात कहकर । तुम्हारी बात का आधार है क्या ।। यहां पर जिस्म फिर नोचा गया है । यहां भी भेड़िया खूंखार है क्या ।। बड़ी शिद्दत से मुझको पढ़ रहे हो । मेरा चेहरा कोई अखबार है क्या ।। हिजाबों में खरीदारों की रौनक । गली में खुल गया बाज़ार है क्या ।। बहुत दिन से कसीदे लिख…See More
yesterday
laxman dhami commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"बहुत खूब...हार्दिक बधाई।"
Aug 11
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 गिरिराज भंडारी सर सादर प्रणाम"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 कल्पना भट्ट जी सादर नमन"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 गुरुदेव कबीर सर सादर प्रणाम"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 गजेंद्र श्रोत्रिय जी सादर आभार"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 मुहम्मद आरिफ साहब तहे दिल से शुक्रिया"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 रवि शुक्ला साहब सादर नमन ।"
Aug 9
Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 सन्तोष ख़िरवादकर साहब शुक्रिया"
Aug 9

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरनीय नवीन भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।"
Aug 9

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur , Uttar Pradesh
Native Place
Basti
Profession
Govt. Service
About me
I am a poet and trained astrologer. Write geet and ghazal.

Naveen Mani Tripathi's Blog

नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या

1222 1222 122



नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या ।

बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या ।।



बड़ी मुश्किल से रोजी मिल सकी है ।

किया तुमने कोई उपकार है क्या ।।



सुना मासूम की सांसें बिकी हैं ।

तुम्हारा यह नया व्यापार है क्या ।।



इलेक्शन लड़ गए तुम जात कहकर ।

तुम्हारी बात का आधार है क्या ।।



यहां पर जिस्म फिर नोचा गया है ।

यहां भी भेड़िया खूंखार है क्या ।।



बड़ी शिद्दत से मुझको पढ़ रहे हो ।

मेरा चेहरा कोई अखबार है क्या…

Continue

Posted on August 20, 2017 at 4:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

ख़यानत की खातिर मुहब्बत नहीं है ।

मेरी आशिकी क्या अमानत नहीं है ।।



हुई दफ़अतन जो ख़ता थी नज़र से ।

हमें अब नज़र से शिकायत नहीं है ।।



मिटा कर चले जा रहे हैं उमीदें ।

बची आप में भी सराफ़त नहीं है ।।



चले आइये बज्म में रफ्ता रफ्ता ।

मेरी आप से अब अदावत नहीं है ।।



ठहर जाने वाले यकीं कर मेरा तू ।

मेरे दिल की अब तक इज़ाजत नहीं है ।।



तेरे दर पे आना मुनासिब कहाँ अब ।

वहां आशिकों की निज़ामत नहीं है… Continue

Posted on August 7, 2017 at 5:25pm — 15 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

इतनी जफ़ा शबाब पे लाया न कीजिये ।

मुझको मेरा वजूद बताया न कीजिये ।।



भूखें हैं नौजवान कटोरा है हाथ में ।

थाली किसी के हक़ की हटाया न कीजिये ।।



बेटा पढा लिखा के वो नीलाम हो गया ।

कोटे की राजनीति कराया न कीजिये ।।



अब न्याय क्या करेंगे कभी आप मुल्क से ।

झूठी तसल्लियों को दिलाया न कीजिये ।।



कुर्सी पे जात ढूढ के चेहरा दिखा दिया ।

गन्दा है जातिवाद सिखाया न कीजिये ।।



वो जल रहा है आज भी मण्डल की आग से… Continue

Posted on August 4, 2017 at 7:53pm — 3 Comments

ग़ज़ल -कायम रहा रुतबा तेरा

2212 2212 2212 2212



बस रात भर की बात थी , फिर भी रहा पहरा तेरा ।

ऐ चाँद तेरी बज़्म में कायम रहा रुतबा तेरा ।।



वो तीरगी जाती रही रोशन लगी हर शब मुझे ।

मेरे तसव्वुर में कभी जब अक्स ये उभरा तेरा ।।



टूटा हुआ तारा था इक हँसता रहा क्यूँ कहकशां ।

यूँ ही जमीं से देखता मैं रह गया लहज़ा तेरा ।।



देकर गई है मुफ़लिसी ,कुछ तज्रिबा भी कीमती ।

मुझको अभी तक याद है ,बख़्शा हुआ सदक़ा तेरा।।



है जिक्र तेरे हुस्न का बाकी कोई चर्चा नहीं ।

है… Continue

Posted on August 1, 2017 at 2:00pm — 10 Comments

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At 2:14am on May 8, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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