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ओपन बुक्स ऑन-लाईन, लखनऊ चैप्टर की तृतीय जयन्ती कार्यक्रम (17 मई 2015 ) की एक संक्षिप्त रिपोर्ट – डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव

ओपन बुक्स ऑन-लाईन, लखनऊ चैप्टर की तृतीय जयन्ती कार्यक्रम (17 मई 2015 ) की एक संक्षिप्त रिपोर्ट – डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव

दिनांक 17 मई 2015 , रविवार को डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ , उ0प्र0, लखनऊ के प्रेक्षाग्रह में अंतरजाल की लोकप्रिय

साहित्यिक साईट ओपन बुक्स ऑन-लाइन, लखनऊ चैप्टर का तृतीय जयन्ती समारोह प्रातः 11 बजे संयोजक डा0 शरदिंदु मुकर्जी द्वारा अतिथियों के स्वागत के साथ प्रारम्भ हुआ I अतिथियों में प्रमुख थे –ओ बी ओ के संस्थापक व प्रबंधक आ0 गणेश जी बागी, डा0 धनञ्जय सिंह, डा0 अनिल कुमार मिश्र, डा0 मधुकर अष्ठाना एवं जनाब एहतराम इस्लाम साहेब I सभी सम्माननीय अतिथियों के स्वागत के उपरान्त मंचासीन अतिथियों द्वारा माँ शारदा की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया गया जिसमें हल्द्वानी से पधारीं ओ बी ओ प्रबंधन टीम की सदस्या डा0 प्राची सिंह एवं सुश्री संध्या सिंह ने सहयोग दिया I तदनंतर डा0 प्राची सिंह ने अपने सुमधुर कंठ से वाणी वंदना “हंसवाहिनी वाग्देवी शारदे उद्धार कर I अर्चना स्वीकार कर मन ज्ञान का विस्तार कर II” प्रस्तुत कर सभागार का सारा वातावरण सारस्वत कर दिया. इसी के साथ कार्यक्रम का प्रथम चरण प्रारम्भ हुआ, जिसमें कानपुर से आये श्री नवीनमणि त्रिपाठी ने अपने सहयोगी तबला वादक श्री हरिओम मिश्र के साथ बांसुरी के माध्यम मंगलध्वनि प्रस्तुत की I बांसुरी वादन के उपरान्त ओपन बुक्स ऑन-लाइन, लखनऊ चैप्टर की प्रथम स्मारिका ‘सिसृक्षा’ का विमोचन हुआ I

 

इसके बाद था प्रथम सत्र के कार्यक्रम का मुख्य अंश - प्रख्यात भू-वैज्ञानिक एवं पत्रकार श्री विजय कुमार जोशी ने निकट भविष्य में प्रकाश्य उनके उपन्यास ‘दीवारें बोलती हैं’ के कथानक पर विस्तार से प्रकाश डाला और प्रोजेक्टर के माध्यम से दुर्लभ एवं एनिमेटेड चित्रों द्वारा उपन्यास को शब्दशः चाक्षुष कर दिया I इसमें मंगल नामक एक गरीब मेहतर की कहानी है जो समाज की उपेक्षाएं और यातनाएं सहकर बड़ा होता है और उसकी महत्वाकांक्षा उसे एक अप्रतिम वास्तुकार के रूप में ढालती है I इस कहानी के माध्यम से हम अवध के तमाम जाने और अनजाने इतिहास से रूबरू होते हैं I इस उपन्यास का कथा नायक ही वह चरित्र है जिसने नवाबों और अंग्रेजों द्वारा बनवाई गयी इमारतों में महीन से महीन काम कर वास्तु की स्टूको (stucco) शैली विकसित की, जिसे देखकर आज भी लोग दांतों तले उंगलियां दबाते हैं I बिबियापुर कोठी और मार्टिन की हवेली का सारा शिल्प इसी कथानायक मंगल की उँगलियों के करिश्मे से आज तक जीवंत है I इस उपन्यास को श्री जोशी ने अंग्रेजी भाषा में भी “ Beyond bricks and mortar” शीर्षक से लिखा है जो प्रकाशनाधीन है I

कार्यक्रम के दूसरे चरण में ‘आधुनिक हिन्दी कविता का स्वरुप और उसका भविष्य’ विषय पर परिचर्चा हुयी I इस परिचर्चा में सुमधुर गीतकार डा0 धनञ्जय सिंह, प्रखर आलोचक डा0 नलिन रंजन सिंह, कवि व नवगीत के पुरोधा डा0 मधुकर अष्ठाना, जाने-माने ग़ज़लकार जनाब एहतराम इस्लाम एवं ओपन बुक्स ऑनलाइन के प्रबंधन टीम के सदस्य व प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री सौरभ पाण्डेय प्रतिभागी रहे I परिचर्चा का संचालन जाने-माने आलोचक एवं साहित्यकार डा0 नलिन रंजन सिंह ने किया I

डा0 नलिन रंजन ने बताया कि साहित्य की रीतिकालीन परंपरा द्विवेदी युग तक तो चली किन्तु 1960 ई० तक आते आते मानो कविता अराजक सी हो गयी I कवि यह महसूस करने लगा कि शब्द-विन्यास, अर्थ-विन्यास, भंगिमा, यथार्थ और विकृति को व्यक्त कर पाने में छंद विधा नाकाफी है I काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों पर सभ्यता और बाजारीकरण हावी हो गया है I कवि कर्म कठिन होता जा रहा है I हमारे सामने यह समस्या है कि हम छंदों को अपनाएं या छंद मुक्त अतुकांत कविता में रचना करें I इस प्रश्न पर विचार प्रस्तुत करने हेतु नलिन जी ने डा0 धनञ्जय सिंह को आमंत्रित किया I

डा0 धनञ्जय सिंह ने बड़ी सटीक बात कही कि कविता या कोई भी विधा सदैव अपने आदिम रूप में बनी नहीं रह सकती है I पुराने छंदों की ओर लौटना विपरीत यात्रा भी साबित हो सकती है I कविता वस्तुतः दो स्तरों पर चलती है I एक वह जो जन-जन में पैठ बनाती है, उन्हें लुभाती है I दूसरी वह जो विद्वानों को मानसिक तुष्टि देती है I अतुकांत रचना जन को प्रभावित नहीं करती और न ही उद्धरण बनती है I इस सत्य के बाद भी छंद को नकारने अथवा उसे ओढ़ लेने से भी कोई फायदा नहीं है I हमें बीच का कोई मार्ग तलाशना होगा I अतुकांत कविता की विवशता यह है कि निराला जी का आलंबन लेकर लोग अपनी अयोग्यता को भी सामर्थ्य बनाये हुए हैं I

 

 

डा0 धनञ्जय सिंह की बात का अनुमोदन करते हुए डा0 नलिन रंजन जी ने भी कहा कि अतुकांत कविता के साथ यह बात तो हो कि –“कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है” उन्होंने यह भी कहा कि कविता छंद मुक्त हो, अतुकांत हो इसमें कोई हर्ज नहीं है पर उसमें भी एक लय होनी चाहिये, कुछ कहन भी होनी चाहिए I

डा0 मधुकर अष्ठाना अतुकांत कविता के पक्ष में नहीं दिखे I उनके नजरिये से कविता की पठनीयता अतुकान्तता के कारण कम हुयी है I वे कविता उसे मानते हैं जो लोक चेतना से जुडी हो I लोक क्या चाहता है - लोक को स्वर, ताल, संगीत और राग प्रिय है I निराला ने कभी लय नहीं तोड़ी I ‘वह तोड़ती पत्थर’ पूरी तरह लयबद्ध कविता है. उन्होंने कहा कि वे अकविता को नकारते नहीं पर छंद को बरतरफ कर देना भी उन्हें मंजूर नहीं I कविता का कल्याण विधाओं को छोड़ देने में नहीं उनसे जुड़े रहने में है I कविता का स्वरुप एकांगी नहीं होता I नवीनता का स्वागत है पर प्राचीनता को ठुकराकर नहीं I

डा0 नलिन इस बात से सहमत नहीं दिखे कि कविताओं की पठनीयता कम हुयी है, उनकी नज़र में कवितायें प्रचुरता में छप रही हैं. यह कवित़ा के लिए सुखदायक भविष्य के प्रति इंगित है I कविता कभी ख़त्म नहीं होगी क्योंकि जिस दिन कविता ख़त्म हो जायेगी जीवन का स्पंदन थम जाएगा I उनकी नज़र में विधा मुख्य तत्व नहीं है I मुख्य तत्व है कविता का बड़ी होना I कविता बड़ी वह है जिसमे बुद्धि, भाव, विचार और संप्रेषणीयता हो I

श्री सौरभ पाण्डेय जी ने पहले कविता क्या है, इसे जानने पर बल दिया I विराट दृष्टि से भावपूर्ण गद्य भी कवितामय हो जाता है । जैसे – हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथाएं I कविता में भाषा व्यवहार और शब्द अनुशासन मुख्य तत्व हैं I शाब्दिक लय और भाव-दशा के अभाव में कविता कमजोर होती है I ग़ज़ल की मूलदशा से इतर सामाजिक विक्षोभ और क्रोध के दुखते स्वरों को भी ग़ज़लों में अभिव्यक्ति मिली और हिन्दी भाषा में भी ग़ज़लें लिखी जाने लगीं I हिन्दी में ग़ज़ल के माध्यम से गेयता का प्रचार होना दरअसल क्लिष्ट अतुकांत कविता का ही विरोध है I हिन्दी का पद्य साहित्य अब गीति-काव्य की अन्यान्य विधाओं के माध्यम से पुनः समृद्ध हो रहा है I नवगीत के सुदढ़ प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती. 

संचालक डा0 नलिन रंजन ने वाल्मीकि के मुख से उपजी प्रथम कविता ‘ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम् गमः शाश्वती समाः’ का स्मरण करते हुए इस सत्य को स्वीकार किया कि वाल्मीकि के मन में क्रौंच पक्षियों को देखकर करुणा तो अवश्य आयी होगी पर कहीं न कहीं उस बहेलिये पर उन्हें क्रोध भी आया होगा अर्थात क्रोध/विक्षोभ से भी कविता जन्मती है I किन्तु कविता आकर्षित उन्हें करती है जो संवेदनशील होते हैं अर्थात जब तक संवेदनशील लोग रहेंगे तब तक न कविता का संकट होगा और न पठनीयता का I रस निष्पत्ति के बिना कोई कविता नहीं होती है I

जनाब एहतराम इस्लाम साहेब ने स्पष्ट शब्दों में कहा – “ मैं ग़ज़लकार हूँ और इस नाते से मैं समर्थन तो छंद का ही करूंगा I अतुकांत कविता की ग्राह्यता कुछ भी हो पर एक विधा के रूप में उसे भी स्वीकार करने में परहेज नहीं है I कविता चाहे जिस विधा में हो पर यदि वह सचमुच कविता है तो मुझे मान्य है और छन्द-बद्ध होते हुए भी उसमें कविता न हो तो वह मेरे लिए बेकार है I”

इस गोष्ठी के अंत में श्रोताओं से सीधा संवाद भी हुआ और प्रश्नोत्तरी का दौर भी चला.

कार्यक्रम के तीसरे और अंतिम चरण में डा0 धनञ्जय सिंह की अध्यक्षता में और मनोज कुमार शुक्ल ‘मनुज’ के सुमधुर सञ्चालन में काव्य-गोष्ठी का आगाज़ संचालक महोदय द्वारा ही वाणी वंदना से हुआ I इसके बाद माईक पर हास्य कवि श्री आदित्य चतुर्वेदी का अवतरण हुआ I उन्होंने कुछ छणिकायें सुनाकर उपस्थित विद्वानों का मनोरंजन किया I यथा –
ये चरर मरर करते जूते
जो व्यवस्था की तरह चरमराते हैं
व्यवस्था की व्यवस्था में जूते बड़े काम आते हैं
कानपुर से पधारे गोविन्द नारायण शांडिल्य ने प्रोषित-पतिका नायिका का दर्द कुछ इस तरह बयां किया -
कोयलिया कुहू-कुहू मत बोल
आ जायेगी याद किसी की, मन जाएगा डोल I
श्री नवीन मणि त्रिपाठी ने कुर्सी लोलुप नेताओं की शान में अपनी ग़ज़ल इस प्रकार पढ़ी –
जो शिगूफों को तो बस यूँ उछाल देते हैं
लहर नफ़रत का यूँ वो दिल में डाल देते हैं
कितने शातिर हैं ये कुर्सी के चाहने वाले
अमन गुफूं का कलेजा निकाल लेते हैं I
कवयित्री अन्नपूर्णा बाजपेयी मंजिलों को आजमाना चाहती थीं, मगर कोई राह दिखाने वाला उन्हें न मिला I उनकी पीड़ा के स्वर कुछ इस प्रकार थे -
जज्ब करता आंसुओं को कहाँ गमख्वार था
जख्म पर मरहम लगता कहाँ वो रिसालदार था
मंजिले तो हम भी आजमाना चाहते थे मगर
राह मुझको दिखाता कहाँ वो तैयार था
मधुर स्वर के राजकुमार ग़ज़लकार आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ ने एकाधिक ग़ज़लें बड़े तरन्नुम में सुनायीं और स्वर ही नहीं ग़ज़ल की कहन से भी प्रभावित किया I यथा –
रखी थी तश्तरी में उठाई नहीं गयी
थी भूख मगर भूख मिटाई नहीं गयी
जिस रोज कहीं खुदकुशी कर ली किसान ने
उस रोज हमसे रोटी खायी नहीं गयी
प्रख्यात कवयित्री संध्या सिंह ने पुरुष समाज को चुनौती देते हुये कहा –
हम भले मोम की पुतली थे पर आंच तुम्हारी सह निकले I
तुम चट्टानों से अड़े रहे हम धाराओं सा बह निकले
डा0 प्राची सिंह ने अपने संगीतमय स्वर से सभागार में एक सम्मोहन सा तारी कर दिया I कविता के बोल थे –
रे मन ! करना आज सृजन वो
भव सागर जो पार करा दे I
कानपुर से ही आये वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार श्री कन्हैया लाल गुप्त ‘सलिल’ ने ‘शब्द शब्द आवारा होता ‘ गीत से समा बाँध दिया I कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं –
पीर न होती प्यार न होता
यह जग खारा खारा होता
मधुर गीत कैसे रच पाता
शब्द शब्द आवारा होता

भाई वीनस केसरी जो ग़ज़ल के युवा और सशक्त हस्ताक्षर हैं, उन्होंने कई बड़ी असरदार ग़ज़लें सुनाईं और अपना लोहा मनवाया I उनकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -
गुजारिश थी कि तुम ठोकर न खाना अब
चलो दिल ने कहा इतना तो माना अब
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ने कुछ अच्छी और गंभीर भावों को प्रकट करने वाली अतुकांत कवितायेँ पढ़ी पर अंत में अपने रसमय हृदय का परिपाक कुछ इस तरह से किया -
सोचत़ा हूँ जिसे वही हो क्या
डायरी से निकल गयी हो क्या ?
लग रही है वसुन्धरा सुन्दर
आज तुम भी उधर जगी हो क्या ?
डा0 शरदिंदु मुकर्जी ने एक अतुकांत कविता द्वारा बदलते हुए जीवन चक्र की ओर इस तरह इशारा किया -
रोशनी आ रही है खिड़की के रास्ते
शायद सवेरा हो रहा है
डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने “नारी आत्मा के स्वर -एक फैंटेसी’ नामक कविता में अस्थमा ग्रस्त नदी गंगा के दर्द को सहेजने की कोशिश की -
तब से मै नियमित
हर रोज इधर आता हूँ
और उस नारी को रोते हुए पाता हूँ
एक दिन प्रभु से वरदान था माँगा
या मेरे क्रम का सौभाग्य यहाँ जागा
उस दिन मैंने वह विकट कराह सुनी
शब्दों में आती हुयी दुर्वह आह सुनी-
‘हाय भगीरथ ! क्या इसीलिए लाये थे ?’

ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर जनाब एहतराम इस्लाम साहेब ने पहले कुछ सुन्दर दोहे सुनाये i दोहे बड़े ही चुटीले और मार्मिक थे I उनकी ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ नमूने के तौर पर पेश हैं -
हो न हो पाने लगा हूँ मैं भी ऊपर की रकम
वरना कैसे मेरे मुख मंडल की आभा बढ़ गयी
एकता के सूत्र में बंधना अगर उद्देश्य था
सोचिये कैसे संबंधों की कटुता बढ़ गयी
आपको ईर्ष्यालु क्यों कहिये हितैषी क्यों नहीं
आपके कारण तो मेरी लोकप्रियता बढ़ गयी
ओ.बी.ओ.लखनऊ चैप्टर के संस्थापक सदस्य आ. केवल प्रसाद ‘सत्यम’ ने सवैया जबकि ओपन बुक्स ऑनलाईन के संस्थापक एवं प्रबंधक आ0 गणेश जी 'बागी' जी ने कुछ अतुकांत रचनाएं सुनाईं I एक घनाक्षरी भी प्रस्तुत की I बागी जी की अतुकांत रचना बड़ी ही सारगर्भित थी जिसकी कुछ पंक्तियाँ निम्न प्रकार हैं -
सुगंध और दुर्गन्ध में
अंतर करना जानती हैं
ये नासिका
खट्टा, मीठा, तीखा सब
तुरंत भाँप लेती है
हमारी जिह्वा

हल्की सी आहट को
पहचान लेते हैं
हमारे कान
अर्थात
सभी अंग संवेदनशील हैं
हृदय के सिवाय
काव्य-गोष्ठी के अध्यक्ष डा0 धनञ्जय सिंह ने तीन कवितायेँ बहुत ही सुमधुर स्वर में सुनायी I राजनेताओं को सांप के साथ तुलना करते हुए उन्होंने बताया कि ये समर्थन विनय से नहीं चाहते अपितु वे अपनी फुफकार और दंश तक का भी प्रयोग करते हैं I एक उनकी और कविता है जिसमें वे यात्राओं को बीच में छोड़ कर घर लौटने के लिए परिस्थितिवश बाध्य होते हैं –
घर की देहरी पर छूट गए
संवाद याद यों आएँगे
यात्राएँ छोड़ बीच में ही
लौटना पड़ेगा फिर-फिर घर
अध्यक्ष के काव्य-पाठ के बाद डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों और कवियों को धन्यवाद दिया और ‘गबन’ फिल्म की इन पंक्तियों के साथ कार्यक्रम के निगति की घोषणा की I
अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

 

आयोजन की समाप्ति उपरांत इस दिन की यादों को संजो कर रखने हेतु कुछ ग्रुप फोटो लिए गए.

 

एस-1/436 , सीतापुर रोड योजना
अलीगंज सेक्टर-अ, लखनऊ
मोबा 0 नं 9795518586

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वाह दादा शरदिंदु जी

बड़े ही सुन्दर चित्र प्रस्तुत किये  आपने I यह आयोजन अपनी भव्यता और गुणवत्ता के लिए सदैव याद किया जाएगा . सादर .

परम आदरणीय शरदिंदु मुकर्जी सर, 

इस भव्य आयोजन में उपस्थित न हो पाने का बहुत खेद हो रहा है. विवशताएँ ...?

आपने आयोजन की विस्तृत रिपोर्ट सचित्र प्रस्तुत कर हमें भी आयोजन से जोड़ दिया. 

 स्मारिका सिसृक्षा तो पढ़ चुका था किन्तु आयोजन के कविसम्मेलन/मुशायरे की विस्तृत झांकी और परिचर्चा के महत्वपूर्ण विन्दुओं पर रिपोर्ट के लिए हार्दिक आभार.

आदरणीय गोपाल नारायन जी, आयोजन की सफलता में हम सबका सम्मिलित प्रयास, आप लोगों की मेहनत और ओ.बी.ओ.प्रबंधन टीम द्वारा यथास्थान समयोचित दिशानिर्देश सभी कुछ कारण स्वरूप निहित है. हमें और शायद अन्य बहुतों को इस आयोजन की सफलता ने प्रोत्साहित किया है, यही सबसे बड़ी उपलब्धि है. सभी सम्बद्ध शुभचिंतकों का हार्दिक आभार. सादर.
आदरणीय मिथिलेश जी, आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार. आप आते तो और अच्छा लगता वैसे 'विवशताएँ' मैं भी समझता हूँ. सादर.

आदरणीय शरदिंदु भाई साहब , इस विशाल और सफल आयोजन का रिपोर्ट विसतार से पढ़ के वहाँ न पहुँच पाना खूब अखरा । स्मारिका तो आन लाइन पढ़ चुका , बहुत सुन्दर लगा , अपने अंदर साहित्य के सभी रंग समेटे हुये है । बहुत बहुत आभार आपका स्मारिका साझा करने के लिये । सभी चित्र भी बहुत मोहक हैं । सफल आयोजन के लिये आपको और मंच को हार्दिक बधाइयाँ ॥

वाह !!!! बहुत ही सुंदर और सुखद रहा पढना और देखना आयोजन के इस सुंदरतम पोस्ट का । पढने और देखने के बाद लालसा जाग उठी कि काश हम भी इसके हिस्से होते । ओबीओ परिवार को बहुत बहुत बधाई इस भव्यतम सफल आयोजन के लिए । आभार

वाह !अतिउत्तम , बहुत ही सुंदर  आयोजन के लिए बधाई स्वीकारें दिल से  । समस्त ओबीओ परिवार को बहुत-बहुत बधाई इस  सफल आयोजन के लिए । 

आभासी संसार के एक हिस्से का सापेक्ष स्वरूप लखनऊ में अपना स्थापना दिवस मना रहा हो तो इस पूरे ’संसार’ की समस्त सकारात्मक शक्तियाँ इस हेतु तत्पर विचारों से प्रभावित हुई दिखीं. ऐसा होना किसी वैचारिक मंच का सबसे बड़ा संबल हुआ करता है.
आदरणीय शरदिन्दु जी के ऊर्जस्वी नेतृत्व तथा आदरणीय गोपाल नारायणजी की उत्साही क्रियाशीलता में सम्पन्न हुआ आयोजन कई कारणों के चिर-स्मरणीय हो गया. इसकी अनुभूति आयोजन में उपस्थित सदस्यों और प्रतिभागियों को अवश्य हुई है. यह रिपोर्ताज़ भी इसी आशय का आईना बना है. कुशल नेतृत्व की क्षमता और सकर्मक क्रियाप्रणाली का अनुकरणीय संयोग था, सुचारू रूप से सम्पन्न हुआ कार्यक्रम !
 
मैं आदरणीय शरदिन्दुजी और उनकी पूरी टीम को मुझे इस कार्यक्रम में किसी उत्तरदायित्व हेतु सूचीबद्ध करने के लिए हृदय से आभार प्रकट करता हूँ. साथ ही, आदरणीय गोपाल नारायनजी को इस सुन्दर् और सर्वसमाही रिपोर्ताज़ के लिए सादर धन्यवाद देता हूँ.
शुभ-शुभ

आदरणीय सौरभ जी

     सच्चाई तो यह है की आप स्वयं लखनऊ चैप्टर के सदस्य है और सोने  में सुगंध यह भी कि ओ बी ओ प्रबंधन टीम  के सदस्य भी हैं फिर भी स्वयं को हाशिये में डाले हुए हैं I सच्चाई यह है की हमारी टीम ने आपके और आदरणीय  दादा शरदिंदु जी के निर्देशन में कार्य किया है और सजग एवं कुशल नेतृत्व ही सदैव सफलता का राज हुआ  करत़ा है I  अभी तो यह एक शरुआत है .सादर .

आदरणीय गोपाल नारायनजी, मैंने इस आयोजन की रूपरेखा में कोई योगदान नहीं दिया है. आयोजन की सफलता आप सभी लखनऊवासी सदस्यों की सचेष्ट संलग्नता का परिणाम है. सभी ने अपने दायित्व का विन्दुवत निर्वहन किया है. आपने भी, देखिये, जिस मनोयोग से स्मारिका ’सृसिक्षा’ का सम्पादन किया है, वह आपकी विद्वता का परिचायक है. इस कार्य में किसी सदस्य ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. आदरणीय शरदिन्दुजी ने निर्णय लेने के क्रम में सभी सदस्यों से सुझाव स्वीकार किये लेकिन अंतिम निर्णय सर्वमान्य तथा स्वीकृत सोच-समझ पर ही बनी.  
लखनऊ चैप्टर का सदस्य होने के बावज़ूद यह मेरी बदकिस्मती रही कि मै एक भी मासिक गोष्ठी में शिरकत नहीं कर पाया.
आगे से इस हेतु अवश्य मेरा सकारात्मक प्रयास रहेगा.
सादर

हार्दिक अभिनंदन एवं बधाई ....लखनऊ चैप्टर की तृतीय जयन्ती के अवसर पर... और इस सुंदर प्रस्तुति के माध्यम से हम सब को भी सम्मलित करने के लिये आभार ...सादर 

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