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यथार्थ के दोहे. . . . . .

यथार्थ के दोहे .....

पाप पंक पर बैठ कर ,करें पुण्य की बात ।
ढोंगी लोगों से मिलेेें, सदा यहाँ आघात ।।

आदि -अन्त के भेद को, जान सका है कौन ।
एक तीर पर शोर है, एक तीर पर मौन ।।

आदि- अन्त का ग्रन्थ है, कर्मों का अभिलेख ।
जन्म- जन्म की रेख को,देख सके तो देख ।।

कितना टाला आ गई, देखो आखिर शाम ।
दूर क्षितिज पर दिख रहा, अब अन्तिम विश्राम ।।

तृप्ति यहाँ आभास है, तृष्णा भी आभास  ।
मौसम का मधुमास भी , आभासी मधुमास ।।

सुशील सरना /26-3-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 22, 2022 at 6:38am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। उत्तम दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। 

Comment by Sushil Sarna on April 21, 2022 at 10:03pm
आदरणीय पंकज जी सृजन के भावों को मान देने एवं सुझाव देने का दिल से आभार ।मेरे विचार से प्रयुक्त शब्द करें और मिलें अपने स्थान पर ठीक हैं ।सादर नमन
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 7, 2022 at 5:15pm

आदरणीय सुशील जी उत्तम भावों के लिए साधुवाद। 

आदरणीय अग्रज सौरभ पांडेय जी के सुझावों पर ध्यान देना उचित होगा।

करें....के स्थान पर करे, मिलें के स्थान पर मिले।

उत्तम भावों और सनातन सत्य को उद्घाटित करते दोहों के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2022 at 2:43pm
आदरणीया दीपाली ठाकुर जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार ।
Comment by Sushil Sarna on April 7, 2022 at 2:42pm
परम आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया एवं सुझाव का दिल से शुक्रिया ।
Comment by Deepalee Thakur on April 4, 2022 at 11:52am
बहुत अच्छे दोहे ,बधाई

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2022 at 1:17am

आदरणीय सुशील सरना जी, गहरे पैठे हैं आप. और मोती निकाल लाये हैं. दोहों का भावपक्ष निस्संदेह अत्युन्नत है. अलबत्ता अभिव्यक्ति को एक-दो स्थानों पर कसावट चाहिए प्रतीत होता है. 

जैसे, पंक पर नहीं पंक में. 

देखो आखिर शाम की जगह आखिर देखो शाम. ऐसा क्यों, यह आप अवश्य सोचें. 

 

प्रस्तुत दोहे का हर पक्ष समृद्ध है. कहन की उठान चकित कर रही है.

तृप्ति यहाँ आभास है, तृष्णा भी आभास  ।
मौसम का मधुमास भी , आभासी मधुमास ।।

वाह, वाह, वाह !

हार्दिक बधाइयाँ..

Comment by Sushil Sarna on March 30, 2022 at 10:08pm
आदरणीय विजय निकोर जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by vijay nikore on March 30, 2022 at 3:24pm

आ० मित्र सुशील जी, दोहे बहुत ही सुन्दर....आनन्द आ गया। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on March 30, 2022 at 1:49pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब - सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी

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