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ग़ज़ल - मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप

2122 2122 2122 212

मैं अँधेरी रात हूंँ और शम्स के अनवर-से आप
शाम-सी मुझ में उदासी, सुब्ह के मंज़र-से आप

जाने कैसे मिलना होगा अपना इक मे'यार पर
मैं ज़मीं की ख़ाक-सी हूंँ चर्ख़ के मिम्बर-से आप

जो भी आया चल दिया वो मुझ से हो कर आप तक
मैं अधूरी रहगुज़र हूँ और मुकम्मल घर-से आप

क्यों पसंद आये किसी को भी कभी होना मेरा
मैं कि अनचाही सी बेड़ी क़ीमती ज़ेवर-से आप

आपके बिन इस जहांँ में कुछ नहीं मेरा वजूद
मैं हूंँ मानंद-ए-मुजस्सम और मेरे आज़र-से आप

तिश्नगी सबकी मिटा कर भी रही मैं तिश्ना लब
मैं कि इक प्यासी नदी हूँ और मेरे सागर-से आप

मैं नहीं हसरत किसी की, आप सब की 'आरज़ू'
मैं हूँ इक मा'मूली पत्थर और हैं गौहर-से आप

स्वरचित व मौलिक 

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Comment by Samar kabeer on December 22, 2022 at 5:36pm

//मानन्द-ए-मुजस्सम" का अर्थ मूर्ति के जैसे लिया है //

'मुजस्सम' का अर्थ है ,जिस्म वाला, और 'मुजस्सम:' का अर्थ होता है मूर्ति, अब आप ख़ुद देख लें दोनों का फ़र्क़ ।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 21, 2022 at 7:56pm

मोहतरम बृजेश कुमार 'ब्रज जी सादर नमस्ते, हौसला अफ़ज़ाई के लिए हार्दिक आभार

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 21, 2022 at 7:55pm

मोहतरम जनाब Ravi Shukla जी आदाब, हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया, अभी एडिट करती हूं मोहतरम।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 21, 2022 at 7:53pm

मोहतरम जनाब Samar kabeer साहब आदाब अपना क़ीमती वक़्त ख़र्च करके ख़ूबसूरत इस्लाह के लिए तहे दिल से शुक्रिया,

मिम्बर और मानन्द की वर्तनी अभी सुधारती हूं "मानन्द-ए-मुजस्सम" का अर्थ मूर्ति के जैसे लिया है मोहतरम । बा अदब

Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:26pm

आदरणीया अंजुमन 'आरज़ू' जी , उम्दा ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्वीकार करें I उर्दू अल्फ़ाज पर आदरणीय समर साहब के मशवरे पर गौर करें । 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 15, 2022 at 6:44pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीया...बधाई

Comment by Samar kabeer on December 14, 2022 at 3:34pm

मुह्तामा अंजुमन 'आरज़ू' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

'मैं ज़मीं की ख़ाक-सी हूंँ चर्ख़ के मिंबर-से आप'-- इस मिसरे में ',मिंबर' को "मिम्बर" लिखें I 

'मैं हूंँ मानिंद-ए-मुजस्सम और मेरे आज़र-से आप' पहली बात, इस मिसरे में सहीह शब्द "मानन्द" है, दूसरी बात "मानन्द-ए-मुजस्सम" का अर्थ क्या हुआ ?

बाक़ी शुभ शुभ I 

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 11, 2022 at 9:50pm

मोहतरम Aazi Tamaam जी, ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

Comment by Aazi Tamaam on December 11, 2022 at 9:46pm

वाह आ बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on December 11, 2022 at 9:46pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी, ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

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