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कुँवारी आँखों में- ग़ज़ल

1212 1122 1212 22 

 

न नींद है न कहीं चैन प्यारी आँखों में, 

तमाम ख़्वाब पले हैं कुँवारी आँखों में. 

 

शिकार कैसे हुए हम समझ नहीं पाए,

दिखा न तीर न कोई कटारी आँखों में 

 

करीब जा के न कोई भी लौट कर आया,

फँसे पड़े हैं कई इन जुआरी आँखों में

 

ये दिल हमारा किसी और का हुआ जब से,  

तभी से छाई हुई है खुमारी आँखों में. 

 

तुम्हें कभी भी न ओझल करेंगे आँखों से, 

तुम एक बार तो आओ हमारी आँखों में.

 

जरा हमें भी बताओ कहाँ छुपा पानी, 

नदी न झील न सागर तुम्हारी आँखों में. 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 27, 2020 at 12:46pm

आदरणीया Dimple Sharma जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by Dimple Sharma on July 27, 2020 at 11:59am

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी नमस्ते, खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 26, 2020 at 12:14pm
आदरणीय SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR जी सादर नमस्कार
आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 26, 2020 at 10:52am
फंसे पड़े हैं कई इन जुआरी आंखों में , वाह क्या बात है सुन्दर गज़ल, बधाई
Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 25, 2020 at 9:19pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2020 at 11:18pm

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिख बधाई ।

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