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जब भी देखूँ वो मुझे  चाँद नज़र आता है: सलीम रज़ा रीवा

2122  1122  1122 22

जब भी देखूँ वो मुझे  चाँद नज़र आता है !
रोशनी बन के दिलो  जाँ मे समा जाता है !!

उस हसीं शोख़ का दीदार हुआ है जब से !
उसका ही चेहरा हरेक शै में नज़र आता है !!

मै मनाऊँ तो भला  कैसे मनाऊँ उसको !
मेरा महबूब तो बच्चो सा मचल जाता है !!

क्यूं भला मान लूँ ये इश्क़ नहीं है उसका !
छु्‍पके तन्हाई में  गीतों को मेरे गाता है !!

मैं तुझे चाँद कहूँ  फूल कहूँ या  खुश्बू !
तेरा ही चेहरा हरेक शै में नज़र आता है !!

आज भी उसके है सीने में मुहब्बत मेरी !
जब भी मिलता है वो शरमा के निकल जाता है !!

ऐसे इन्सां पे ''रज़ा'' कैसे भरोसा करलें !
करके  वादा  जो हमेशा ही  मुकर जाता है !!


9424336644

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by नाथ सोनांचली on August 24, 2017 at 5:37am
आदरणीय सलीम रज़ा साहब सादर अभिवादन, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ । दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by Mohammed Arif on August 23, 2017 at 11:11pm
आदरणीय सलीम रज़ा साहब आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ । मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by Samar kabeer on August 23, 2017 at 10:38pm
मेरे कहे को मान देने के लिये शुक्रिया ।
मेरा नम्बर है,09753845522
Comment by SALIM RAZA REWA on August 23, 2017 at 6:19pm
आदरणीय laxman ji, Basant Ji, शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on August 23, 2017 at 6:16pm
जनाब समर साहब,
आपके बेशकीमती मशविरे के लिए बेहद शुक़गुज़ार हूँ,
ग़ज़ल को दुबारा देखने की मेहरबानी करे..
अगर हो सके तो अपना मोबाइल नंबर देने की मेहरबानी करें..
Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 23, 2017 at 5:04pm

अच्छा प्रयास है आदरणीय  SALIM RAZA साहिब , आदरणीय  Samar kabeer जी एवं आदरणीय  Ravi Shukla जी के सुझाव ध्यान देने योग्य हैं 

Comment by Samar kabeer on August 23, 2017 at 2:47pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'समां' को "समा" कर लें ।
दूसरे शैर के सानी मिसरे में 'पे' को "में" कर लें ।
तीसरे शैर के ऊला मिसरे में 'उनको'बहुवचन के लिए है, और यहाँ एक वचन है, इसलिये 'उनको'की जगह "उसको" कर लें ।
चौथे शैर के ऊला में भी 'उनका' को "उसका" कर लें ।
पांचवें शैर के सानी मिसरे में 'पे'को "में" कर लें ।
'ऐसे लोगों पे "रज़ा"कैसे भरोसा कर लें
करके वादा जो हमेशा ही मुकर जाता है'
मक़्ते में शुतरगुर्बा का ऐब है, ऊला में 'लोगों'बहुवचन और सानी में एक वचन ,ऊला मिसरा यूँ कर सकते हैं :-
"ऐसे इंसां पे "रज़ा"कैसे भरोसा कर लें"

बाक़ी शुभ शुभ ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2017 at 2:31pm
हार्दिक बधाई..।
Comment by SALIM RAZA REWA on August 23, 2017 at 12:40pm
आदरणीय रवि जी शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on August 23, 2017 at 12:39pm
मोहित जी शुक्रिया.

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