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बात गज़ब की करते हो -- डॉo विजय शंकर

हालात बदलने की बात करते हो
आदमी बदल देते हो
हालात बदल नहीं पाते ,
या बदलना नहीं चाहते हो।
खुद को तरक्की पसंद कहते हो
तरक्की की बात करते हो
काम करने के पुराने तरीके
नहीं बदलते हो ,
आदमी बदल देते हो ।
उसने बहुत सहा , अब तुम सहो ,
इसी को सामाजिक न्याय कहते हो ,
गज़ब करते हो बिना हींग फिटकरी के
रंग चोखा करते हो ॥
तरक्की की बात करते हो
खुद को तरक्की पसंद कहते हो ॥
अच्छा करते हो कि बुरा, पता नहीं
पर बात गज़ब की करते हो ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 950

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on April 8, 2015 at 6:18pm
आदरणीय सुनील प्रसाद जी , रचना की उन्मुक्त प्रशस्ति के लिए बहुत बहुत आभार, आपकी बधाई हेतु धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 8, 2015 at 6:16pm
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी , रचना की प्रशस्ति के लिए आभार, आपकी बधाई हेतु धन्यवाद , सादर।
Comment by Meena Pathak on April 8, 2015 at 5:55pm

बहुत सुंदर रचना आदरणीय विजय जी ...सादर बधाई 

Comment by Samar kabeer on April 8, 2015 at 3:17pm
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,आपकी रचनाओं में जो सच्चाई छुपी होती है उसका में सम्मान करता हूँ ,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |
Comment by Nidhi Agrawal on April 8, 2015 at 2:44pm

सुन्दर रचना हुई है आदरणीय विजय जी ... बधाई 

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 11:48am
आज के प्रस्तिथियों के संदर्भ में नीति नियंताओं के लिये सत्य प्रतिबिम्ब उभारती रचना के लिये बधाई आदरणीय डॉ. साहब।
Comment by Shyam Narain Verma on April 8, 2015 at 11:38am
बहुत सुंदर रचना, बधाई आदरणीय

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