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टुकड़ों में बटा आदमी - डॉo विजय शंकर

टुकड़ों में बटा आदमी 

टुकड़ों की बात करता है , 

टुकड़ों को छोटे , और छोटे 

टुकड़ों में तोड़ने की बात करता है।  

टुकड़ों से अलग अलग बात करता है , 

आज इसकी कल उसकी बात करता है 

पर टुकड़ों को जोड़ने से डरता है 

और टुकड़ों के खुद जुड़ने से भी डरता है। 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

Views: 883

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2018 at 8:18am

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ,आपकी सद्भवनाओं के लिए आभार , आपने अपनी रूचि की गहराई दिखाई। आपको बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2018 at 8:16am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ,आपकी सद्भवनाओं एवं हार्दिक बधाई के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2018 at 8:14am

आदरणीय लक्षमण धामी ‘ मुसाफिर ’ जी , आपकी सद्भवनाओं एवं हार्दिक बधाई के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Samar kabeer on October 9, 2018 at 2:48pm

जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,"टुकड़े" देखने और सुनने में बहुत मामूली शब्द है,लेकिन इस शब्द को इस्तेआरा बनाकर आपने उपयोगी बना दिया,बहुत ख़ूब वाह, इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on October 9, 2018 at 11:36am

आदरणीय विजय शंकर जी आदाब,

                                  बहुत भी लाजवाब कविता । बस , इतना ही कहूँगा कि-

                                                                          मेरा वजूद अगर देखना है

                                                                           तो मुझे टुकड़ों में देखना

                                                                           टुकड़ों में पाया हूँ

                                                                           किसी का टुकड़ा हूँ

                                                                           किसी का टुकड़ा खाता हूँ

                                                                          किसी के टुकड़ों पर पलता हूँ

                                                                          ग़रीबी की भट्टी में जलता हूँ

                                                                            मेरी नमक हरामी और नमक हलाली भी

                                                                               टुकड़ों पर पलती है 

.                                                                          .   अब देखना यह कि वह 

                                                                                 टुकड़ा कैसा है ?

                                                                                                          हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

                                                                                

Comment by TEJ VEER SINGH on October 9, 2018 at 11:04am

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर जी।बेहतरीन गूढ़ संदेश देती प्रस्तुति।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 9, 2018 at 10:29am

आ0 डॉ विजय शंकर जी बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने । हार्दिक बधाई ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2018 at 9:35am

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । सुंदर कविता हुयी है । हार्दिक बधाई।

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