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दुनियाँ क्या से क्या हो गई-- डॉo विजय शंकर।

दुनियाँ,क्या से क्या
हो गई,
रफ़्तार, हवा से तेज
हो गई ,
जिंदगी, बस एक रेस
हो गई ,
मेहबूब की बातें,
मेहबूब से बातें ,
ग़ज़ल न जाने कहाँ ग़ुम
हो गई,
इश्क न जाने कहाँ खो गया
अफेयर का ज़माना हो गया ,
चलते हैं ,
बदलते हैं ,
कितने फेयर होते हैं ,
जफ़ा को अब कोई रोता नहीं ,
जिक्रे वफ़ा अब कहीं होता नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 11:15am
आदरणीय सुश्री प्रतिभा पाण्डेय जी , आपका यह कथन , " सच में आज की रफ़्तार में हम क्या क्या खो रहे हैं ,ये हमें खुद नहीं पता " . बहुत कुछ बयाँ कर गया। कुछ नया पा लेने और कुछ नये बन जाने के चक्कर हम क्या - क्या खो देते हैं हमको अक्सर पता ही नहीं चलता। आपको रचना पसंद आई , आपका ह्रदय से बहुत बहुत आभार और धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 11:07am
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आपको रचना पसंद आई , आपने उसमें अपने ख्यालों को पाया , मेरे लिए इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है , आपका ह्रदय से बहुत बहुत आभार और धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 11:02am
आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी , आपकी उपस्थिति से एक सुखद अनुभूति होती है , आपकी परख से बल मिलता है। आपने रचना को सराहा , आपका बहुत बहुत आभार , धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 10:57am
आप का प्रश्न सही है , दोनों बातें क्रमिक रूप से कही गयी हैं । आदरणीय सुशील सरना जी आपने रचना को समय दिया , उसका मूल्यांकन किया , आपका बहुत बहुत आभार , धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 10:53am
जब तक ज़िंदा हैं पैर जमीन पर रहें और हम यथार्थ के आस- पास रहें , बस यही जिन्दंगी है। आदरणीय डॉ oकँवर करतार खंदेहड़वी जी आपने रचना को समय दिया , उसका सही मूल्यांकन किया , आपका आभार , धन्यवाद , सादर।
Comment by pratibha pande on October 6, 2015 at 7:39am

सच  में आज की  रफ़्तार  में हम क्या क्या खो रहे हैं ,ये हमें खुद नहीं पता ,इस सरल सी लगने वाली रचना के आज के कॉन्टेक्स्ट में कई गहरे मायने हैं , बधाई आपको आदरणीय 

Comment by Samar kabeer on October 5, 2015 at 11:20pm
आली जनाब डॉ विजय शंकर जी,आदाब,"ग़ज़ल न जाने कहाँ गुम हो गई" वाह ,बहुत ख़ूब,आपकी यह पंक्ति सुन कर मुझे मेरी पुरानी ग़ज़ल का एक मतला याद आ गया ,आपसे साझा करता हूँ :-

"अपनी राह-ए-अमल तलाश करो
खो गई है ग़ज़ल तलाश करो"


इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 5, 2015 at 8:44pm

aa0 Vijay sir

इश्क न जाने कहाँ खो गया
अफेयर का ज़माना हो गया ,
चलते हैं ,
बदलते हैं ,
कितने फेयर होते हैं ,
जफ़ा को अब कोई रोता नहीं ,
जिक्रे वफ़ा अब कहीं होता नहीं।----- बहुत सच कहा  खूब कहा

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 7:26pm

आदरणीय विजय भाई साहिब वर्तमान जज्बातों की अहमियत को चित्रित करती इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। आदरणीय वफ़ा और जफ़ा तो मुहब्बत के खूबसूरत पहलू हैं जब मुहब्बत ही दिखावा मात्र है तो वफ़ा और जफ़ा का वज़ूद कहाँ होगा। 

Comment by कंवर करतार on October 4, 2015 at 9:35pm

विजय भाई ,जीवन के यथार्थ को छूती सुंदर रचना ,बधाई I

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