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वक़्त मुसाफिरी का है ,गुजार ले-- डॉo विजय शंकर

ये तू , ये मैं ,
ये साथ , ये अकेलापन,
सब यहीं है ,
यहीं का है,
एक बार यहां से गए ,
तो तू कौन,
मैं कौन,
एक नाम ही है,
सब यहीं रह जाएगा ,
बहती हवा में बह जाएगा ,
द्रव्य, दृश्य,शब्द, स्मृतियाँ, सब,
कुछ मिटटी में , कुछ
वायु में विलीन हो जाएगा ,
नष्ट नहीं होगा ,
पर साथ नहीं जाएगा ,

ये तू, ये मैं , ये साथ ,
ये रिश्ते , ये बंधन ,
ये सब यहीं के हैं ,
यहीं तक हैं ,
यहीं रह जाएंगे ,
समय में खो जाएंगे ,
साथ नहीं जाएंगे।
ये वक़्त मुसाफिरी का है ,
खुश रह के गुजार ले ,
सफर का लुफ्त ले ,
जो जा रहा है उसे छोड़ दे ,
जो आ रहा है,
उसे स्वीकार ले ,
हँस के या रो के
ये सफर गुजार ले ,
भव है , स्वयं को
भव के पार उतार ले ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mala Jha on May 13, 2015 at 1:53pm
बहुत सुन्दर रचना आदरणीय विजय शंकर जी।
Comment by Shyam Narain Verma on May 13, 2015 at 1:19pm
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर
Comment by Samar kabeer on May 13, 2015 at 11:10am
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी,आदाब,आपकी हर रचना एक से बढ़कर एक होती है ,ऐसा लगता है जैसे कोई चलचित्र हो , इस अच्छी रचना के लिये दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 13, 2015 at 11:09am

बहुत सुंदर ,आदरणीय डा.विजय जी. आज के जीवन की जद्दोजहद में आपकी रचना ,एक सत्य को करीब लाकर सामने खड़ा कर देती है.प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकारें

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