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वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर ..... Nazeel


२१२२  २१२२  २१२२  २१२
जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥
ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर   

मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥
घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर

भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,
वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर ।

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो  फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई  इसको  मुहब्बत  की  लहर ॥
                             मौलिक / अप्रकाशित



            

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Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 12:38pm

 बहुत बहुत शुक्रिया  सोमेश कुमार भाई जी।

Comment by Nazeel on April 2, 2015 at 12:37pm

हौंसला  देने  के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय  श्याम नारायण वर्मा जी  .......

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 2, 2015 at 12:03pm

नजील भाई

बहुत अच्छी गजल कही आपने . सुन्दर .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 2, 2015 at 12:02pm

आ० भाई नाजिल जी हार्दिक बधाई .

Comment by somesh kumar on April 2, 2015 at 11:35am

दिलकश गज़ल

Comment by Shyam Narain Verma on April 2, 2015 at 10:52am
बहुत सुन्दर भावों से सजी रचना बहुत 2 बधाई आदरणीय 

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