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Nazeel's Blog (13)

बहुत कुछ दांव पे लगाया है .....

१ २ २ २ १२ १ २२२
बड़ी मुश्किल उसे मनाया है ॥
बहुत कुछ दांव पे लगाया है ॥
किसे कहते कि बेवफा है वो ,
हँसा हम पे जिसे बताया है ॥
बसा दिल-ओ-दिमाग में वो ही ,
अचानक सामने जो आया है ॥
लगे ऐसा हमें खुदा ने उसे ,
हमारे के लिए बनाया है ॥
हुआ है एहसास जन्नत का ,
जो माँ ने गोद में सुलाया है ॥
कहाँ होशो-हवास की बातें ,
किसी पे जब शबाब आया है ॥
लगे है वो पवित्र गंगा सा ,
करिंदा जो पसीने से नहाया है ॥
मौलिक /अप्रकाशित

Added by Nazeel on April 7, 2015 at 9:30pm — 15 Comments

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर ..... Nazeel



२१२२  २१२२  २१२२  २१२

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥

ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर



है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं

सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर   



मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥

घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर



भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर



वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,

यूँ अकेला बैठ…

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Added by Nazeel on April 1, 2015 at 8:44pm — 16 Comments

वो वायदे गिनने लगे हैं आज कल...

२२१२ २२१२ २२१२

खामोश से रहने लगे हैं आजकल ॥

हम रात भर जगने लगे हैं आजकल ॥

इन महफ़िलों को क्या हुआ किसको पता ,

सब  चेहरे ढलने लगे है आजकल ॥

सदियों से लूटा है खुदा के नाम पे ,

तो कब नया ठगने लगे है आज कल ॥

निभते नहीं हैं जो सियासत में कभी ,

वो वायदे गिनने लगे हैं आज कल ॥

कैसे कहें , कितना चाहें हैं उसे ,

बस सोच के डरने लगे हैं आज कल ॥

मालूम होता तो बता पाते तुझे ,

वो दूर क्यों हटने…

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Added by Nazeel on March 21, 2015 at 9:30pm — 10 Comments

माना होता खुदा को एक हमने

2222 1222 1222

लोगों को लूटने का फ़लसफ़ा होता ||

तो अपने नाम पर बाबा लगा होता ||

तूं तूं - मैं मैं न होती इस कदर हम में ,

तेरा मेरा अगर इक रास्ता होता ||

माना होता खुदा को एक हमने तो ,

फिर घर न कोई किसी का जला होता ||

उनको आया नज़र फर्के- लिबासां ही ,

काश !ये इक रंग का खूं भी दिखा होता ||

फिर मैं भी मानता परवाह है उसको ,

ग़र आंसू पोंछ बांहो में कसा होता ||

समझौता कर लिया हालात से…

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Added by Nazeel on March 15, 2015 at 8:00pm — 11 Comments

भूला कहाँ हूँ कच्चा घर अपने गाँव का

भूला कहाँ हूँ कच्चा घर अपने गाँव का ||

जो बना था लकड़ी का दर अपने गाँव का ||

थी वो महकती मिटटी और वो कच्ची गली ,

घूमे  ख़्यालों में  मंज़र अपने  गाँव का ||

आँखे हुई नम , देखकर  पानी  बरसात  का ,

जो याद आये जोहड़ अक्सर अपने गाँव का ||

जब…

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Added by Nazeel on March 3, 2012 at 7:00pm — 11 Comments

वो कोशिश करते रहे रुसवा करने की ,

मांगी जो उनसे जिगर में पनाह हमने ||

देखें ऐसे जो किया हो गुनाह हमने ||

आज तक न मिला मुहब्बत सा बहर गहरा,

देखे लाखों बहर गहरे अथाह हमने ||

हमको उसने भी दिया ना जवाब कोई ,…

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Added by Nazeel on February 6, 2012 at 8:10pm — No Comments

मेरे घर के नज़दीक दीवारों पे

मेरे घर के नज़दीक दीवारों पे ||
आए नज़र मुझे तू इश्तिहारों पे ||

है सच्चाई की शरीफ कूचों में भी ,
अक्सर बिकता है हुस्न चौबारों पे ||

शायद सब जायज है इस सियासत में,
बस मुद्दे ही हैं किस्मत के मारो पे ||

मुमकिन ना है अब वस्ल होगा उनसे ,
बसते हैं जो आजकल वो सितारों पे ||

आखिर आए है मौसिमे -वीरानी ,
इस फिजा को महकाती इन बहारों पे ||

Added by Nazeel on January 31, 2012 at 4:30pm — 5 Comments

तेरे बिना लगती है जिंदगी अधूरी सी |

तेरे बिना लगती है जिंदगी अधूरी सी |

अपनी बज़्म की है अब हर ख़ुशी अधूरी सी ||



बन के अब्र कोई ,बरसाए बारिशे-उल्फत ,

मुहब्बत के बिन तो है दिल की ज़मीं अधूरी सी ||



इसको गुनाह समझ ,चाहे समझ खता इसको ,

हमसफ़र के बिन लगती है खुदी अधूरी सी ||



जाम छलके हैं चाहे रोज़ मैकदे में, पर ,

तेरे बिन साकीया ,मैकशी अधूरी सी |



मैं चाहता हूँ अक्सर देखना खुदा को ,

जाने क्यों रह जाए बन्दगी अधूरी सी |



उनके ख्यालों में खोकर "नजील" अब मै तो… Continue

Added by Nazeel on January 21, 2012 at 7:45pm — 6 Comments

मुस्काने की फितरत साथ दे अगर

मुश्किल में एजद की रहमत साथ दे अगर |

तो छू लें बुलंदी हम ,किस्मत साथ दे अगर ||



मिट  जाएगा  झूठ  हमारी  कायनात  से ,

बस हमको इक बार सदाकत साथ से अगर…

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Added by Nazeel on January 17, 2012 at 12:30pm — 4 Comments

उन्हें देख कर सूरत पे जलाल आए

जब भी तुझको पाने का ख्याल आए |

पाए किस तरह ज़हन में सवाल आए ||

.

छोड़ कर हिया वो आ लगे गले से ,

जब उनसे हम पूछने उनका हाल आए |

.

बिन उनके तो हम बैठे रहें बुझे से ,

उन्हें देख कर सूरत पे…

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Added by Nazeel on January 7, 2012 at 12:00pm — 3 Comments

उनकी सुहबत में सुधरते चले गए ||

जैसे -जैसे दिन गुजरते चले गए |

वो मेरे दिल में उतरते चले गए ||

याद दिलाने की कोशिश की है मगर ,

वो इन वादों से मुकरते  चले गए |

औरों को  देते थे सलाह, मगर खुद ,…

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Added by Nazeel on December 30, 2011 at 1:56pm — 2 Comments

वो रूठ जाते हैं बेवजह ही

हर दिन ज़िन्दगी से जूझता हूँ |

हर मोड़ पर मंजिलें ढूढता हूँ ||

.

वो रूठ जाते हैं बेवजह ही ,

उनसे भला मैं कब रूठता हूँ |

.

मजबूरी का बनके पासबां मैं ,

अरमान अपने ही लूटता हूँ |

.

अपना गम छुपाने के लिए अब,

मैं हाल औरों से पूछता हूँ |

.

मैं आज नफरत के दौर में भी,

तेरी उल्फ़त कहाँ भूलता हूँ |

.

हर बार फिर उठता हूँ मैं ,चाहे ,

दिन में कई बारी टूटता हूँ ||

Added by Nazeel on December 24, 2011 at 4:00pm — 6 Comments

माहो-अख्तर के बिना आसमां हूँ मैं ,

माहो-अख्तर के बिना आसमां  हूँ मैं ,

.यादों की बिखरी हुई कहकशां हूँ मैं |



अपने खूं से लिखी हुई दास्ताँ हूँ मैं |

पढने वालों के लिए  इम्तहाँ हूँ मैं |

.

चाहे जिसको लूटना ये ज़हाँ सारा…

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Added by Nazeel on December 15, 2011 at 12:00pm — 4 Comments

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