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वो रूठ जाते हैं बेवजह ही

हर दिन ज़िन्दगी से जूझता हूँ |

हर मोड़ पर मंजिलें ढूढता हूँ ||

.

वो रूठ जाते हैं बेवजह ही ,

उनसे भला मैं कब रूठता हूँ |

.

मजबूरी का बनके पासबां मैं ,

अरमान अपने ही लूटता हूँ |

.

अपना गम छुपाने के लिए अब,

मैं हाल औरों से पूछता हूँ |

.

मैं आज नफरत के दौर में भी,

तेरी उल्फ़त कहाँ भूलता हूँ |

.

हर बार फिर उठता हूँ मैं ,चाहे ,

दिन में कई बारी टूटता हूँ ||

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Comment

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Comment by Nazeel on January 23, 2012 at 6:08pm

धन्यवाद किरण जी ...हार्दिक आभार .बहुत बढ़िया पंक्तिया ..

Comment by Kiran Arya on January 23, 2012 at 12:32pm

उनके रूठने मेरे मनाने की जद्दोजहद में जिन्दगी गुजरे जाती है,
पहलु बदलते बदलते ही सुबह शाम में तब्दील हुए जाती है,
एक नज़रे इनायत के इंतज़ार में तेरी जिंदगी अपनी फनाह हुए जाती है.........किरण आर्य

Comment by Nazeel on December 26, 2011 at 3:19pm

धन्यवाद सौरभ जी .... हार्दिक आभार ...:)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 26, 2011 at 2:49pm

हर बार फिर उठता हूँ मैं ,चाहे ,

दिन में कई बारी टूटता हूँ ||

एक अच्छी गज़ल के लिये हार्दिक बधाई .. .

Comment by Nazeel on December 25, 2011 at 11:15am
धन्यवाद बागी जी हार्दिक आभार .....वहा पर टंकण त्रुटि थी और मैंने वो सुधार दी है आपका आभार ध्यान दिलवाने के लिए ..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 25, 2011 at 10:41am

नाजिल साहिब, अच्छी ग़ज़ल कही है आपने , 

मजबूरी का बनके पासबां मैं ,

अरमान अपने ही लूटता हूँ |

यह शे,र बहुत ही प्यारा लगा , अंतिम शेर में लग रहा कुछ टंकण की त्रुटी है , "हा बार फिर ......" शायद आप "हर बार फिर...." कहना चाह रहे है | बधाई इस खुबसूरत प्रस्तुति पर | 

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