For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - इस्लाह के लिए

2122 2122 2122 212

या तो चाहत इश्क़ में थी या खुदा पाने में थी
एक समंदर की सी तमन्ना आँख के दाने में थी

बेगुनाही एक जिद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी
और मेरी हर सजा तेरे बिछड़ जाने में थी

होश के इस फैसले से क्या मुझे हासिल हुआ
ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छोटे से पैमाने में थी

सांस लेता है ये जाने कौन किसका जिस्म है
ज़िन्दगी तो अपनी तेरे गम के वीराने में थी

ये नहीं हासिल हुआ या वो नहीं मुमकिन हुआ
कशमकश ये हर घडी इस दिल को थर्राने में थी

सुर में रोने का हुनर हमको सीखा देता कोई
दर्द सी ही बेकरारी दर्द को गाने में थी

हौसला गिरने लगा है अब तेरे 'अहसास' का
किस कदर की बेबसी खुद का पता पाने में थी

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 874

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Samar kabeer on July 25, 2015 at 11:46pm
इस भाव को पूरी तरह स्पष्ट करना वाक़ई मुश्किल है क्यूँकि इस शैर मैं तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष भी है लेकिन ख़याल और मौज़ू के लिहाज़ से इस दोष को गवारा किया जा सकता है,इस शैर को इस तरह कर लें :-

"बेगुनाही,जुर्म का इक़बाल,जब तेरी ख़ुशी
और मेरी हर सज़ा तुझ से बिछड़ जाने में थी"
Comment by मनोज अहसास on July 22, 2015 at 3:53am
आदरणीय कबीर सर
नमस्कार
बहुत आभार

बेगुनाही एक ज़िद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी
और मेरी हर सजा तेरे बिछड़ जाने में थी

इसमें भाव ये है कि यदि आपकी ख़ुशी मुझे जुर्म का इकबाल करते हुए देखने में है तो फिर मेरा खुद को बेगुनाह बताना एक ज़िद है भले ही मै बेगुनाह हु और मै दुनिया की सारी सज़ाएं तुझसे बिछड़ जाने में ही महसूस करता हु अब और कोई सजा मेरे लिए इससे बड़ी नहीं है

ये कहने का भाव रहा है
पूरी तरह स्पष्ठ कर पाना मुश्किल है


पुनः इस्लाह का आग्रह है
सादर
Comment by Samar kabeer on July 22, 2015 at 12:09am
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,हैरतज़दा हूँ मैं आपकी ग़ज़ल सुनकर ,कमाल कर दिया मनोज भाई आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

बात चूँकि इस्लाह की है इसलिये अर्ज़ करता हूँ कि एक मिसरे की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा :-

(1)"बेगुनाही एक जिद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी"

:- ये मिसरा अपने सानी मिसरे से चिपक नहीं रहा है,दूसरी बात ये कि इसमें बयान बहुत कमज़ोर है ,बात मेरी तो समझ में नहीं आई कि आप इस मिसरे में क्या कहना चाहते हैं ,इसमें "इक़बाल" शब्द वो meaning नहीं दे रहा जो उसे देना चाहिये ।
Comment by मनोज अहसास on July 21, 2015 at 6:46pm
नमस्कार सर
बहुत बहुत आभार
मेहरबानी
शुक्रिया
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2015 at 4:37pm

अद्भुत ग़ज़ल से दो-चार हो रहा हूँ मनोज अहसास भाई ! आपकी सोच, सोच को लफ़्ज़ों में उकेरना, अश’आर को बाँधना ! वाह !
मतले के सानी को इक समंदर की तमन्ना आँख के दाने में थी करना था. लगता है, पोस्ट करने के क्रम में ध्यान नहीं गया.
वैसे तो हर शेर मोती की तरह दमक रहा है. लेकिन निम्नलिखित पर मन भावुक हुआ जा रहा है -
सुर में रोने का हुनर हमको सिखा देता कोई
दर्द सी ही बेकरारी दर्द को गाने में थी.
ओह्होह !

टंकण त्रुटियों के प्रति सज़ीदा हो जाइये, भाई.
बहरहाल, आपकी ग़ज़ल पढ़कर मुग्ध हो गया हूँ. हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by मनोज अहसास on July 14, 2015 at 6:47pm
बहुत आभार
आदरणीय विनय जी
सादर
Comment by विनय कुमार on July 14, 2015 at 6:07pm

// होश के इस फैसले से क्या मुझे हासिल हुआ
ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छोटे से पैमाने में थी // , वाह , बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है , बधाई आदरणीय मनोज एहसास जी..

Comment by मनोज अहसास on July 14, 2015 at 4:30pm
आप सभी का बहुत आभार
आप से ही सीख रहा हु
इनायत की इल्तज़ा है
सादर
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 14, 2015 at 2:21pm

क्या बात है क्या बात है........ बहुत खूब अश्यार हुए है,बधाई व् शुभकामनाएं!

Comment by वीनस केसरी on July 14, 2015 at 3:55am

आपकी अब तक की सबसे शानदार ग़ज़ल पढ़ रहा हूँ
ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"    राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है…"
29 minutes ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं   अब तो दीदावर न कोई न वो दर है…"
10 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है…"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"सादर अभिवादन।"
13 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"स्वागतम"
15 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  प्रस्तुत नवगीत को आपसे मिला उत्साहवर्द्धन हमें प्रयासरत रखेगा, आदरणीय अशोक…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"  आदरणीय रवि भसीन ’शाहिद’ जी, प्रस्तुति पर आपका स्वागत है। इस गजल को आपका अनुमोदन…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। इस प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। हर शेर में सार्थक विचार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Saurabh Pandey's blog post कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ
"आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक कुमार जी, नमस्कार। इस सुंदर ग़ज़ल पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। /रास्तों …"
yesterday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल…See More
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service