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खिले फूलों के रंगों ने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२


समय ने हद से बढ़ के जब नयी मजबूरियाँ दी हैं
उन्हीं मजबूरियों ने  ही  तनिक  चालाकियाँ दी हैं।१।


सफर में  राह  ने  काँटे  उगाये  पाँव  बेबस कर
मगर इक  हौसले  ने  ही  कई  बैशाखियाँ दी हैं।२।


बढ़ाया हाथ भी ठिठका कहा भौंरे ने जब इतना
खिले फूलों के रंगों ने चमन को तितलियाँ दी हैं।३।


भुला बैठे हैं सब  शायद  यही  सोचे थे मन में पर
वतन से याद कर हमको किसी ने हिचकियाँ दी हैं।४।


नहीं थी एक भी यूँ खासियत उसके कथन में फिर
जरा सी बात को  किस ने  भला  यूँ सुर्खियाँ दी हैं।५।


तुझे पछुआ का दामन  दे  गया है सत्य होगा पर
उसी मौसम  ने  हम को  भी  नयी  पुर्वाइयाँ दी हैं।६।


कहीं पर कैब से दहशत कहीं पर है खुशी देखो
भरी  जाती  न  बँटवारे  ये  कैसी  खाइयाँ दी हैं।७।


मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 583

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2019 at 7:51am

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on December 30, 2019 at 6:23am

गज़ल अच्छी बनी है। उमदा ख्याल हैं। बधाई, मित्र लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2019 at 5:31pm

आ. गीता जी, गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on December 26, 2019 at 2:45pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ग़जल अच्छी लगीI समय ने हद से बढ़ के जब नयी मजबूरियाँ दी हैं
उन्हीं मजबूरियों ने  ही  तनिक  चालाकियाँ.... बहुत ही उम्दा हैI

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 24, 2019 at 8:28pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 24, 2019 at 8:25pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन और त्रुटी की ओर ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on December 24, 2019 at 6:41pm

वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी बहुत ही खूबसूरत अहसासों की ग़ज़ल पेश की है आपने , दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by Samar kabeer on December 24, 2019 at 2:31pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'मगर इक  हौसले  ने  ही  कई  बैशाखियाँ दी हैं'

इस मिसरे में 'बैशाखियाँ' को 

"बेसखियाँ" कर लें ।

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