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वोटर पापड़ बेल रहे हैं
और मसीहे खेल रहे हैं।1

उम्मीदें जिनकी मुरझाईं
उट्ठक - बैठक पेल रहे हैं।2

मत देने पर स्याही सूखी,
दाग लगे, सब झेल रहे हैं।3

लड़ते - मरते लोग - लुगाई
नेता भरसक रेल रहे हैं।4

'अक्ल बड़ी कह भैंस लजाई,
अंधे गाड़ी ठेल रहे हैं।5

जिसकी पूंछ मिले,पकड़ें सब
बैतरणी को हेल रहे हैं।6

पाठ पढ़ाते चलते हैं वे
जो जीवन भर फेल रहे हैं।7

कुर्सी खातिर मिल जाते हैं
जो हरदम बेमेल रहे हैं।8

ख़बरें बिकती खुल्लमखुल्ला
जैसे भजिए भेल रहे हैं।9
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Samar kabeer on December 21, 2019 at 5:35pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 19, 2019 at 7:50am

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन समसामयिक गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by आशीष यादव on December 15, 2019 at 5:52pm

बहुत सटीक सर।

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