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उजला अन्धकार ...

होता है अपना
सिर्फ़
अन्धकार
मुखरित होता है
जहाँ
स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार


होता है जिसके गर्भ से

भानु का
अवतार


नोच लेता है जो
झूठ के परिधान का
तार तार


सच में
न जाने
कितने उजालों के
जालों को समेटे
जीता है
समंदर सा
उजला अन्धकार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 22, 2019 at 1:32pm

आदरणीय   SALIM RAZA REWA  जी सृजन आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया का दिल से आभारी है।

Comment by SALIM RAZA REWA on November 21, 2019 at 9:18pm

आदरणीय सुशील सरना जी ख़ूबसूरत कविता के लिए बधाई स्वविकारें।

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2019 at 7:47pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सृजन आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया का दिल से आभारी है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 20, 2019 at 4:43am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । सुंदर रचना हुई है हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on November 15, 2019 at 1:50pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब .... सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on November 14, 2019 at 5:17pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्द: कविता लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on November 13, 2019 at 7:33pm

आदरणीय Usha   जी सृजन आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभारी है। 

Comment by Usha on November 13, 2019 at 6:56pm

आदरणीय सुशील सरना जी, स्वयं से साक्षात्कार होना सही मायनों में जीवन के सत्य से रूबरू होने जैसा है। यूँ तो हम कभी जज तो कभी वकील बन दूसरों का या अपना केस लड़ते है और बहुत ज्ञानी समझते हैं स्वयं को किन्तु बात तो तब हो कि हम स्वयं को जान लें, पहचान लें । असल तिमिर ख़त्म हो प्रकाश तो तब आएगा।
"होता है अपना
सिर्फ़
अन्धकार
मुखरित होता है
जहाँ
स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार"
मुझे बेहद पसंद आयी ये पंक्तियाँ। बधाई स्वीकार करें। सादर।

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