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सबके अपने अपने मठ हैं - नवगीत

व्हाट्सएप्प हो या मुखपोथी*

सबके अपने-अपने मठ हैं

दिखते हैं छत्तीस कहीं पर,

और कहीं पर वे तिरसठ हैं

*फेसबुक 

 

रंग निराले, ढंग अनोखे,

ओढ़े हुए मुखौटे अनगिन

लाइक और कमेंट खटाखट,

चलते ही रहते हैं निशदिन

 

छंद हुए स्वच्छंद सरीखे,

गीत, ग़ज़ल के भी नव हठ हैं

 

नजर लक्ष्य पर रखते अपनी,

बगुले जैसा ध्यान लगाते

कोई मछली दिखी कहीं पर,

उधर तुरत ही चौंच बढ़ाते

 

फैलाने को अपनी सत्ता,

हरदम लगनशील कर्मठ हैं  

 

मेरी मुर्गी तीन टाँग की,

हर हालत में सिद्ध कर रहे

भले स्वयं की गागर रीती,

लेकिन सबका कलश भर रहे

 

आलोचक की जगह नहीं है,

कहते हैं सब लेख सुपठ हैं

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 12, 2018 at 11:34am

आदरणीय  Samar kabeer  जी शुभ प्रभातम, आपकी प्रतिक्रिया का दिल से शुक्रिया, कुछ और तरीके से कोशिश करता हूँ।  सादर नमन आपको 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 12, 2018 at 11:33am

आदरणीय  PHOOL SINGH जी शुभ प्रभातम, आपकी प हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on December 11, 2018 at 10:10pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,नवगीत अच्छा है लेकिन आप जो कहना चाहते हैं वो पूरी तरह उजागर नहीं हो सका,ख़ैर ! इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by PHOOL SINGH on December 11, 2018 at 2:14pm

क्या बात है सर जी बहुत सूंदर बधाई 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on December 10, 2018 at 9:20am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी शुभ प्रभातम, आपकी हौसलाअफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 10, 2018 at 6:52am

आ. भाई बसंत जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

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