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जिसतरह चाँद पिघलकर किसी छत पर उतरे। ( ग़ज़ल- बलराम धाकड़)

चन्द अश्आर मेरे अश्क़ से बहकर उतरे।

जो पसीने में हुए तर, वही बेहतर उतरे।

तेरी यादों के यूँ तूफ़ां हैं दिलों पे क़ाबिज़,
जैसे बादल कोई पर्बत पे घुमड़कर उतरे।

स्याह रातों में तेरा ऐसे दमकता था बदन,
जिसतरह चाँद पिघलकर किसी छत पर उतरे।

मैं तुझे प्यार करूँ, और बहुत प्यार करूँ,
ऐसे जज़्बात मेरे दिल में बराबर उतरे।

ऐसी ज़ुल्मत ये सितम अब हुए आदत में शरीक़,
अब मज़ा आए अगर धड़ से मेरा सर उतरे।

उसका दिल कैसे धड़कने से करेगा इंकार,
जिसके सीने में तेरे इश्क़ का ख़ंजर उतरे।

मैं इलाही के करोबार से वाकिफ़ न हुआ,
उनको आदाब जिनके सर पे पयम्बर उतरे।

मैं अभी तक ये न समझा कि तेरे जाने के बाद,

किसतरह मेरी इन आँखों में समंदर उतरे?

~मौलिक/अप्रकाशित।

~   बलराम धाकड़ ।

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Comment by Balram Dhakar on November 1, 2018 at 3:14pm

आली मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त ही हौसला अफज़ाई कर देती है। आपके सुझावों के मुताबिक ग़ज़ल में और कोशिश करता हूँ।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on November 1, 2018 at 3:11pm

आदरणीय राज़ साहब, आपको ग़ज़ल पसंद आई, मेरा लिखना सार्थक हुआ।

सादर।

Comment by Balram Dhakar on November 1, 2018 at 3:10pm

आदरणीय विनय कुमार जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

सादर।

Comment by Samar kabeer on November 1, 2018 at 3:06pm

जनाब बलराम धाकड़ जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतला बराए मतला हुआ है,इसमें रदीफ़ से पूरा इंसाफ़ नहीं हुआ ।

'स्याह रातों में तेरा ऐसे दमकता था बदन,
जिसतरह चाँद पिघलकर किसी छत पर उतरे'

इस शैर में तशबीह(उपमा)ठीक नहीं,'पिघलकर छत पर उतरे' बात कुछ जँचती नहीं ।

'मैं इलाही के करोबार से वाकिफ़ न हुआ,
उनको आदाब जिनके सर पे पयम्बर उतरे'

ये शैर भर्ती का है, शिल्प और व्याकरण की दृष्टि से भी कमज़ोर है, और जनाब "पयम्बर" किसी के सर पर नहीं उतरते,ग़ौर करें ।

Comment by राज़ नवादवी on November 1, 2018 at 8:15am

आदरणीय बलराम धाकड़ जी, आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. 

उसका दिल कैसे धड़कने से करेगा इंकार,
जिसके सीने में तेरे इश्क़ का ख़ंजर उतरे।

बहुत खूब. सादर 

Comment by विनय कुमार on October 31, 2018 at 11:23pm

वाह, वाह, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आ बलराम धाकड़ साहब, सभी शेर बेहतरीन है. बहुत बहुत बधाई आपको इस ग़ज़ल के लिए

Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 7:38pm

हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया, जनाब सुर्खाब साहब।

सादर।

Comment by Surkhab Bashar on October 31, 2018 at 7:35pm

जनाब बलराम धाकड़ साहिब 

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल पढ़ने को मिली  बहुत बहुत मुबारकबाद

Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 2:07pm

आदरणीय नीलेश जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया। 

जी हाँ, सर करोबार वाक़ई अटपटा सा लगता है लेकिन विकल्प?

उनको आदाब जिनके सर पे पयम्बर उतरे

को 

तुझको आदाब तेरे सर पे पयम्बर उतरे... ऐसा करें तो ठीक होगा क्या?

सादर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2018 at 12:20pm

आ. बलराम जी,
एक और उम्दा ग़ज़ल हुई है...
करोबार थोडा अटपटा लगा ..
उनको आदाब जिनके सर पे पयम्बर उतरे।.. इस मिसरे की बहर देख लें ..
सादर 

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