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फिर ज़ख़्मों को ...संतोष

अरकान:-

फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़ा

फिर ज़ख़्मों को धोने का दिल करता है

चुपके चुपके रोने का दिल करता है

जब जब भी मैं तुझको देखूँ दिलबर

अपना सब कुछ खोने का दिल करता है

होती है जब ग़म की यूरिश इस तन पर

चादर तान के सोने का दिल करता है

काले काले बादल झूम के बरसें तो

तुझको संग भिगोने का दिल करता है

रोते देखूँ जब 'संतोष' किसी को मैं

तब मेरा भी रोने का दिल करता है

~संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Samar kabeer on August 23, 2018 at 6:19pm

जनाब संतोष जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on August 23, 2018 at 12:36pm

आलरणीय संतोष खिरवड़कर जी आदाब,

                          बेहद मुश्क़िल बह्र में बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by santosh khirwadkar on August 23, 2018 at 11:35am

बहुत शुक्रिया आ. शर्मा साहब!!!

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 23, 2018 at 7:38am

बहुत खूब , सरल सहज सुंदर गजल 

कृपया ध्यान दे...

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